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October 11, 2026 4:27 pm

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दिल्ली में प्रदर्शनकारियों को गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में न लिया जाए; सामान्य रूप से चलेंगे मेट्रो और इंटरनेट : सुप्रीम कोर्ट

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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को आदेश दिया कि शांतिपूर्ण और निहत्थे प्रदर्शनकारियों को कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा हिरासत में नहीं लिया जा सकता। इसके साथ ही अदालत ने निर्देश दिया कि दिल्ली में मेट्रो और रेलवे सेवाएं सामान्य रूप से चलाई जाएं, इंटरनेट कनेक्टिविटी निर्बाध रहे और लोगों की आवाजाही को बहाल किया जाए।

अदालत ने अधिकारियों को सर्वोच्च न्यायालय और अन्य अदालत परिसरों के आसपास लागू निषेधाज्ञा (पाबंदियों) से संबंधित नोटिस को हटाने का भी आदेश दिया ताकि बिना किसी बाधा के न्याय तक पहुंच सुनिश्चित की जा सके।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ शनिवार को हुए विरोध प्रदर्शन से पहले बड़े पैमाने पर हिरासत, आवाजाही पर प्रतिबंध, इंटरनेट सेवाओं के निलंबन और परिवहन प्रतिबंधों पर कोर्ट के 9 अक्टूबर के आदेश का पालन न करने के आरोपों वाली याचिकाओं पर तत्काल सुनवाई के बाद जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की विशेष पीठ ने ये निर्देश जारी किए।

गौरतलब है कि शनिवार को लगभग 41,000 सुरक्षाकर्मियों ने नियोजित विरोध प्रदर्शन को नाकाम करने के लिए राजधानी को एक किले में तब्दील कर दिया था और 7,000 लोगों को हिरासत में लिया था।

रविवार को विशेष सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने निर्देश दिया कि मेट्रो और रेल सुविधाएं सामान्य रूप से चलें, जब तक कि संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत कानून व्यवस्था की स्थिति से निपटने के लिए पाबंदियां आवश्यक न हों। इसके अतिरिक्त अदालत ने कहा कि शहर में लोगों की मुफ्त आवाजाही की अनुमति दी जाए, इंटरनेट सेवाएं कानून के अनुसार चालू रहें, और किसी भी व्यक्ति को (विशेषकर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत घोषित क्षेत्र से बाहर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों को) केवल कानूनी प्रक्रिया का पालन करके ही हिरासत में लिया जाए।

कोर्ट ने 9 अक्टूबर के आदेश का पालन न करने के आरोपों पर दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन, संबंधित रेलवे अधिकारियों और दिल्ली पुलिस सहित अवमानना कार्यवाही के कथित आरोपियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

अदालत ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे अवमानना याचिकाओं के जवाब में संक्षिप्त हलफनामे दायर करें और विनियमित मेट्रो/रेल सेवाओं व ट्रैफिक एडवाइजरी के प्रकाशन पर शुक्रवार के निर्देशों को लागू करने के लिए उठाए गए कदमों का विवरण देते हुए अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करें।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि शनिवार को मेट्रो सेवाएं सामान्य रूप से चली थीं, हालांकि नेटवर्क के 303 स्टेशनों में से 45 स्टेशनों पर प्रवेश और निकास प्रतिबंधित था। पीठ ने प्रभावित स्टेशनों का विवरण मांगा और अधिकारियों को मंगलवार तक अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश देते हुए मामले को 13 अक्टूबर के लिए सूचीबद्ध कर दिया।

कोर्ट ने पाबंदियों की सीमाएं दोहराईं

ये निर्देश मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में कथित अनियमितताओं को लेकर ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और अन्य राजनीतिक समूहों के विरोध प्रदर्शन से पहले सार्वजनिक परिवहन पर लगाई गई पाबंदियों के खिलाफ अदालत के हस्तक्षेप के एक दिन बाद आए हैं। शुक्रवार को भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने अधिकारियों को मेट्रो स्टेशनों को बंद करने पर पुनर्विचार करने और जनता की असुविधा को कम करने के लिए पूरी तरह से रोक लगाने के बजाय सेवाओं को विनियमित (रेगुलेट) करने का निर्देश दिया था।

रविवार की सुनवाई में पीठ ने उन आरोपों का संज्ञान लिया कि शुक्रवार के आदेश की अवहेलना की गई थी। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि मेट्रो और रेलवे सुविधाएं अनुपलब्ध रहीं, लोगों को प्रतिबंधित क्षेत्रों से बाहर भी हिरासत में लिया गया और शहर में कर्फ्यू जैसा माहौल देखा गया।

पीठ ने टिप्पणी की, हम इस बात पर विचार करना चाहेंगे कि पुलिस की कार्रवाई अनुच्छेद 19 (विरोध करने और आवाजाही के अधिकार) के तहत अभिव्यक्ति की आवश्यकता के साथ किस हद तक तालमेल बिठाती है।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसकी चिंता सभी व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा करना है, चाहे वे वकील हों, प्रदर्शनकारी हों या पुलिसकर्मी। कोर्ट ने कहा, अदालतें व्यक्तियों की पहचान से बेखबर होती हैं, चाहे वह पुलिस अधिकारी हो या वकील। अदालत का रुख और चिंता सभी व्यक्तियों के अधिकारों और स्वतंत्रता की रक्षा करना है।

