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October 20, 2026 11:19 am

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मोहन भागवत का बड़ा बयान: ‘फ्रांस में न रिजीम चेंज हुआ, न आगे होगा’, बोले- हम जब भी बंटे, कमजोर हुए

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने विजयादशमी के अवसर पर नागपुर में आयोजित शताब्दी वर्ष के समारोह में समाज की एकता, भारतीय संस्कृति, स्वदेशी और देश की सामाजिक परिस्थितियों को लेकर अपने विचार रखे। शस्त्र पूजन कार्यक्रम के दौरान उन्होंने फ्रांस, अल्बानिया, नेपाल और बांग्लादेश में हुए घटनाक्रमों का जिक्र करते हुए कहा कि केवल सत्ता या व्यवस्था बदलने से परिस्थितियां नहीं बदलतीं। उन्होंने समाज को एकजुट रहने का संदेश देते हुए कहा कि जब-जब हम बंटे हैं, तब-तब कमजोर हुए हैं।

फ्रांस, अल्बानिया, नेपाल और बांग्लादेश का किया जिक्र

मोहन भागवत ने अपने संबोधन में फ्रांस में जारी विरोध प्रदर्शनों के साथ अल्बानिया, नेपाल और बांग्लादेश के घटनाक्रमों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पश्चिम से एक ऐसी आंधी चली है, जो व्यवस्था, संस्कार और शालीनता का विरोध करती है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या केवल शासन व्यवस्था में बदलाव करने से समस्याओं का समाधान हो सकता है?

भागवत ने कहा कि लोग मानते हैं कि रिजीम चेंज यानी शासन व्यवस्था में बदलाव से परिस्थितियां बदल जाएंगी, लेकिन ऐसा पहले भी नहीं हुआ और आज भी इससे अपने आप समस्याओं का समाधान नहीं होगा। उनके इस बयान में व्यवस्था परिवर्तन के बजाय समाज और परिस्थितियों में वास्तविक बदलाव की जरूरत पर जोर दिखाई दिया।

‘भारत विविधता का देश है, एकजुट होकर आगे बढ़ना होगा’

RSS प्रमुख ने भारत की विविधता का उल्लेख करते हुए कहा कि देश में अलग-अलग पंथ, प्रांत, जातियां, भाषाएं, खानपान और रीति-रिवाज हैं। इसके बावजूद भारत को एकजुट होकर आगे बढ़ना है। उन्होंने कहा कि देश पहले भी एकता के साथ आगे बढ़ा है और भविष्य में भी इसी भावना के साथ आगे बढ़ता रहेगा।

भागवत के अनुसार, विविधता स्वाभाविक है, लेकिन संपूर्ण अस्तित्व की एकता का सत्य भी महत्वपूर्ण है। उनके संबोधन का प्रमुख संदेश यही रहा कि अलग-अलग पहचान और परंपराओं के बावजूद समाज को आपसी सहयोग और एकजुटता बनाए रखनी चाहिए।

संत रविदास और राज नारायण बसु को किया याद

विजयादशमी समारोह में मोहन भागवत ने संत रविदास के योगदान को भी याद किया। उन्होंने कहा कि विदेशी आक्रमणों और अत्याचारों के दौर में संत रविदास ने स्वधर्म के प्रति निष्ठा, सामाजिक समरसता और भक्ति का संदेश दिया। भागवत के मुताबिक, संत रविदास ने अपने जीवन और विचारों से लोगों का मनोबल बढ़ाया।

उन्होंने बंगाल के राज नारायण बसु का भी जिक्र किया। उनके जन्म के 200 वर्ष पूरे होने का उल्लेख करते हुए भागवत ने बताया कि राज नारायण बसु ने लोगों को अपनी संस्कृति और पहचान के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से हिंदू मेले की शुरुआत की थी। इस प्रसंग के जरिए उन्होंने सांस्कृतिक पहचान और स्वदेशी भावना के महत्व को रेखांकित किया।

स्वदेशी और भारतीय पहचान पर दिया जोर

मोहन भागवत ने कहा कि RSS पिछले 100 वर्षों से भारत को उसकी अपनी पहचान, संस्कृति और परंपराओं के आधार पर संगठित और मजबूत बनाने के लिए काम कर रहा है। उन्होंने स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने और भारतीय पहचान के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर भी जोर दिया।

संघ के शताब्दी वर्ष के संदर्भ में उन्होंने उन प्रमुख बदलावों का उल्लेख किया, जिनमें अपनी सांस्कृतिक पहचान को समझना और स्वदेशी चीजों को अपनाना शामिल है। उनके अनुसार, समाज की मजबूती के लिए अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति जागरूक रहना जरूरी है।

नशे की समस्या और नई पीढ़ी को लेकर चिंता

अपने संबोधन में RSS प्रमुख ने नशीले पदार्थों के बढ़ते इस्तेमाल को भी गंभीर समस्या बताया। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी में नशे की लत को लेकर चिंता करने की जरूरत है। उन्होंने अभिभावकों से बच्चों और युवाओं को इसके दुष्परिणामों के प्रति जागरूक करने पर जोर दिया।

भागवत ने नई पीढ़ी में सही और गलत के बीच अंतर समझने की क्षमता विकसित करने की आवश्यकता भी बताई। उन्होंने कहा कि युवाओं को नई चीजें आकर्षित करती हैं, लेकिन किसी भी चीज को अपनाने से पहले उसके परिणामों को समझना जरूरी है। उन्होंने डिजिटल माध्यमों और OTT प्लेटफॉर्म से जुड़ी चुनौतियों के संदर्भ में भी नियमों और अनुशासन की आवश्यकता का उल्लेख किया।

आंदोलनों के उद्देश्य पर भी रखी बात

मोहन भागवत ने कहा कि समाज और देश को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी सभी की है। उन्होंने आंदोलनों के उद्देश्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि किसी आंदोलन के पीछे समाज के प्रति अपनापन और सकारात्मक प्रेरणा है, तो वह उचित दिशा में काम कर सकता है। लेकिन यदि आंदोलन किसी व्यक्ति, समूह या विचार के प्रति विरोध बढ़ाने का साधन बन जाए, तो उसका इस्तेमाल राजनीतिक उद्देश्य के लिए किया जा सकता है।

नागपुर में हुआ RSS का शताब्दी वर्ष समारोह

नागपुर में आयोजित विजयादशमी समारोह RSS के शताब्दी वर्ष के लिहाज से महत्वपूर्ण रहा। कार्यक्रम में मोहन भागवत ने शस्त्र पूजन किया और संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की। RSS की स्थापना वर्ष 1925 में विजयादशमी के दिन नागपुर में हुई थी। इसी वजह से विजयादशमी का दिन संघ के लिए विशेष महत्व रखता है।

कुल मिलाकर, मोहन भागवत के संबोधन में सामाजिक एकता, भारतीय संस्कृति, स्वदेशी, नई पीढ़ी और समाज की जिम्मेदारियों जैसे मुद्दे प्रमुख रहे। फ्रांस सहित दूसरे देशों के घटनाक्रमों का उल्लेख करते हुए उन्होंने यह संदेश दिया कि केवल सत्ता या व्यवस्था में बदलाव से समस्याएं अपने आप दूर नहीं होतीं। उनके अनुसार, समाज को मजबूत बनाने के लिए एकता, अनुशासन और सामूहिक जिम्मेदारी की भावना जरूरी है।

Rashmi Repoter
Author: Rashmi Repoter

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