मॉस्को: दुनिया में परमाणु हथियारों की दौड़ के दौरान कई ऐसी सैन्य तकनीकें विकसित हुईं, जिनका उद्देश्य केवल युद्ध जीतना नहीं बल्कि दुश्मन को हमला करने से रोकना भी था। इन्हीं में से एक है रूस का चर्चित ‘डेड हैंड’ सिस्टम, जिसे आधिकारिक तौर पर Perimeter के नाम से जाना जाता है। यह एक ऐसा परमाणु कमांड और कंट्रोल सिस्टम माना जाता है, जिसे इस तरह डिजाइन किया गया था कि यदि देश का शीर्ष नेतृत्व और सैन्य कमांड संरचना किसी विनाशकारी हमले में नष्ट हो जाए, तब भी जवाबी परमाणु हमला सुनिश्चित किया जा सके।
शीत युद्ध के दौर में हुई थी शुरुआत
‘डेड हैंड’ सिस्टम की जड़ें शीत युद्ध के उस दौर में मिलती हैं, जब दुनिया दो महाशक्तियों—Soviet Union और United States—के बीच तनाव से जूझ रही थी। दोनों देशों के पास हजारों परमाणु हथियार थे और यह आशंका बनी रहती थी कि कोई भी पक्ष अचानक पहला हमला कर सकता है।
सोवियत नेतृत्व को डर था कि यदि किसी बड़े परमाणु हमले में देश की राजनीतिक और सैन्य कमान पूरी तरह खत्म हो गई, तो जवाबी हमला करने वाला कोई नहीं बचेगा। इसी चिंता ने एक ऐसे बैकअप सिस्टम की अवधारणा को जन्म दिया, जो अत्यंत असाधारण परिस्थितियों में जवाबी कार्रवाई सुनिश्चित कर सके।
कैसे काम करता है ‘डेड हैंड’?
सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह सिस्टम कई प्रकार के सेंसर, संचार नेटवर्क और कमांड संरचनाओं से जुड़ा माना जाता है। यदि किसी बड़े परमाणु हमले के संकेत मिलें और साथ ही राष्ट्रीय नेतृत्व तथा सैन्य कमांड से संपर्क पूरी तरह टूट जाए, तो यह व्यवस्था पूर्व-निर्धारित प्रक्रियाओं के आधार पर प्रतिक्रिया देने के लिए सक्रिय हो सकती है।
हालांकि, इसके वास्तविक संचालन, तकनीकी क्षमताओं और वर्तमान स्थिति को लेकर अधिकांश जानकारी गोपनीय है। रूस ने कभी भी इसकी पूरी कार्यप्रणाली सार्वजनिक नहीं की है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसके बारे में प्रचलित कई जानकारियां अनुमान, पूर्व अधिकारियों के बयानों और शोध रिपोर्टों पर आधारित हैं।
क्या यह पूरी तरह स्वचालित है?
‘डेड हैंड’ को अक्सर एक ऐसे सिस्टम के रूप में प्रस्तुत किया जाता है जो “खुद फैसला” ले सकता है। लेकिन रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल हो सकती है। अधिकांश विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी परमाणु शक्ति के लिए पूर्णतः स्वचालित परमाणु हमले की व्यवस्था अत्यंत जोखिमपूर्ण होगी।
इसलिए माना जाता है कि ऐसे सिस्टम में कई स्तरों की सुरक्षा, सत्यापन और पूर्व-अनुमोदित प्रक्रियाएं शामिल होती हैं। इसका मुख्य उद्देश्य दुश्मन को यह संदेश देना है कि पहले हमले से भी रूस की जवाबी क्षमता समाप्त नहीं होगी।
अमेरिका क्यों रखता है नजर?
रूस और अमेरिका के बीच परमाणु प्रतिरोध (Nuclear Deterrence) का सिद्धांत दशकों से वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। ‘डेड हैंड’ जैसे सिस्टम इस सिद्धांत को और मजबूत बनाते हैं क्योंकि वे यह संकेत देते हैं कि किसी भी पक्ष के लिए पहला परमाणु हमला करके निर्णायक बढ़त हासिल करना लगभग असंभव होगा।
यही वजह है कि रक्षा विश्लेषक और रणनीतिक विशेषज्ञ इस सिस्टम को दुनिया की सबसे रहस्यमयी सैन्य व्यवस्थाओं में से एक मानते हैं। हालांकि, अमेरिकी अधिकारियों ने समय-समय पर ऐसे सिस्टमों से जुड़े जोखिमों पर चिंता भी जताई है, खासकर तब जब स्वचालन और परमाणु हथियारों का सवाल सामने आता है।
आज भी रहस्य बना हुआ है ‘डेड हैंड’
सोवियत संघ के विघटन के बाद भी समय-समय पर ऐसी रिपोर्टें सामने आती रही हैं कि यह सिस्टम किसी न किसी रूप में मौजूद है। हालांकि इसकी वर्तमान स्थिति, तकनीकी उन्नयन और वास्तविक परिचालन क्षमता को लेकर कोई आधिकारिक और विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ‘डेड हैंड’ की सबसे बड़ी ताकत शायद उसकी तकनीक नहीं, बल्कि उससे जुड़ा मनोवैज्ञानिक प्रभाव है। केवल इसकी मौजूदगी की संभावना ही संभावित विरोधियों को यह सोचने पर मजबूर कर सकती है कि किसी भी परमाणु हमले का जवाब अवश्य मिलेगा।
परमाणु प्रतिरोध का प्रतीक
‘डेड हैंड’ केवल एक सैन्य प्रणाली नहीं, बल्कि शीत युद्ध की उस सोच का प्रतीक है जिसमें परमाणु युद्ध को रोकने के लिए ही परमाणु जवाबी हमले की गारंटी दी जाती थी। यही कारण है कि दशकों बाद भी यह सिस्टम दुनिया भर के रणनीतिक विशेषज्ञों, रक्षा विश्लेषकों और आम लोगों के बीच जिज्ञासा का विषय बना हुआ है।
नोट: ‘डेड हैंड’ (Perimeter) सिस्टम के बारे में सार्वजनिक जानकारी सीमित है और इसकी वास्तविक क्षमताओं तथा संचालन से जुड़ी कई बातें गोपनीय हैं। इसलिए इससे संबंधित कई दावे स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं किए जा सकते।








