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November 5, 2026 3:23 pm

रिव्यू: भव्य दृश्य, लाजवाब अदाकारी, कसा हुआ निर्देशन, दर्शकों का दिल जीतने में सफल हुई रामायण पार्ट 1

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—राजेश कुमार भगताणी

बेसब्री से महाकाव्य को तकनीकी श्रेष्ठता के साथ परदे पर देखने का इंतजार कर रहे दर्शकों ने जैसे ही सिनेमाई परदे पर रामायण का सेंसर बोर्ड सर्टिफिकेट देखा वैसे ही सिनेमाघर तालियों की गडग़ड़ाहट से गूंज उठे। कथानक में राम बने रणबीर कपूर की एंट्री के साथ ही सिनेमाघरों में जयश्री राम का घोष होने लगा। दर्शक के उन्माद को देखकर इस बात का शिद्दत से अहसास हुआ कि भारतीय महाकाव्य रामायण हर उम्र के दिलों में आज भी अपनी जगह बनाए हुए है।

भारतीय जनमानस में रामायण की कहानी सदियों से रची-बसी है। शायद ही कोई ऐसा भारतीय हो जिसने रामायण के बारे में न सुना हो, इसे पढ़ा न हो, देखा न हो या फिर स्कूल के किसी नाटक में इसका मंचन न किया हो। करीब 39 साल पहले रामानंद सागर की रामायण ने छोटे पर्दे पर ऐसा इतिहास रचा था कि हर रविवार देश की रफ्तार थम सी जाती थी। लोग अपने सारे काम छोडक़र टेलीविजन के सामने बैठ जाते थे और धारावाहिक के प्रसारण के दौरान सडक़ों तक पर सन्नाटा छा जाता था। उस ऐतिहासिक प्रस्तुति का सांस्कृतिक प्रभाव आज भी लोगों की स्मृतियों में जीवित है। ऐसे में उस विरासत के सामने खड़ी हो सकने वाली फिल्म बनाना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था।

नमित मल्होत्रा की फिल्म काफी हद तक अपनी उम्मीदों पर खरी उतरती है। निर्देशक नितेश तिवारी की यह प्रस्तुति एक ऐसी जानी-पहचानी कथा को नए सिनेमाई अंदाज में सामने लाती है, जिसकी कहानी और किरदार भारतीय दर्शकों के लिए पहले से ही बेहद परिचित हैं। फिल्म में रणबीर कपूर, साई पल्लवी और यश जैसे कलाकारों की मौजूदगी इसे खास बनाती है।

मध्यान्तर पूर्व धीमी गति, किरदारों का विस्तार करता है प्रभावित

फिल्म की कहानी महर्षि वाल्मीकि की रामायण पर आधारित है और इसकी शुरुआत रावण के अतीत से होती है। इसके बाद कहानी धीरे-धीरे उसके सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी भगवान राम की ओर बढ़ती है। इस तरह फिल्म के शुरुआती हिस्से में ही दोनों प्रमुख किरदारों के व्यक्तित्व और उनके बीच के वैचारिक अंतर को स्थापित करने का प्रयास किया गया है। श्रीधर राघवन और नितेश तिवारी की पटकथा में भावनात्मक और नाटकीय प्रसंगों की अच्छी जगह है, लेकिन फिल्म का पहला भाग अपेक्षाकृत धीमी गति से आगे बढ़ता है।

फिल्म को दो हिस्सों में बनाने के फैसले ने निर्माताओं को किरदारों के विस्तार और उनके व्यक्तित्व को गहराई से दिखाने का पर्याप्त अवसर दिया है। हालांकि, इसी वजह से लगभग हर प्रमुख किरदार के परिचय में काफी समय लगाया गया है। कई जगह यह विस्तार कहानी की गति को प्रभावित करता है और पहला हिस्सा थोड़ा खिंचा हुआ महसूस होता है। इसके अलावा, एआई तकनीक से तैयार की गई डबिंग में भी कुछ छोटी-मोटी खामियां नजर आती हैं।

हालांकि, दूसरे भाग में फिल्म की रफ्तार बढ़ जाती है। एक्शन और भव्य दृश्यों का ऐसा सिलसिला शुरू होता है, जो दर्शकों को बांधे रखने में कामयाब रहता है। खास तौर पर फिल्म के दृश्य प्रभाव यानी वीएफएक्स इसकी सबसे बड़ी खूबियों में शामिल हैं। डीएनईजी की ओर से तैयार किए गए इन दृश्यों पर निर्माताओं ने काफी मेहनत और संसाधन खर्च किए हैं। फिल्म के कथित तौर पर करीब 4,000 करोड़ रुपये के बजट को देखते हुए इसके तकनीकी पक्ष से उम्मीदें काफी अधिक थीं।

