गुजरात के अहमदाबाद के गणेश नगर स्लम की गरीब महिलाएं अपनी मजबूरी का दर्द बयां कर रही हैं। वे कह रही हैं कि भूख से धीरे-धीरे मरने से बेहतर है कि दवाओं के क्लिनिकल ट्रायल में हिस्सा लेकर मौत हो जाए, क्योंकि अगर ट्रायल के दौरान कुछ हुआ तो उनके बच्चों को 20-25 लाख रुपये का मुआवजा मिल जाएगा। महिलाओं का कहना है कि रिसर्च कंपनियों को उनका खून चाहिए और उन्हें पैसा, इसलिए वे जान जोखिम में डाल रही हैं।
महिलाओं की आपबीती
रिपोर्ट में अहमदाबाद से 20 किलोमीटर दूर बसी झुग्गी-बस्ती की रहने वाली बिस्मिल्लाह जैसी महिलाओं की कहानी है। बिस्मिल्लाह ने बताया कि गरीबी और भूख ने उन्हें इतना मजबूर कर दिया है कि वे सोचती हैं – “वैसे भी गरीबी में मर ही रही हूं। स्टडी के दौरान मर गई तो बच्चों को 20-25 लाख तो मिल जाएंगे, ट्रायल करा ही लेती हूं।”
उन्होंने बताया कि वे पहले भी 4 बार खुद पर दवाओं के ट्रायल में पास हो चुकी हैं। अब भी रिसर्च के लिए जाती हैं क्योंकि “यदि स्टडी के दौरान मर गई, तो मेरे पोता-पोती को 25 लाख रुपए तो मिलेंगे। यही सोचकर स्टडी के लिए चली जाती हूं।”
ये महिलाएं रमजान के महीने में भी इफ्तार की तैयारी करती हैं, लेकिन रोजी-रोटी की तंगी ऐसी है कि वे जानलेवा ट्रायल को बेहतर विकल्प मान रही हैं।
क्लिनिकल ट्रायल का काला सच
- भारत में क्लिनिकल ट्रायल के नियम सख्त हैं, लेकिन गरीब इलाकों में कई बार महिलाएं और पुरुष कम पैसे के लालच में या मजबूरी में हिस्सा लेते हैं।
- ट्रायल में मौत होने पर कंपेंसेशन (मुआवजा) मिलता है, जो 20-25 लाख तक हो सकता है, खासकर अगर गंभीर साइड इफेक्ट या मौत हो।
- रिपोर्ट में महिलाओं का बयान है कि रिसर्च कंपनियां या एजेंट उन्हें खून (ब्लड सैंपल) के लिए बुलाते हैं और ट्रायल के जोखिम बताते हैं, लेकिन गरीबी के आगे सब कुछ फीका पड़ जाता है।
समाज पर बड़ा सवाल
यह कहानी सिर्फ अहमदाबाद की नहीं, बल्कि पूरे देश की गरीबी, बेरोजगारी और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी की तस्वीर पेश करती है। जहां लोग भूख से मरने के बजाय जान बेचने को तैयार हैं, वहां सिस्टम की असफलता साफ नजर आती है।
- क्या क्लिनिकल ट्रायल में गरीबों का शोषण रोकने के लिए और सख्त कानून चाहिए?
- क्या सरकार को गरीब परिवारों के लिए बेहतर सामाजिक सुरक्षा और रोजगार सुनिश्चित करना चाहिए?
ब्लैकबोर्ड सीरीज इस तरह की स्याह कहानियों को उजागर कर रही है, जो समाज के सबसे निचले तबके की पीड़ा को सामने लाती है। यह रिपोर्ट न सिर्फ चौंकाती है, बल्कि सोचने पर मजबूर भी करती है कि विकास की चकाचौंध के पीछे कितनी जिंदगियां दम तोड़ रही हैं।






