डेस्क। भाषा केवल व्याकरण की पुस्तक में बंद नियमों का संग्रह नहीं होती। वह किसी भी समाज की धड़कन होती है। वह खेत की मेड़ पर बोया गया पहला बीज है, माँ की लोरी है और पिता की डाँट में छिपा हुआ स्नेह है। जब हम अपनी भाषा में बोलते हैं तो केवल हम नहीं बोलते, हमारी जड़ें बोलती हैं, हमारे संस्कार बोलते हैं। प्रातः साढ़े पाँच बजे जब टोडाभीम की सर्दी में कोई किसान अपने बैलों को हाँकते हुए कहता है चल मेरे बेटा चल तो उस एक वाक्य में हजार वर्षों की सभ्यता साँस लेती है। दोपहर में सब्जी मंडी में जब कोई माँ आँचल संभालते हुए कहती है भैया दो किलो आलू दे दो जरा देख कर तोलना तो उसमें केवल मोल भाव नहीं पूरे परिवार की चिंता होती है।
सरकारी विद्यालय में जब शिक्षक टूटी चॉक से श्यामपट पर हि लिखकर रुकते हैं और अंतिम पंक्ति में बैठा बच्चा उत्साह से कहता है न्दी तो वहाँ केवल एक शब्द पूरा नहीं होता वहाँ एक देश का आत्मविश्वास पूरा होता है। तब समझ आता है कि हिन्दी कोई फाइल में लिखा आदेश नहीं है। हिन्दी एक अनुभूति है। हिन्दी वह दर्पण है जिसमें भारत का चेहरा सबसे स्वच्छ बिना किसी बाहरी आवरण के दिखाई देता है। वह गंगा घाट की आरती है, राजस्थान की रेत में बजती मोरचंग है, ब्रज की होली का गुलाल है और मिट्टी में सने हाथों की सुगंध है।
आज हम वैश्विक हो गए हैं। प्रातः ईमेल अंग्रेजी में लिखते हैं, कार्यालय में प्रस्तुति अंग्रेजी में देते हैं। इसमें कोई दोष नहीं है। संसार के साथ कदम मिलाकर चलना आवश्यक है। परंतु प्रश्न यह है कि तीव्र गति से दौड़ते हुए हम अपने घर का द्वार तो नहीं भूल गए। विदेश में रहने वाला व्यक्ति जब रात को माँ को फोन करके कहता है माँ तुम्हारी बहुत याद आती है तो उस माँ शब्द में पूरी हिन्दी बस जाती है, क्योंकि पीड़ा और प्रेम सबसे सच्चे रूप में अपनी ही भाषा में व्यक्त होते हैं। हिन्दी वही माँ है। यही वह अदृश्य सूत्र है जो दिल्ली को देहरादून से, मुंबई को मथुरा से और एक कक्षा को वाराणसी के घाट से जोड़ता है।
हिन्दी हमें केवल रोजगार नहीं देती, वह हमें संबंध देती है। नौकरी अंग्रेजी से मिल सकती है, परंतु पड़ोस में सहायता माँगने हम हिन्दी में ही जाते हैं। यही हिन्दी की सामाजिक शक्ति है।
चौदह सितम्बर उन्नीस सौ उनचास का दिन भारतीय भाषाओं के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। इसी दिन संविधान सभा ने सर्वसम्मति से हिन्दी को भारत की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया। अनुच्छेद तीन सौ तैंतालीस के अंतर्गत देवनागरी लिपि में लिखी हिन्दी को राजभाषा का स्थान दिया गया।
इस निर्णय के महत्व को समझने के लिए हमें चौदह सितम्बर उन्नीस सौ तिरेपन को मनाए गए प्रथम हिन्दी दिवस को याद करना होगा। तब से प्रतिवर्ष यह दिवस हमें स्मरण कराता है कि स्वतंत्रता केवल ध्वज फहराने से नहीं आती, स्वतंत्रता तब आती है जब हम अपने विचार अपनी भाषा में स्वतंत्रता से रख सकें। पिछले छिहत्तर वर्षों में हिन्दी ने लंबी यात्रा तय की है।
राजभाषा का अर्थ किसी भाषा को थोपना नहीं, बल्कि शासन और जनता के बीच सेतु बनाना है। हिन्दी ने यह दायित्व भली भाँति निभाया है। आज तकनीक का युग है। पंद्रह सेकंड की छोटी वीडियो और दो पंक्तियों की लघु सामग्री के दौर में सबसे अधिक लोकप्रिय वही सामग्री है जिसमें ठेठ हिन्दी की मिठास है। शिक्षक जब कक्षा में स्नेह से कहता है बेटा ध्यान कहाँ है तो उस बेटा में जो आत्मीयता है वह किसी अन्य अनुवाद में नहीं आ सकती। यह इस बात का प्रमाण है कि हिन्दी समाप्त नहीं हुई है, उसे केवल उपयुक्त मंच की आवश्यकता है।
