नई दिल्ली: देश में लोकसभा सीटों के संभावित परिसीमन (Delimitation) को लेकर राजनीतिक और संवैधानिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है। चर्चा इस बात को लेकर है कि भविष्य में लोकसभा की कुल सीटों की संख्या मौजूदा 543 से बढ़ाकर लगभग 850 तक की जा सकती है। यदि ऐसा होता है तो यह स्वतंत्र भारत के संसदीय इतिहास का सबसे बड़ा बदलाव होगा। इस संभावित बदलाव को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन’ के विजन की नई परीक्षा के रूप में भी देखा जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि देश की लगातार बढ़ती आबादी के मुकाबले सांसदों की संख्या लंबे समय से स्थिर बनी हुई है। ऐसे में कई संसदीय क्षेत्रों की आबादी करोड़ों तक पहुंच चुकी है, जिससे एक सांसद पर प्रतिनिधित्व का बोझ काफी बढ़ गया है। लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ने से सांसदों और जनता के बीच बेहतर संपर्क स्थापित होने की संभावना जताई जा रही है।
हालांकि, इस मुद्दे के साथ कई संवैधानिक और राजनीतिक चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं। परिसीमन की प्रक्रिया लागू होने पर राज्यों के बीच लोकसभा सीटों का संतुलन बदल सकता है। जिन राज्यों में जनसंख्या अधिक तेजी से बढ़ी है, वहां सीटों की संख्या बढ़ने की संभावना अधिक मानी जा रही है, जबकि दक्षिण भारत के कुछ राज्यों ने पहले ही आशंका जताई है कि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन के बावजूद उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि लोकसभा का विस्तार होता है तो संसद भवन की कार्यप्रणाली, संसदीय समितियों की संरचना, संसाधनों का प्रबंधन और सदन की कार्यक्षमता जैसे कई पहलुओं पर भी नए सिरे से विचार करना होगा। नए संसद भवन का निर्माण भी भविष्य में अधिक सांसदों को समायोजित करने की क्षमता को ध्यान में रखकर किया गया बताया जाता है।
सरकार की ओर से समय-समय पर यह कहा गया है कि परिसीमन की प्रक्रिया संविधान और कानून के प्रावधानों के अनुसार ही होगी। अंतिम निर्णय परिसीमन आयोग की सिफारिशों और संवैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप लिया जाएगा। फिलहाल सीटों की संख्या बढ़ाने को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन इस विषय पर राजनीतिक चर्चाएं लगातार तेज होती जा रही हैं।
संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लोकसभा का आकार बढ़ता है तो इससे लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व मजबूत हो सकता है, लेकिन इसके साथ प्रशासनिक दक्षता बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा। संसद के सुचारु संचालन, बहस की गुणवत्ता और निर्णय लेने की प्रक्रिया को प्रभावी बनाए रखने के लिए नए तंत्र विकसित करने की आवश्यकता पड़ सकती है।
फिलहाल, लोकसभा सीटों के संभावित विस्तार और परिसीमन को लेकर पूरे देश में चर्चा जारी है। आने वाले समय में इस विषय पर केंद्र सरकार, विभिन्न राजनीतिक दलों और संवैधानिक संस्थाओं के बीच व्यापक विचार-विमर्श होने की संभावना है। यदि यह प्रस्ताव आगे बढ़ता है, तो भारतीय लोकतंत्र और संसदीय व्यवस्था में यह एक ऐतिहासिक बदलाव साबित हो सकता है।