वकीलों ने पुलिस ज्यादती और अवैध हिरासत का आरोप लगाया

शनिवार को दिल्ली भर में पुलिस की व्यापक कार्रवाई के बाद ये याचिकाएं दायर की गई थीं, जिसमें विपक्षी नेताओं, छात्रों, वकीलों और अन्य प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया था। तृणमूल कांग्रेस की सांसद और वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने चार पूर्व मुख्यमंत्रियों सहित विपक्षी नेताओं की निवारक हिरासत को चुनौती दी, जबकि अन्य याचिकाओं में पाबंदियों की वैधता पर सवाल उठाए गए।

वरिष्ठ अधिवक्ता के.के. वेणुगोपाल, कपिल सिब्बल, गोपाल शंकरनारायणन और अन्य पीठ के समक्ष पेश हुए। सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन और अन्य वकीलों ने आवाजाही पर प्रतिबंध और वकीलों की हिरासत पर चिंता जताई।

वरिष्ठ अधिवक्ता शादन फरासत ने कोर्ट को बताया कि शनिवार को दिल्ली में स्थिति दमनकारी थी और लोगों को खड़े होने या स्वतंत्र रूप से घूमने तक की अनुमति नहीं दी जा रही थी। उन्होंने बताया कि उन्हें खुद चलती बस में उठाकर फेंक दिया गया था, और शहर पुलिस राज्य बनने से बस एक कदम दूर था।

शंकरनारायणन ने तर्क दिया कि ऐसे वीडियो और तस्वीरें रिकॉर्ड पर रखी गई हैं जिनमें दिनेश द्विवेदी, उत्तरा बब्बर और फरासत सहित वरिष्ठ वकीलों को जंतर-मंतर के अधिकार क्षेत्र से बाहर हिरासत में लेते देखा जा सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि बच्चों, महिलाओं, छात्रों और बुजुर्गों के साथ धक्का-मुक्की और मारपीट की गई।

जस्टिस मोहना ने विरोध करने का अधिकार मांगने वालों से शांतिपूर्ण रहने की अपील की। उन्होंने कहा, कृपया वचन दें कि आप शांतिपूर्ण प्रदर्शन करेंगे और उकसाएंगे नहीं।

जस्टिस बागची ने केंद्र और दिल्ली पुलिस की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल मेहता को आश्वासन दिया, कृपया आश्वस्त रहें कि हम निष्पक्ष मध्यस्थ रहेंगे। लेकिन साथ ही, अनुच्छेद 32 के तहत हम नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा और सुरक्षा के लिए बाध्य हैं।

विरोध का अधिकार कानूनी पाबंदियों के अधीन है

सुनवाई के दौरान विरोध के अधिकार के दायरे पर भी चर्चा हुई। वरिष्ठ अधिवक्ता शोएब आलम ने तर्क दिया कि अनुच्छेद 19(1) के तहत दिए गए अधिकारों का उल्लंघन हुआ है। पीठ ने स्पष्ट किया कि ये अधिकार अनुच्छेद 19(2) के तहत उचित प्रतिबंधों के अधीन हैं, लेकिन जैसा कि सीजेआई की पीठ ने स्पष्ट किया था, पाबंदी का मतलब पूरी तरह से रोक नहीं होता।

पीठ ने कहा, जिस प्रक्रिया से आप विरोध करते हैं वह कानून के अनुसार होनी चाहिए। विरोध का अधिकार कानूनी ढांचे से बाहर या अनुच्छेद 19(2) के उल्लंघन में नहीं हो सकता।

अवमानना मामले में पेश हुईं मेनका गुरुस्वामी ने आपातकाल और 1976 के विवादास्पद एडीएम जबलपुर मामले का हवाला देते हुए अदालत से उस दौर की गलतियों को न दोहराने का आग्रह किया।

अवमानना याचिका में आदेश के उल्लंघन का आरोप

अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी द्वारा दायर अवमानना याचिका में केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन, दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार और डीएमआरसी की अध्यक्ष डी. थारा का नाम शामिल है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि अधिकारी शुक्रवार के उस आदेश का पालन करने में विफल रहे जिसमें 57 मेट्रो स्टेशनों को बंद करने के प्रस्ताव पर पुनर्विचार करने और ट्रैफिक एडवाइजरी का व्यापक प्रचार करने को कहा गया था।

सॉलिसिटर जनरल मेहता ने आरोपों का खंडन करते हुए बताया कि नेटवर्क के 303 स्टेशनों में से केवल 45 स्टेशनों पर प्रवेश और निकास सीमित किया गया था, जबकि शनिवार को 4,000 से अधिक मेट्रो फेरे संचालित किए गए। उन्होंने कोर्ट को बताया कि शनिवार रात 10 बजे से सभी मेट्रो स्टेशन खोल दिए गए हैं और इंटरनेट बहाल कर दिया गया है।

हालांकि, पीठ ने उन 45 स्टेशनों का ब्योरा मांगा है और मंगलवार तक जवाब दाखिल करने को कहा है। अदालत ने कहा कि अधिकारियों को हिरासत के तीन पहलुओं पर संतुष्ट करना होगा- किन परिस्थितियों में हिरासत में लिया गया, हिरासत किस तरीके से की गई, और इसका औचित्य क्या था।

मामले की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर को होगी।

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