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March 15, 2026 6:11 pm

संडे जज्बात: चार जवान बच्चों की लाचारी देख टूटा पिता, बोला– कैसे दूं जहर, अपने ही दिल के टुकड़े हैं

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कभी-कभी जिंदगी इंसान की ऐसी परीक्षा लेती है, जिसके सामने बड़े से बड़ा हौसला भी टूट जाता है। एक ऐसा ही दिल को झकझोर देने वाला मामला सामने आया है, जहां एक पिता अपने ही चार जवान बेटे-बेटियों की हालत देखकर हर दिन अंदर ही अंदर मर रहा है। हालात इतने दर्दनाक हैं कि कई बार उसके मन में ख्याल आता है कि आखिर कब तक वह अपने बच्चों को इस हालत में देखता रहेगा, लेकिन अगले ही पल ममता उसे रोक लेती है।

यह परिवार पिछले कई सालों से ऐसी बीमारी और लाचारी से जूझ रहा है, जिसने घर की खुशियां छीन ली हैं। पिता बताता है कि उसके चारों बच्चे जवान हो चुके हैं, उनकी उम्र शादी करने की है, लेकिन वे अपने पैरों पर खड़े तक नहीं हो सकते। पूरा दिन बिस्तर पर पड़े रहते हैं और उन्हें उठाने-बैठाने से लेकर खाना खिलाने तक हर काम पिता को ही करना पड़ता है।

पिता की आंखों में आंसू आ जाते हैं जब वह कहता है कि
“लोग पूछते हैं कि इनका इलाज क्यों नहीं कराते, लेकिन कोई नहीं जानता कि मैंने अपनी पूरी जिंदगी इलाज में लगा दी। खेत बेच दिए, जेवर बेच दिए, कर्ज ले लिया, लेकिन बच्चों की हालत में कोई फर्क नहीं पड़ा।”

वह आगे बताता है कि उसके चारों बच्चे बचपन में बिल्कुल सामान्य थे, खेलते-कूदते थे, स्कूल जाते थे, लेकिन धीरे-धीरे एक अजीब बीमारी ने उन्हें जकड़ लिया। पहले चलने में दिक्कत हुई, फिर शरीर कमजोर होता गया और आज हालत यह है कि वे बिना सहारे बैठ भी नहीं पाते।

सबसे दर्दनाक बात यह है कि बच्चों की उम्र अब शादी की हो चुकी है। आस-पास के लोग अपने बच्चों की शादी कर रहे हैं, घरों में खुशियां मन रही हैं, लेकिन इस घर में सन्नाटा पसरा रहता है। पिता कहता है,
“जब किसी के घर बारात आती है तो मैं छुप जाता हूं… क्योंकि मेरे भी चार-चार बच्चे हैं, लेकिन मैं उनके हाथ पीले नहीं कर सकता।”

पिता का गला भर आता है जब वह बताता है कि आज भी वह अपने जवान बेटे-बेटियों को छोटे बच्चों की तरह चम्मच से खाना खिलाता है। उन्हें नहलाना, कपड़े बदलना, दवा देना — सब कुछ वही करता है। कई बार थककर बैठ जाता है, लेकिन बच्चों की तरफ देखता है तो फिर हिम्मत जुटा लेता है।

दर्द की इंतहा तब दिखती है जब वह कहता है,
“कई बार मन करता है कि सबको जहर दे दूं और खुद भी खत्म हो जाऊं… लेकिन अगले ही पल दिल कांप जाता है। ये मेरे बच्चे हैं, मेरे दिल के टुकड़े हैं, मैं इन्हें कैसे मार दूं?”

गांव के लोग बताते हैं कि यह परिवार वर्षों से संघर्ष कर रहा है। कई बार प्रशासन और समाजसेवियों से मदद की गुहार लगाई, लेकिन कोई स्थायी सहारा नहीं मिल पाया। परिवार की आर्थिक हालत भी कमजोर होती चली गई और अब पिता ही अकेला सहारा है।

आज यह कहानी सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि उस दर्द की कहानी है जिसे शब्दों में बयान करना आसान नहीं। एक तरफ बीमारी से जूझते चार जवान बच्चे, दूसरी तरफ एक बूढ़ा होता पिता, जो हर दिन भगवान से यही दुआ करता है कि या तो बच्चों को ठीक कर दे या फिर उसे इतना मजबूत बना दे कि वह यह दर्द सह सके।

इस दर्दनाक कहानी को सुनने वाला हर इंसान यही कहता है —
भगवान ऐसी परीक्षा किसी दुश्मन को भी न दे।

Rashima Repoter
Author: Rashima Repoter

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