खुशी की बात यह है कि पर्दे पर यह भारी-भरकम निवेश साफ दिखाई देता है। फिल्म केवल वीएफएक्स के सहारे आगे बढऩे वाली सामान्य प्रस्तुति नहीं है, बल्कि इसके हर बड़े दृश्य को प्रभावशाली बनाने के लिए बारीकियों पर ध्यान दिया गया है। भव्यता, तकनीकी गुणवत्ता और दृश्य संयोजन के मामले में ‘रामायण पार्ट 1’ हॉलीवुड की बड़ी फिल्मों को भी टक्कर देती नजर आती है।

रामायण के मूल प्रसंगों और उनसे जुड़ी मान्यताओं को प्रस्तुत करने में सावधानी बरती

फिल्म की एक और खास बात यह है कि निर्माताओं ने रामायण के मूल प्रसंगों और उनसे जुड़ी मान्यताओं को प्रस्तुत करने में सावधानी बरती है। रावण द्वारा कुबेर की लंका पर अधिकार करने का प्रसंग हो, उसकी भगवान शिव के प्रति अगाध भक्ति हो या फिर कैकेयी को अपनी गलती का अहसास होने वाला भावनात्मक क्षण, इन सभी दृश्यों को प्रभावी तरीके से फिल्माया गया है। कहानी के मूल स्वरूप और भारतीय दर्शकों की धार्मिक-सांस्कृतिक स्मृतियों के साथ छेड़छाड़ करने से बचा गया है। इस लिहाज से फिल्म उन गलतियों को दोहराती नहीं दिखती, जिनके लिए पहले कुछ पौराणिक फिल्मों की आलोचना हुई थी।

उम्मीदों पर पूरी तरह खरा नहीं उतरा संगीत

रामायण के संगीत और बैकग्राउंड स्कोर को लेकर काफी अरसे चर्चाओं का बाजार गर्म रहा है। हॉलीवुड के सुप्रसिद्ध संगीतकार हैंस जिमर और भारतीय संगीत जगत के दिग्गज एआर रहमान का एक साथ आना अपने आप में बड़ी बात है। दोनों की साझेदारी से दर्शकों को असाधारण संगीत की उम्मीद थी। फिल्म में कई जगह संगीत दृश्यों के प्रभाव को बढ़ाता है और सुनने में भी अच्छा लगता है, लेकिन जिस स्तर की उम्मीद इस सहयोग से की गई थी, अंतिम परिणाम उस ऊंचाई तक नहीं पहुंच पाता। संगीतकारों की यह जोड़ी दर्शकों को निराश करती है।कुछ गीत ऐसे भी लगते हैं, जिनकी कहानी में विशेष आवश्यकता महसूस नहीं होती। फिल्म के भावनात्मक और नाटकीय प्रवाह के बीच कुछ मौकों पर गाने अनावश्यक प्रतीत होते हैं। ऐसे में संगीत फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष बनने के बजाय एक ऐसा पहलू रह जाता है, जिसमें और बेहतर काम किया जा सकता था।

यश ने रावण के किरदार में जमाया रंग

अभिनय की बात करें तो यश ने रावण के किरदार में शानदार प्रभाव छोड़ा है। ‘टॉक्सिक’ के बाद इस फिल्म में उनका प्रदर्शन उन्हें एक बार फिर मजबूत स्थिति में खड़ा करता है। रावण के रूप में उनका आत्मविश्वास, अंदाज, चेहरे पर दिखाई देने वाला अहंकार और संवाद अदायगी किरदार को प्रभावशाली बनाते हैं। उनकी चाल-ढाल और व्यक्तित्व में रावण की सत्ता, घमंड और प्रभाव साफ नजर आता है।

निर्माताओं ने रावण के दस मुखों की अवधारणा को भी दिलचस्प तरीके से पर्दे पर उतारा है। इस प्रस्तुति में रावण के अलग-अलग व्यक्तित्व और उसके चरित्र के विविध पहलुओं को दिखाने की कोशिश की गई है। यश का अभिनय इस पूरे चित्रण को और प्रभावशाली बना देता है। फिल्म देखने के बाद रावण के किरदार को लेकर उनकी चर्चा होना तय है।

