Cyber Fraud: साइबर अपराधियों ने लोगों को डराकर पैसे ऐंठने के लिए ‘डिजिटल अरेस्ट’ का तरीका अपना रखा है। इस तरह के मामलों में ठग खुद को पुलिस, CBI, कस्टम या दूसरी जांच एजेंसियों का अधिकारी बताकर पीड़ित को फर्जी कानूनी कार्रवाई का डर दिखाते हैं। ‘आपके नाम से पार्सल मिला है और उसमें ड्रग्स या अन्य प्रतिबंधित सामान है’ जैसी कहानी भी इस तरह की ठगी में इस्तेमाल की जाती रही है। पुलिस के दस्तावेजों में ऐसे मामलों के उदाहरण सामने आए हैं।
पहले आया पार्सल का डराने वाला फोन
ऐसे ही एक कथित मामले में महिला डॉक्टर को फोन कर बताया गया कि उनके नाम से भेजे गए पार्सल में ड्रग्स समेत आपत्तिजनक सामान मिला है। महिला ने जब पार्सल भेजने से इनकार किया तो कथित ठगों ने मामले को और गंभीर बताते हुए उनके पहचान दस्तावेजों के दुरुपयोग और आपराधिक गतिविधि से जुड़े होने की बात कही।
इस तरह के फ्रॉड में इसके बाद कॉल को कथित तौर पर साइबर क्राइम, पुलिस या किसी केंद्रीय जांच एजेंसी के अधिकारी से जोड़ दिया जाता है। पीड़ित को भरोसा दिलाने के लिए फर्जी आईडी कार्ड, दस्तावेज और वीडियो कॉल का सहारा लिया जाता है। इंदौर पुलिस द्वारा दर्ज एक मामले में भी ठगों ने डॉक्टर को पार्सल में MDMA, पासपोर्ट और अन्य सामान होने की बात कहकर फर्जी अधिकारियों तक कॉल ट्रांसफर किया था।
वीडियो कॉल पर शुरू होता है ‘डिजिटल अरेस्ट’
इसके बाद पीड़ित को वीडियो कॉल पर बने रहने के लिए कहा जाता है। ठग दावा करते हैं कि जांच पूरी होने तक फोन बंद नहीं किया जा सकता और किसी अन्य व्यक्ति से संपर्क करने पर कार्रवाई हो सकती है। इस तरह पीड़ित को मानसिक दबाव में रखा जाता है।
पुलिस के अनुसार, ‘डिजिटल अरेस्ट’ वास्तव में कोई कानूनी गिरफ्तारी नहीं है। यह साइबर अपराधियों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला ठगी का तरीका है, जिसमें डर और दबाव बनाकर व्यक्ति को लगातार वीडियो कॉल पर रखा जाता है।
जांच के नाम पर पैसे ट्रांसफर कराने का खेल
इसके बाद ठग पीड़ित से बैंक खाते की जानकारी, बैंक बैलेंस या दूसरी निजी जानकारी हासिल करने की कोशिश करते हैं। कई मामलों में यह कहा जाता है कि खाते में मौजूद रकम की जांच की जाएगी या ‘वेरिफिकेशन’ के बाद पैसा वापस कर दिया जाएगा।
इंदौर पुलिस के एक मामले में ठगों ने डॉक्टर से कथित मनी लॉन्ड्रिंग जांच के नाम पर पैसे एक खाते में ट्रांसफर करवाए थे। पुलिस ने बताया कि शिकायत के बाद मामले की जांच की गई और इसे ऑनलाइन फ्रॉड का मामला माना गया।
17.8 करोड़ की रकम को लेकर दावा
आपके दिए गए मामले में 17.8 करोड़ रुपये की ठगी और 30 दिन तक डिजिटल अरेस्ट किए जाने का दावा किया गया है। हालांकि, उपलब्ध विश्वसनीय वेब स्रोतों में मुझे इस खास मामले की इन दोनों संख्याओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं मिली। इसलिए इस रकम और अवधि को फिलहाल रिपोर्ट/दावे के रूप में ही पेश किया जाना उचित है।
ऐसे मामलों में डरना नहीं है जरूरी
पुलिस की ओर से सामने आए मामलों से साफ है कि ‘पार्सल में ड्रग्स’, ‘मनी लॉन्ड्रिंग’, ‘गिरफ्तारी वारंट’ और ‘जांच’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल पीड़ित को डराने के लिए किया जाता है। किसी भी वास्तविक जांच में फोन या वीडियो कॉल के जरिए किसी व्यक्ति को इस तरह लगातार निगरानी में रखना और पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर करना सामान्य कानूनी प्रक्रिया नहीं है।
अगर किसी व्यक्ति को ऐसा कॉल आता है तो उसे घबराकर पैसे ट्रांसफर करने के बजाय परिवार के भरोसेमंद सदस्य या संबंधित पुलिस/साइबर क्राइम प्राधिकरण से स्वतंत्र रूप से संपर्क करना चाहिए। भारत में साइबर फ्रॉड की शिकायत 1930 हेल्पलाइन और राष्ट्रीय साइबर क्राइम रिपोर्टिंग सिस्टम के जरिए की जा सकती है। इंदौर पुलिस के मामलों में भी पीड़ितों द्वारा 1930/NCRP पर शिकायत दर्ज कराने का उल्लेख है।
कुल मिलाकर, ‘पार्सल में ड्रग्स मिला है’ कहकर डराना डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड का जाना-पहचाना तरीका है। ऐसे कॉल में सबसे जरूरी बात है कि डर के दबाव में आकर पैसे या निजी बैंकिंग जानकारी साझा न की जाए और मामले की स्वतंत्र रूप से पुष्टि की जाए।








