जम्मू-कश्मीर की राजनीति में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर असंतोष और विधायकों की नाराजगी के बीच सरकार में बदलाव की कवायद तेज हो गई है। कैबिनेट में फेरबदल के साथ मुख्यमंत्री के सलाहकारों को हटाए जाने की चर्चा ने राजनीतिक हलचल और बढ़ा दी है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या उमर अब्दुल्ला अपनी ही पार्टी के बागी और असंतुष्ट विधायकों के दबाव में फैसले ले रहे हैं?
जम्मू-कश्मीर की राजनीति में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर असंतोष और विधायकों की नाराजगी के बीच सरकार में बदलाव की मांग तेज हो गई है। हाल ही में कैबिनेट विस्तार के बाद पार्टी के कई वरिष्ठ नेता और विधायक नाराज बताए जा रहे हैं। अब असंतुष्ट विधायकों ने अपनी मांगों को लेकर पार्टी नेतृत्व पर दबाव बढ़ा दिया है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या उमर अब्दुल्ला अपनी ही पार्टी के असंतुष्ट विधायकों के दबाव में फैसले लेने को मजबूर हैं?
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नेशनल कॉन्फ्रेंस के करीब 18 से 20 विधायकों ने श्रीनगर में बैठक कर अपनी मांगों को लेकर एक प्रस्ताव तैयार किया। कुछ रिपोर्टों में इस असंतुष्ट समूह की संख्या 24 से 25 तक बताई गई है। विधायकों की प्रमुख मांग मुख्यमंत्री के राजनीतिक सलाहकार नासिर असलम वानी को पद से हटाने की है। इसके अलावा सलाहकार शम्मी ओबेरॉय की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। असंतुष्ट विधायक मंत्रिमंडल में व्यापक बदलाव और कुछ मंत्रियों को हटाने की मांग कर रहे हैं।
कैबिनेट विस्तार के बाद क्यों बढ़ी नाराजगी?
उमर अब्दुल्ला सरकार ने हाल ही में कैबिनेट का विस्तार किया था। इस दौरान चार नए मंत्रियों को शामिल किया गया। पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं को उम्मीद थी कि उन्हें मंत्रिमंडल में जगह मिलेगी, लेकिन उनकी अनदेखी से नाराजगी बढ़ गई। पूर्व स्पीकर और वरिष्ठ विधायक मुबारक गुल तथा अब्दुल मजीद लारमी जैसे नेताओं की नाराजगी भी खुलकर सामने आई। विधायकों का आरोप है कि पार्टी में फैसले लेते समय सभी वरिष्ठ नेताओं और निर्वाचित प्रतिनिधियों से पर्याप्त विचार-विमर्श नहीं किया जा रहा है।
सभी मंत्रियों में बदलाव की मांग
असंतुष्ट विधायकों की मांग केवल सलाहकारों को हटाने तक सीमित नहीं है। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, वे मंत्रिमंडल में व्यापक फेरबदल चाहते हैं। उनकी मांग है कि सरकार में लंबे समय से जिम्मेदारी संभाल रहे मंत्रियों के प्रदर्शन की समीक्षा की जाए और जरूरत के मुताबिक नए चेहरों को मौका मिले। विधायकों का यह भी कहना है कि मंत्रियों के विभागों का बंटवारा और सरकार के महत्वपूर्ण फैसले लेने से पहले पार्टी के भीतर चर्चा होनी चाहिए।
चुनावी वादों को पूरा करने का भी दबाव
विधायकों ने नेशनल कॉन्फ्रेंस के चुनावी घोषणापत्र में किए गए वादों को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनकी मांग है कि जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने और अनुच्छेद 370 से जुड़े पार्टी के रुख पर सरकार अधिक सक्रियता दिखाए। इसके साथ ही विधायकों ने पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र मजबूत करने और विधानसभा सदस्यों को अधिक अधिकार देने की मांग भी रखी है।
14 दिन के अल्टीमेटम की चर्चा
कुछ मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि करीब 25 असंतुष्ट विधायकों ने पार्टी नेतृत्व को 14 दिन का अल्टीमेटम दिया है। मांगें पूरी नहीं होने पर राजभवन का रुख करने और समर्थन वापस लेने जैसे विकल्पों पर विचार करने की बात भी सामने आई है। हालांकि, इस अल्टीमेटम और विधायकों की संख्या को लेकर अलग-अलग रिपोर्टों में अलग-अलग दावे हैं। इसलिए इसे अभी पार्टी के भीतर चल रहे राजनीतिक घटनाक्रम और मीडिया रिपोर्टों के दावों के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
फारूक अब्दुल्ला के सामने भी बड़ी चुनौती
इस पूरे विवाद के बीच नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला के सामने भी पार्टी को एकजुट रखने की चुनौती है। नाराज नेताओं को मनाने के प्रयासों के बावजूद असंतोष कम होता नहीं दिख रहा। इसी बीच श्रीनगर से सांसद आगा सैयद रुहुल्लाह मेहदी के पार्टी छोड़ने और लोकसभा सदस्यता से इस्तीफा देने के ऐलान ने भी पार्टी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
फिलहाल नेशनल कॉन्फ्रेंस नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी के भीतर बढ़ती नाराजगी को दूर करना और सरकार की स्थिरता बनाए रखना है। उमर अब्दुल्ला के हालिया कैबिनेट विस्तार से असंतुष्ट विधायकों को मनाने की उम्मीद थी, लेकिन इसके बाद विवाद और गहरा गया। अब देखना होगा कि पार्टी नेतृत्व विधायकों की मांगों पर क्या फैसला लेता है और क्या उमर अब्दुल्ला इस अंदरूनी चुनौती से पार पा सकेंगे।