राम के रूप में कमजोर नजर आए रणबीर कपूर

भगवान राम का नाम लेते ही भारतीयों का तन-मन श्रद्धा से भावविभोर होकर दमकने लगता है। रामानन्द सागर की रामायण में राम बने अरुण गोविल ने अपने चेहरे पर आने वाली मधुर मुस्कान और आँखों के भावों से जो जादू दर्शकों पर चलाया था, यहाँ रणबीर कपूर वैसा करने में असफल नजर आते हैं। उनका अभिनय कुछ पहलुओं में अच्छा है, लेकिन यह किरदार पूरी तरह प्रभाव छोडऩे में थोड़ा पीछे रह जाता है। एक्शन दृश्यों में रणबीर सहज दिखाई देते हैं और उनके अभिनय में मेहनत भी नजर आती है, लेकिन भगवान राम के व्यक्तित्व से जुड़ी वह भक्ति, गरिमा और आध्यात्मिक अनुभूति पूरी तरह उभरकर सामने नहीं आती, जिसकी दर्शकों को उम्मीद थी।

इस मामले में अरुण गोविल की राम के रूप में पुरानी छवि आज भी दर्शकों के मन में गहराई से बसी हुई है। खास बात यह है कि अरुण गोविल इस फिल्म में राजा दशरथ की भूमिका निभा रहे हैं। राम का किरदार निभाने के बाद अब उनके पिता की भूमिका में उन्हें देखना दर्शकों के लिए एक भावुक और सुखद संयोग है। राजा दशरथ के रूप में उनका अभिनय बेहद सधा हुआ है और वह अपने किरदार के साथ पूरी तरह न्याय करते हैं।

लारा दत्ता कैकेयी की भूमिका में प्रभावशाली नजर आती हैं। वहीं, मंथरा के किरदार में शीबा चड्ढा की कास्टिंग बेहद सटीक लगती है। रामायण की कहानी में एक बड़े मोड़ की वजह बनने वाली मंथरा के लिए उनसे बेहतर चुनाव करना मुश्किल लगता है। भले ही फिल्म में उनका महत्वपूर्ण दृश्य सीमित समय के लिए आता है, लेकिन वह अपनी छाप छोडऩे में सफल रहती हैं।

सीता के रूप में साई पल्लवी ने जीता दिल

साई पल्लवी के सीता के किरदार में नजर आते ही उनकी कास्टिंग को लेकर उठने वाले सवाल अपने आप खत्म हो जाते हैं। सीता के रूप में वह सहज, सौम्य और गरिमामयी दिखाई देती हैं। उनके अभिनय में किरदार के अनुरूप शालीनता और भावनात्मक गहराई नजर आती है। वह अपनी उपस्थिति से सीता के व्यक्तित्व को प्रभावी तरीके से सामने रखती हैं।
वहीं, लक्ष्मण की भूमिका में रवि दुबे भी काफी जंचते हैं। उन्होंने लक्ष्मण के चरित्र से जुड़ी भाई के प्रति निष्ठा, समर्पण और आवेगपूर्ण स्वभाव को अच्छी तरह आत्मसात किया है। उनके अभिनय में किरदार की भावनाएं और उसके व्यक्तित्व के अलग-अलग पहलू स्पष्ट दिखाई देते हैं।

जटायु का प्रसंग फिल्म का सबसे यादगार हिस्सा

फिल्म का सबसे प्रभावशाली और यादगार दृश्य जटायु से जुड़ा प्रसंग है। जब रावण माता सीता का हरण करके उन्हें अपने साथ ले जा रहा होता है, तब वीर जटायु उन्हें बचाने के लिए रावण से भिड़ जाता है। इस पूरे घटनाक्रम को जिस भव्यता और भावनात्मक प्रभाव के साथ फिल्माया गया है, वह दर्शकों के मन में लंबे समय तक बना रहेगा ऐसी उम्मीद है।

अनुपम खेर ने जटायु को अपनी आवाज दी है और फिल्म के चरम हिस्से में उनका यह किरदार कहानी के सबसे महत्वपूर्ण आकर्षणों में से एक बनकर उभरता है। जटायु की वीरता, त्याग और सीता की रक्षा के लिए उसका संघर्ष फिल्म को एक अलग भावनात्मक ऊंचाई प्रदान करता है।

