पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में चल रहे युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव का सीधा असर दिल्ली के प्रमुख बाजारों पर पड़ रहा है। ईरान-इजरायल संघर्ष और संबंधित क्षेत्रीय अशांति के कारण शिपिंग रूट्स बाधित हो गए हैं, फ्रेट रेट्स दोगुने से ज्यादा हो गए हैं, और सप्लाई चेन पर गहरा असर पड़ा है। नतीजा? दिल्ली के बाजारों में इलेक्ट्रॉनिक सामान महंगा हो गया है, जबकि बासमती चावल के दामों में तेज गिरावट आई है।
इलेक्ट्रॉनिक सामान क्यों महंगा?
- भारत इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए जरूरी कंपोनेंट्स (जैसे सेमीकंडक्टर, चिप्स, डिस्प्ले पैनल आदि) का बड़ा हिस्सा आयात करता है, खासकर चीन और अन्य एशियाई देशों से।
- युद्ध के कारण समुद्री रूट्स (जैसे होर्मुज स्ट्रेट) प्रभावित हैं, जिससे शिपिंग कॉस्ट 30-40% तक बढ़ गई है।
- रुुपये की कमजोरी और इंपोर्ट बिल बढ़ने से मोबाइल, टीवी, फ्रिज, लैपटॉप और अन्य गैजेट्स की कीमतें दिल्ली के बाजारों (जैसे नेहरू प्लेस, लाजपत नगर) में 5-15% तक बढ़ गई हैं।
- ट्रेडर्स का कहना है कि अगर युद्ध लंबा चला तो प्रोडक्शन कॉस्ट और बढ़ेगी, जिसका बोझ सीधे कंज्यूमर्स पर पड़ेगा।
बासमती चावल के दाम क्यों गिरे?
- मिडिल ईस्ट (ईरान, सऊदी अरब, यूएई आदि) भारत के बासमती चावल का सबसे बड़ा बाजार है—करीब 50% एक्सपोर्ट यहां जाता है।
- युद्ध से शिपिंग रूट्स ब्लॉक, फ्रेट रेट्स आसमान छू रहे हैं, और नए ऑर्डर रुके हुए हैं।
- करीब 4 लाख टन बासमती चावल पोर्ट्स पर या ट्रांजिट में फंसा हुआ है, जिससे घरेलू बाजार में सरप्लस बढ़ गया।
- दिल्ली के नए बाजार (नया बाजार) और अन्य थोक मंडियों में बासमती की कीमतें 5-10% तक गिर गई हैं। कुछ वैरायटी में 400-500 रुपये प्रति क्विंटल की गिरावट दर्ज की गई।
- एक्सपोर्टर्स का कहना है कि अगर संकट जारी रहा तो घरेलू बाजार में और सस्ता हो सकता है, जो कंज्यूमर्स के लिए राहत की बात है।
ट्रेड एक्सपर्ट्स चेतावनी दे रहे हैं कि अगर युद्ध लंबा खिंचा तो इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य इंपोर्टेड गुड्स पर महंगाई का दबाव बढ़ेगा, जबकि एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड प्रोडक्ट्स जैसे बासमती चावल घरेलू स्तर पर सस्ते रह सकते हैं। दिल्ली के बाजारों में अभी यह दोहरा असर साफ दिख रहा है—एक तरफ गैजेट्स खरीदना महंगा, दूसरी तरफ प्रीमियम चावल सस्ता!






