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August 31, 2026 11:58 am

भागवत के बयान से गरमाई सियासत! मदनी बोले- नफरत फैलाने वालों पर भी होनी चाहिए कार्रवाई

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत के अमेरिका में दिए गए बयान को लेकर देश में राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। भागवत ने अपने संबोधन में भारत की विविधता, एकता और सभी समुदायों के साथ मिलकर रहने की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि अगर कोई हिंदू यह मानता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए, तो वह हिंदू नहीं रहेगा। उनके इस बयान पर जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख मौलाना अरशद मदनी ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ऐसे विचारों को भारत में भी व्यवहार में उतारने की जरूरत है।

मदनी ने उठाया कार्रवाई का सवाल

मदनी ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अमेरिका में विविधता, भाईचारे और सभी धर्मों के सम्मान की बात करना अच्छी बात है, लेकिन इसकी वास्तविक जरूरत भारत में है। उन्होंने सवाल किया कि अगर भागवत अपने बयान को लेकर गंभीर हैं, तो नफरत फैलाने वालों से खुले तौर पर दूरी क्यों नहीं बनाई जाती और उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं होती।

मदनी ने विशेष रूप से ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की, जिन पर धार्मिक समुदायों के बीच नफरत फैलाने, हिंसा का समर्थन करने या सामाजिक बहिष्कार की अपील करने जैसे आरोप लगते हैं। उन्होंने कहा कि किसी विचार की सच्चाई केवल भाषण से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार में दिखाई देने से साबित होती है।

भागवत ने अमेरिका में क्या कहा था?

भागवत ने न्यूयॉर्क में अपने संबोधन के दौरान भारत की बहुलतावादी परंपरा और विविधता में एकता पर जोर दिया था। उन्होंने कहा कि भारत में अलग-अलग धर्मों और समुदायों के लोग साथ रहते हैं और यही देश की विशेषता है।

उनके बयान में यह संदेश भी था कि किसी धर्म या समुदाय को भारत से बाहर रखने की सोच भारतीय सभ्यता की मूल भावना के अनुरूप नहीं है। इसी टिप्पणी को लेकर अब देश में अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

मदनी बोले- बात भारत में लागू होनी चाहिए

अरशद मदनी का कहना है कि विदेश में एकता और भाईचारे की बात करने के साथ-साथ भारत में भी उसी संदेश को व्यवहार में उतारना जरूरी है। उन्होंने RSS से सवाल किया कि यदि कोई व्यक्ति धार्मिक समुदायों के खिलाफ नफरत या हिंसा को बढ़ावा देता है, तो संगठन ऐसे लोगों के खिलाफ क्या कदम उठाता है।

मदनी ने यह भी कहा कि देश में सभी नागरिकों को संविधान के तहत समान अधिकार हासिल हैं और धार्मिक आधार पर किसी के साथ भेदभाव या हिंसा स्वीकार नहीं की जानी चाहिए।

बयान के बाद बढ़ी सियासी हलचल

भागवत के बयान पर केवल मदनी ने ही प्रतिक्रिया नहीं दी है। AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी संघ प्रमुख के बयान की आलोचना की और RSS की विचारधारा को लेकर सवाल उठाए। दूसरी ओर, महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भागवत के बयान का समर्थन करते हुए इसे सहिष्णुता और समावेश की भावना से जोड़ा।

इससे साफ है कि भागवत की टिप्पणी ने राजनीतिक और सामाजिक हलकों में अलग-अलग प्रतिक्रियाओं को जन्म दिया है। एक तरफ इसे हिंदू धर्म की समावेशी व्याख्या के रूप में देखा जा रहा है, तो दूसरी तरफ आलोचक संगठन के कथित व्यवहार और उसके सार्वजनिक बयानों के बीच अंतर को लेकर सवाल उठा रहे हैं।

समर्थन में भी सामने आई आवाज

भागवत के बयान को लेकर मुस्लिम समुदाय से भी समर्थन की प्रतिक्रिया सामने आई है। भारत के चीफ इमाम उमर अहमद इल्यासी ने भागवत के विचारों की सराहना करते हुए कहा कि वे लंबे समय से देश में एकता की बात करते रहे हैं। उन्होंने भागवत के संदेश को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना से जोड़कर देखा।

इस तरह एक ही बयान पर समर्थन और विरोध दोनों तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं।

अब कार्रवाई और अमल पर बहस

भागवत के बयान के बाद सबसे बड़ा सवाल यही बन गया है कि धार्मिक सद्भाव और सभी समुदायों के सम्मान की बात को जमीन पर किस तरह लागू किया जाए। मदनी ने अपने बयान में इसी पहलू को उठाते हुए नफरत फैलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।

वहीं, भागवत के समर्थकों का कहना है कि उनका बयान भारत की विविधता और सामाजिक समरसता पर जोर देता है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह मुद्दा राजनीतिक बहस का हिस्सा बना रह सकता है।

कुल मिलाकर, मोहन भागवत के अमेरिका में दिए गए हिंदू-मुस्लिम एकता और विविधता संबंधी बयान ने देश में नई बहस छेड़ दी है। अरशद मदनी ने इस बयान का हवाला देते हुए नफरत फैलाने वालों पर कार्रवाई की मांग उठाई है, जबकि दूसरी ओर कुछ नेताओं और धार्मिक प्रतिनिधियों ने भागवत के संदेश का समर्थन भी किया है।

Rashmi Repoter
Author: Rashmi Repoter

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