फिल्म में कई और ऐसे दृश्य हैं, जिन्हें इसकी सबसे बड़ी खूबियों में शामिल किया जा सकता है। शुरुआत में ब्रह्मा और रावण के बीच का प्रसंग दर्शकों को प्रभावित करता है। इसके बाद रावण का लंका पर अपना अधिकार जताने वाला दृश्य कहानी को एक भव्य रूप देता है। भगवान राम और राक्षसों के बीच जंगल में होने वाला संघर्ष भी फिल्म के उल्लेखनीय दृश्यों में शामिल है।

इसके अलावा सीता स्वयंवर का प्रसंग बेहद प्रभावशाली तरीके से फिल्माया गया है। फिल्म के मध्यांतर से पहले राजा दशरथ, कैकेयी और भगवान राम के बीच होने वाले भावनात्मक घटनाक्रम भी दर्शकों की आँखें नमे करने में सफल रहता है। इस हिस्से में पारिवारिक संबंधों, त्याग और भावनाओं को जिस तरह पर्दे पर दिखाया गया है, वह दर्शकों के मन को छूने वाला बताया गया है।

रावण और उसके बहनोई विद्युतजीव के बीच होने वाला युद्ध, शूर्पणखा का प्रसंग भी फिल्म के महत्वपूर्ण दृश्यों में शामिल हैं। इन दृश्यों में एक्शन, रोमांच और दृश्यात्मक भव्यता का शानदार तालमेल देखने को मिलता है।

अगले भाग से और बड़ी उम्मीदें

कुल मिलाकर देखें तो रावण के दस सिर भले ही थे, लेकिन फिल्म निर्माताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती पूरे देश की उम्मीदों पर खरा उतरने की थी। रामायण पार्ट 1 इस कठिन चुनौती को काफी हद तक सफलतापूर्वक पार करती है। फिल्म एक ओर अपनी भव्यता और शानदार दृश्य प्रभावों से प्रभावित करती है, वहीं दूसरी ओर रामायण के मूल भावनात्मक प्रसंगों और कहानी की आत्मा को बनाए रखने की कोशिश भी करती है।

हालांकि, धीमी शुरुआत और संगीत से जुड़ी कुछ कमजोरियां फिल्म के प्रभाव को थोड़ा कम करती हैं, लेकिन दमदार अभिनय, शानदार तकनीकी काम और जटायु जैसे यादगार दृश्यों के कारण फिल्म अपनी अलग पहचान बनाने में सफल रहती है।

अब दर्शकों की निगाहें इसके दूसरे भाग पर टिकी हैं। अगले भाग में सनी देओल हनुमान के किरदार में नजर आएंगे। इसके साथ ही संजीवनी बूटी वाला प्रसंग और राम-रावण के बीच होने वाला बहुप्रतीक्षित युद्ध भी कहानी का हिस्सा होगा। ऐसे में दूसरे भाग के सामने चुनौतियां और भी बड़ी होंगी। हालांकि, पहले भाग को देखकर लगता है कि निर्माता इस महाकाव्य को पर्दे पर उतारने की दिशा और उसके महत्व को अच्छी तरह समझते हैं।

निर्देशक नितेश तिवारी दूसरे भाग को किस तरह से पेश करेंगे यह तो वर्ष 2028 में पता चलेगा लेकिन उन्हें पहले भाग की उन गलतियों को सुधारना होगा जिसकी समीक्षकों और जनता जनार्दन द्वारा आलोचना की जा रही है। विशेष रूप से फिल्म की गति को तेज रखना होगा, जो दर्शकों को शुरूआत से ही अपने साथ जोडऩे में सफल हो और संगीत पर विशेष ध्यान देना होगा साथ ही अनावश्यक रूप से रखे गए गीतों को भी कम करना होगा। यदि नितेश तिवारी इन कमियों को दूर करने का प्रयास करते हैं तो ही उनकी रामायण पूरी तरह से दर्शकों को अपने वश में करने में सफल होगी।

फिल्म का पूरा कथानक दर्शकों को पहले से पता है ऐसे में उस कथानक को कितने गहराई से नितेश तिवारी परदे पर उतारने में कामयाब होते हैं यही दूसरे भाग की सबसे बड़ी विशेषता होगी। रामायण का अंत दर्शकों को पहले से मालूम है, लेकिन उस अंत तक पहुंचने का सिनेमाई सफर अब और भी रोमांचक होगा यह उम्मीद हर दर्शक को है।

 

Rajesh Bhagtani
Author: Rajesh Bhagtani

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