ओ मेरे मित्रों !
जामान की पवित्र स्थली में स्थित ‘पाराण’ नामक पर्वत पर जिस संविदा के अन्तर्गत तुम मेरे साथ वचनबद्ध हुए थे, उसे याद करो। दिव्य गण तथा अमर पुरी के वासियों को मैंने उसका साक्षी बनाया है, तब भी अब मुझे एक भी ऐसा प्राणी नहीं दिखता है जो उस वचन के प्रति निष्ठावान हो। निश्चय ही गर्व और द्रोह ने उसे हृदयों से इस तरह मिटा दिया है कि उस बात का चिह्न मात्र भी शेष नहीं रहा है। किन्तु, यह जानते हुए भी मैं प्रतीक्षा करता रहा और मैंने उसका भेद नहीं खोला।
बहाउल्लाह~
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