डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम एक बार फिर जेल से बाहर आ गया है। हरियाणा सरकार की ओर से उसे 30 दिन की पैरोल दिए जाने के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। खास बात यह है कि पिछले करीब 6 वर्षों में यह 16वीं बार है जब राम रहीम को पैरोल या फरलो के जरिए जेल से बाहर आने की अनुमति मिली है। इस बार भी उसके बाहर आने के फैसले ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
गुरमीत राम रहीम फिलहाल साध्वियों से दुष्कर्म और पत्रकार हत्या मामले में सजा काट रहा है। वह रोहतक की सुनारिया जेल में बंद है। पैरोल मिलने के बाद वह जेल से बाहर निकलकर उत्तर प्रदेश के बागपत स्थित डेरा आश्रम पहुंचा, जहां उसके समर्थकों की हलचल बढ़ गई। प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था भी कड़ी कर दी है।
हरियाणा सरकार के इस फैसले पर विपक्षी दलों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। विपक्ष का आरोप है कि राम रहीम को बार-बार पैरोल देना राजनीतिक लाभ से जुड़ा फैसला हो सकता है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि एक गंभीर अपराध में सजा काट रहे व्यक्ति को इतनी बार राहत मिलना न्याय व्यवस्था और प्रशासनिक निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है।
हालांकि सरकार और प्रशासन की ओर से कहा गया है कि पैरोल नियमों के तहत दी गई है और इसमें कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया है। अधिकारियों का कहना है कि किसी भी कैदी को निर्धारित शर्तों के आधार पर पैरोल दी जा सकती है और राम रहीम का मामला भी उसी प्रक्रिया के अंतर्गत आता है।
राम रहीम को मिलने वाली लगातार पैरोल को लेकर पहले भी विवाद होता रहा है। हर बार जब उसे जेल से बाहर आने की अनुमति मिलती है, तब राजनीतिक बहस तेज हो जाती है। कई सामाजिक संगठनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने भी इस पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि गंभीर अपराधों में दोषी ठहराए गए लोगों को इतनी बार राहत मिलना पीड़ित पक्ष के लिए गलत संदेश दे सकता है।
दूसरी ओर, डेरा सच्चा सौदा के समर्थकों में खुशी का माहौल देखा जा रहा है। समर्थक इसे “आध्यात्मिक गुरु को मिली राहत” बता रहे हैं। हालांकि प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि पैरोल अवधि के दौरान राम रहीम किसी राजनीतिक गतिविधि में हिस्सा नहीं ले सकेगा और उसे तय शर्तों का पालन करना होगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हरियाणा और आसपास के राज्यों में डेरा सच्चा सौदा का बड़ा प्रभाव माना जाता है। यही वजह है कि राम रहीम से जुड़ा हर फैसला राजनीतिक रूप से संवेदनशील बन जाता है। चुनावी माहौल के दौरान उसकी पैरोल को लेकर बहस और भी तेज हो जाती है।
इस बीच सोशल मीडिया पर भी लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे कानूनी अधिकार बता रहे हैं, जबकि कई यूजर्स लगातार पैरोल दिए जाने पर सवाल उठा रहे हैं। कई लोगों ने यह भी पूछा कि क्या आम कैदियों को भी इतनी आसानी से बार-बार पैरोल मिल पाती है।
फिलहाल गुरमीत राम रहीम 30 दिन तक जेल से बाहर रहेगा। लेकिन उसके बाहर आने के साथ ही एक बार फिर यह बहस शुरू हो गई है कि क्या गंभीर मामलों में दोषी ठहराए गए कैदियों को इतनी बार राहत मिलनी चाहिए या पैरोल व्यवस्था की समीक्षा की जरूरत है।








