देश की न्यायपालिका ने एक बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक फैसले में 13 साल से कोमा में पड़े एक युवक को इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी है। माता-पिता की लंबी कानूनी लड़ाई और लगातार की गई गुहार के बाद सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में मानव गरिमा, पीड़ा और जीवन की गुणवत्ता को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
मामले के अनुसार युवक पिछले 13 वर्षों से कोमा की स्थिति में था और डॉक्टरों के अनुसार उसके ठीक होने की कोई संभावना नहीं थी। परिवार लंबे समय से उसकी देखभाल कर रहा था, लेकिन लगातार शारीरिक, मानसिक और आर्थिक परेशानी के कारण माता-पिता ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने कोर्ट से अपील की थी कि उनके बेटे को कृत्रिम लाइफ सपोर्ट सिस्टम के सहारे जीवित रखना केवल पीड़ा को बढ़ा रहा है, इसलिए उसे इच्छामृत्यु की अनुमति दी जाए।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट, डॉक्टरों की राय और परिवार की स्थिति को विस्तार से देखा। मेडिकल विशेषज्ञों ने कोर्ट को बताया कि मरीज की हालत में सुधार की कोई संभावना नहीं है और वह पूरी तरह लाइफ सपोर्ट पर निर्भर है। इसके बाद अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में “सम्मान के साथ मरने का अधिकार” भी संविधान के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा माना जा सकता है।
कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि यह फैसला विशेष परिस्थितियों को देखते हुए दिया गया है और इसे सामान्य नियम नहीं माना जाएगा। अदालत ने यह भी कहा कि इच्छामृत्यु की अनुमति केवल सख्त कानूनी प्रक्रिया और मेडिकल जांच के बाद ही दी जा सकती है, ताकि किसी तरह के दुरुपयोग की संभावना न रहे।
इस फैसले को कानूनी विशेषज्ञ एक ऐतिहासिक कदम मान रहे हैं। उनका कहना है कि इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु को कुछ शर्तों के साथ मंजूरी दी थी, लेकिन इस तरह लंबे समय से कोमा में पड़े मरीज के मामले में अनुमति मिलना बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
परिवार ने फैसले के बाद कहा कि यह उनके लिए भावनात्मक रूप से बहुत कठिन निर्णय था, लेकिन वे अपने बेटे को लगातार पीड़ा में नहीं देखना चाहते थे। उन्होंने अदालत का धन्यवाद करते हुए कहा कि उन्हें उम्मीद है कि अब उनके बेटे को शांति मिलेगी।
यह फैसला पूरे देश में इच्छामृत्यु, जीवन के अधिकार और मानव गरिमा को लेकर नई बहस छेड़ सकता है। कानूनी और सामाजिक विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में ऐसे मामलों के लिए और स्पष्ट दिशा-निर्देश बनाए जाने की जरूरत पड़ेगी।