आज साठ करोड़ से अधिक लोग हिन्दी बोलते और समझते हैं। विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओं में हिन्दी तीसरे स्थान पर है। गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और एप्पल जैसी कंपनियाँ हिन्दी के लिए ध्वनि सहायक विकसित कर रही हैं। पंचायत जैसी वेब श्रृंखला को विश्व भर में देखा जा रहा है। जुगाड़ जैसे शब्द ऑक्सफोर्ड शब्दकोश में स्थान पा चुके हैं। समस्या हिन्दी में नहीं हमारी दृष्टि में है। हमने अनजाने में हिन्दी को सामान्य और अंग्रेजी को विशिष्ट मान लिया। जबकि सत्य यह है कि जो व्यक्ति अपनी भाषा में स्पष्ट रूप से सोच नहीं सकता वह किसी भी भाषा में मौलिक चिंतन नहीं कर सकता। जापान ने अपनी भाषा में उन्नति की, चीन ने अपनी भाषा में। हमें भी अपनी भाषा पर गर्व करना होगा।
हिन्दी की सबसे बड़ी शक्ति उसकी उदारता है। उसने कभी किसी को अस्वीकार नहीं किया। संस्कृत आई तो आत्मसात किया, फारसी आई तो अपनाया, अंग्रेजी से शब्द लिए तो उन्हें अपना रूप दिया। खड़ी बोली, अवधी, ब्रज, भोजपुरी, राजस्थानी, बुंदेली, छत्तीसगढ़ी ये सभी हिन्दी की ही धाराएँ हैं। तुलसीदास ने अवधी में रामकथा लिखी तो पूरा देश भावुक हुआ। सूरदास ने ब्रज में कृष्ण के बाल रूप का वर्णन किया तो पूरा देश झूम उठा। कबीर ने दोहों में समाज को दिशा दिखाई, प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में गाँव की पीड़ा को स्वर दिया और हरिशंकर परसाई ने व्यंग्य से व्यवस्था को सचेत किया। सबकी लेखनी भिन्न थी पर स्याही एक थी जनसाधारण की हिन्दी। यही कारण है कि हिन्दी कभी पुरानी नहीं होती, वह प्रतिवर्ष नवीन हो जाती है।
एक शिक्षक के रूप में मैं प्रतिदिन देखता हूँ। बच्चे विद्यालय में अंग्रेजी माध्यम से पढ़ते हैं परंतु अवकाश के समय उनका संवाद तूने मेरी कलम क्यों ली ही होता है। उनके मोबाइल की स्थिति में आज भी तुम मिल जाओ तो बेहतर है लिखा होता है। इसका स्पष्ट अर्थ है कि भाषा जीवित है। जब हम किसी संगोष्ठी में केवल अंग्रेजी में भाषण देते हैं और अंतिम पंक्ति में बैठा किसान उसे समझ नहीं पाता तो हम किससे संवाद कर रहे हैं। परंतु जब वही बात हम कहते हैं भाइयो शिक्षा ही सच्चा धन है तो वह किसान भी सहमति में सिर हिलाता है। यही हिन्दी की सार्थकता है। वह हमें भीड़ से नहीं समाज से जोड़ती है।
हिन्दी दिवस हमें अपराध बोध कराने के लिए नहीं है, यह उत्सव का दिन है। यह उस भाषा का उत्सव है जिसमें ऐ मेरे वतन के लोगों सुनकर आँखें भर आती हैं। यह उस भाषा का उत्सव है जिसमें संविधान की प्रस्तावना लिखी गई है। इस चौदह सितम्बर को हमारा संकल्प यह नहीं होना चाहिए कि हम अंग्रेजी का प्रयोग बंद कर देंगे। संकल्प यह होना चाहिए कि जहाँ हिन्दी का प्रयोग संभव है वहाँ हम गर्व से हिन्दी का ही प्रयोग करेंगे। कार्यालय की टिप्पणी में अनुमोदित लिखेंगे, अपने बच्चे को रात में एक राजा था की कहानी सुनाएँगे और मोबाइल पर हिन्दी कुंजीपटल का प्रयोग करेंगे। ये छोटी छोटी ईंटें ही भाषा की सुदृढ़ दीवार बनाती हैं। भाषा स्वतः नहीं मरती उसकी उपेक्षा से वह क्षीण होती है और भाषा स्वतः जीवित भी नहीं रहती उसे जीवित रखना पड़ता है।
अंत में केवल इतना भाषा वह दर्पण है जिसमें कोई भी समाज अपना चेहरा देखता है। हिन्दी वह दर्पण है जिसमें भारत का चेहरा सबसे सुंदर और स्पष्ट दिखाई देता है। यदि इस दर्पण पर धूल है तो उसे साफ कर लेंगे परंतु दर्पण नहीं बदलेंगे। क्योंकि यह दर्पण हमारे पूर्वजों का है, हमारा है और हमारी आने वाली पीढ़ियों का है।
(ये लेखक के अपने निजी विचार हैं)
रामराज मीना
शिक्षक, सामाजिक चिंतक एवं विचारक








