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July 24, 2026 12:03 am

PM मोदी के कार्टून पर सोशल मीडिया में हंगामा, लोगों ने बताया अपमानजनक

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प्रधानमंत्री Narendra Modi के हालिया नॉर्वे दौरे के बाद वहां के एक प्रमुख अखबार में प्रकाशित कार्टून को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। इस कार्टून में PM मोदी को पारंपरिक “सपेरे” के रूप में दिखाया गया, जिसके बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया। कई लोगों ने इसे भारत की छवि और भारतीय संस्कृति का अपमान बताते हुए नस्लीय और रूढ़िवादी सोच का उदाहरण करार दिया।

रिपोर्ट के मुताबिक, नॉर्वे के अखबार में छपे इस कार्टून में भारत को पुराने और स्टीरियोटिकल नजरिए से पेश करने की कोशिश की गई। कार्टून सामने आते ही भारतीय सोशल मीडिया यूजर्स ने कड़ी नाराजगी जाहिर की। एक्स (पूर्व ट्विटर), फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर हजारों लोगों ने इस पर प्रतिक्रिया दी और कहा कि आधुनिक भारत को अब भी “सपेरों के देश” के रूप में दिखाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और अपमानजनक है।

कई यूजर्स ने लिखा कि भारत आज दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, अंतरिक्ष से लेकर टेक्नोलॉजी तक अपनी मजबूत पहचान बना चुका है, ऐसे में इस तरह की प्रस्तुति पश्चिमी देशों की पुरानी मानसिकता को दर्शाती है। कुछ लोगों ने इसे “औपनिवेशिक सोच” का हिस्सा बताया, जबकि कई ने मीडिया संस्थान से सार्वजनिक माफी की मांग भी की।

राजनीतिक और सामाजिक हलकों में भी इस मुद्दे को लेकर चर्चा तेज हो गई है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि व्यंग्य और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किसी देश या उसकी संस्कृति को रूढ़िवादी छवि में दिखाना उचित नहीं माना जा सकता। वहीं कुछ लोगों ने इसे केवल एक राजनीतिक कार्टून बताते हुए विवाद को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने की बात कही।

सोशल मीडिया पर कई यूजर्स ने भारत की उपलब्धियों का जिक्र करते हुए लिखा कि जिस देश ने चंद्रयान मिशन, डिजिटल क्रांति और वैश्विक कूटनीति में नई पहचान बनाई हो, उसे “सपेरे” जैसे प्रतीकों तक सीमित करना गलत है। कुछ लोगों ने यह भी कहा कि ऐसे कार्टून अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की सकारात्मक छवि को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं।

हालांकि, इस विवाद पर अभी तक नॉर्वे के संबंधित अखबार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन इंटरनेट पर यह मुद्दा तेजी से ट्रेंड कर रहा है और बड़ी संख्या में लोग इस कार्टून को लेकर अपनी राय साझा कर रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक दौर में मीडिया की जिम्मेदारी केवल व्यंग्य करना नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संवेदनशीलता को समझना भी है। ऐसे मामलों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सम्मानजनक प्रस्तुति के बीच संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी माना जाता है।

Rashmi Repoter
Author: Rashmi Repoter

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