बॉलीवुड के दमदार अभिनेताओं में शुमार नाना पाटेकर की जिंदगी सिर्फ फिल्मों की चमक-दमक तक सीमित नहीं रही। आज वह अपनी बेहतरीन अदाकारी और अलग अंदाज के लिए पहचाने जाते हैं, लेकिन उनके शुरुआती दिन आर्थिक तंगी और संघर्ष से भरे हुए थे। एक दौर ऐसा भी था जब परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद खराब हो गई थी और घर चलाने के लिए उन्हें छोटी उम्र में ही काम करना पड़ा।
नाना पाटेकर के संघर्ष की कहानी बताती है कि फिल्म इंडस्ट्री में सफलता हासिल करने से पहले उन्होंने जिंदगी की मुश्किल परिस्थितियों का सामना किया था। पिता का कारोबार डूबने के बाद परिवार पर आर्थिक संकट आया और नाना ने कम उम्र में जिम्मेदारियां उठानी शुरू कर दीं।
पिता का कारोबार हुआ था तबाह
नाना पाटेकर का जन्म महाराष्ट्र में हुआ था। उनके पिता कपड़ों के कारोबार से जुड़े थे। बताया जाता है कि कारोबार में भारी नुकसान होने के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति बिगड़ गई। इस मुश्किल दौर ने नाना की जिंदगी पर गहरा असर डाला।
घर की परिस्थितियों को देखते हुए उन्होंने कम उम्र में ही काम करना शुरू कर दिया। उन्हें पढ़ाई के साथ-साथ परिवार की मदद करने के लिए मेहनत करनी पड़ी। यही संघर्ष आगे चलकर उनके व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण हिस्सा बना।
पोस्टर पेंट करके कमाते थे पैसे
नाना पाटेकर ने अपने शुरुआती दिनों में फिल्मों के पोस्टर पेंट करने का काम किया था। वह करीब 8 किलोमीटर पैदल चलकर काम पर जाते थे। पोस्टर पेंट करने से उन्हें थोड़ी-सी आमदनी होती थी, लेकिन उस समय उनके लिए यह कमाई बेहद महत्वपूर्ण थी।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, उस दौर में उनकी दैनिक कमाई करीब 35 रुपये हुआ करती थी। इसी पैसे से वह अपने परिवार की जरूरतों में योगदान देते थे। आज करोड़ों रुपये की संपत्ति और फिल्मी शोहरत रखने वाले नाना के लिए वह दौर बेहद कठिन था।
कम उम्र में समझी जिम्मेदारी
आर्थिक तंगी ने नाना को कम उम्र में ही जिंदगी की जिम्मेदारियां समझा दी थीं। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपने सपनों को खत्म नहीं होने दिया। अभिनय के प्रति उनकी रुचि लगातार बनी रही और उन्होंने थिएटर के जरिए अपनी प्रतिभा को निखारना शुरू किया।
थिएटर ने उन्हें अभिनय की बारीकियां सीखने का मौका दिया। मंच पर काम करने के दौरान उन्होंने संवाद अदायगी, भाव-भंगिमा और किरदार को समझने की कला पर मेहनत की। यही अनुभव बाद में उनके फिल्मी करियर की मजबूत नींव बना।
फिल्मों में धीरे-धीरे मिली पहचान
नाना पाटेकर ने 1978 में फिल्म ‘गमन’ से अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की। शुरुआत में उन्हें बड़े मौके आसानी से नहीं मिले, लेकिन उन्होंने लगातार काम जारी रखा। छोटे-बड़े किरदार निभाते हुए उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई।
फिल्म ‘अंकुश’, ‘प्रतिघात’ और ‘परिंदा’ जैसी फिल्मों ने उन्हें गंभीर और दमदार अभिनेता के रूप में स्थापित किया। खास तौर पर ‘परिंदा’ में उनके अभिनय को खूब सराहा गया और उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला।
‘क्रांतिवीर’ ने बढ़ाई लोकप्रियता
नाना पाटेकर के करियर में ‘क्रांतिवीर’ एक महत्वपूर्ण फिल्म साबित हुई। इस फिल्म में उनके अभिनय ने दर्शकों और समीक्षकों दोनों का ध्यान खींचा। उनके दमदार संवाद और प्रभावशाली अभिनय ने उन्हें हिंदी सिनेमा के प्रमुख अभिनेताओं की कतार में ला खड़ा किया।
इसके बाद उन्होंने ‘अग्निसाक्षी’, ‘यशवंत’, ‘अब तक छप्पन’ और ‘अपहरण’ जैसी फिल्मों में अलग-अलग तरह के किरदार निभाए। उन्होंने सिर्फ गंभीर भूमिकाएं ही नहीं कीं, बल्कि कॉमेडी और नेगेटिव शेड वाले किरदारों में भी अपनी छाप छोड़ी।
‘वेलकम’ से नई पीढ़ी में भी लोकप्रिय हुए
नाना पाटेकर के करियर का एक और यादगार किरदार फिल्म ‘वेलकम’ में देखने को मिला। उदय शेट्टी के किरदार में उनकी कॉमिक टाइमिंग और संवाद अदायगी ने दर्शकों को खूब हंसाया। फिल्म के बाद उनका यह किरदार पॉपुलर कल्चर का हिस्सा बन गया।
इस तरह नाना पाटेकर ने अपने करियर में अलग-अलग तरह की भूमिकाएं निभाकर साबित किया कि एक कलाकार किसी एक तरह के किरदार तक सीमित नहीं होता।
अभिनय के अलावा निर्देशन में भी हाथ आजमाया
नाना पाटेकर ने अभिनय के साथ-साथ निर्देशन में भी काम किया। उन्होंने 1991 में ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ का निर्देशन किया था। फिल्म में उन्होंने मुख्य भूमिका भी निभाई थी। इस फिल्म के जरिए उन्होंने सेना और जवानों की जिंदगी से जुड़े विषय को पर्दे पर पेश किया।
उनके काम को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान भी मिला। नाना पाटेकर को तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। वर्ष 2013 में उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया।
गरीबी से शोहरत तक का सफर
नाना पाटेकर की कहानी उन लोगों के लिए प्रेरणा है जो कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपने सपनों को पूरा करने की कोशिश करते हैं। एक तरफ उनके जीवन में वह दौर था जब परिवार की आर्थिक स्थिति खराब थी और उन्हें पोस्टर पेंट करके रोजमर्रा की जरूरतों में योगदान देना पड़ता था, वहीं दूसरी तरफ मेहनत और अभिनय के दम पर उन्होंने हिंदी सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाई।
35 रुपये की कमाई से परिवार की मदद करने वाले नाना पाटेकर आगे चलकर भारतीय सिनेमा के सबसे चर्चित और सम्मानित कलाकारों में शामिल हुए। उनका सफर बताता है कि संघर्ष चाहे कितना भी बड़ा हो, प्रतिभा, मेहनत और लगातार प्रयास इंसान को अपनी मंजिल तक पहुंचा सकते हैं।








