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October 28, 2026 1:26 pm

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‘अस्पताल में महंगी दवाएं डकैती जैसी’, मेडिकल सामान की कीमतों पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

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देश में दवाओं और मेडिकल सामान की बढ़ती कीमतों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। अस्पतालों में मरीजों को दवाएं और जरूरी मेडिकल उपकरण किस कीमत पर उपलब्ध कराए जा रहे हैं, इस सवाल पर अदालत ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा। सुनवाई के दौरान 15 रुपये में मिलने वाली ड्रिप लाइन के लिए 250 रुपये वसूले जाने का उदाहरण सामने आया। अदालत ने सवाल उठाया कि जब मेडिकल सामान की खरीद कीमत इतनी कम है, तो मरीजों से कई गुना ज्यादा रकम क्यों ली जा रही है?

27 अक्टूबर 2026 को हुई सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने दवाओं की कीमतों, अस्पतालों में मेडिकल सामान पर लगाए जाने वाले मार्जिन और सरकार की मूल्य नियंत्रण व्यवस्था पर सवाल उठाए। अदालत की चिंता का मुख्य विषय यह था कि इलाज के दौरान मरीजों और उनके परिवारों को पहले से ही भारी आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ता है। ऐसे में दवाओं और मेडिकल उपभोग की वस्तुओं पर अत्यधिक कीमत वसूले जाने से उनका खर्च और बढ़ सकता है।

15 रुपये की ड्रिप लाइन 250 रुपये में क्यों?

सुनवाई के दौरान अदालत ने मेडिकल सामान की खरीद कीमत और मरीजों से वसूली जाने वाली रकम के बीच बड़े अंतर का उदाहरण दिया। रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 15 रुपये में मिलने वाली ड्रिप लाइन के लिए अस्पताल में 250 रुपये तक लिए जाने का मुद्दा उठाया गया।

इस अंतर को लेकर अदालत ने सवाल किया कि मेडिकल सामान की कीमत इतनी ज्यादा कैसे हो सकती है। अदालत की चिंता केवल एक वस्तु तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह थी कि अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली दवाओं और चिकित्सा संबंधी सामान की कीमतें किस आधार पर तय होती हैं और मरीजों को उचित कीमत पर इलाज मिलना कैसे सुनिश्चित किया जा सकता है।

मेडिकल सामान की खरीद कीमत और अस्पताल के बिल में दर्ज कीमत के बीच अंतर होने के पीछे आपूर्ति, भंडारण, वितरण और अस्पताल के संचालन जैसे खर्च हो सकते हैं। हालांकि, अदालत के समक्ष उठाए गए सवालों का केंद्र यह था कि इन खर्चों के नाम पर कितना अधिक मार्जिन उचित माना जा सकता है और मरीजों पर इसका कितना बोझ पड़ रहा है।

कैंसर की दवाओं की कीमतों पर भी सवाल

सुनवाई के दौरान कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की कीमतों में बड़े अंतर का मुद्दा भी सामने आया। रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने एक ऐसे मामले का उल्लेख किया, जिसमें लगभग 11,000 रुपये में उपलब्ध कराई जा सकने वाली कीमोथेरेपी दवा के लिए एक बड़े निजी अस्पताल में करीब 1.30 लाख रुपये वसूले जाने की बात कही गई।

इस उदाहरण के जरिए अदालत ने दवाओं की खरीद कीमत और मरीज से ली जाने वाली रकम के बीच अंतर पर सवाल उठाया। कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के इलाज में मरीजों को पहले ही लंबे समय तक उपचार, जांच और अस्पताल में भर्ती रहने का खर्च उठाना पड़ सकता है। ऐसे में दवाओं की कीमतों में बड़ा अंतर परिवारों के लिए अतिरिक्त आर्थिक चुनौती बन सकता है।

हालांकि, किसी दवा की खरीद कीमत और अस्पताल में मरीज को दी जाने वाली दवा की अंतिम कीमत की तुलना करते समय दवा की समानता, आपूर्ति की शर्तों और संबंधित सेवाओं को भी ध्यान में रखना जरूरी है। अदालत की सुनवाई में मुख्य मुद्दा यही था कि कीमतों में भारी अंतर को किस आधार पर उचित ठहराया जा सकता है।

केंद्र सरकार की मूल्य नियंत्रण व्यवस्था पर सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए लागू व्यवस्था की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठाए। भारत में नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) दवाओं की कीमतों के नियमन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसके अलावा, ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO), 2013 के तहत निर्धारित दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण के प्रावधान मौजूद हैं।

हालांकि, सभी दवाओं पर एक जैसी मूल्य सीमा लागू नहीं होती। आवश्यक दवाओं की सूची में शामिल दवाओं पर निर्धारित नियमों के तहत कीमतों की सीमा तय की जाती है, जबकि सूची से बाहर की दवाओं के लिए अलग प्रावधान लागू होते हैं। इसी कारण दवाओं की कीमतों और व्यापारिक मार्जिन को लेकर व्यापक नियमन की मांग उठती रही है।

अदालत ने इस बात पर सवाल किया कि जब दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए व्यवस्था मौजूद है, तो मरीजों को इलाज के दौरान इतने बड़े मूल्य अंतर का सामना क्यों करना पड़ रहा है। सुनवाई में सरकार से यह भी पूछा गया कि कीमतों को नियंत्रित करने के लिए उठाए गए कदमों का लाभ मरीजों तक किस तरह पहुंच रहा है।

कैंसर की दवाओं पर 30 प्रतिशत ट्रेड मार्जिन का मुद्दा

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार के कैंसर की कुछ दवाओं पर ट्रेड मार्जिन को 30 प्रतिशत तक सीमित करने के कदम पर भी चर्चा हुई। अदालत ने सवाल उठाया कि इस तरह का कदम उठाने में इतना समय क्यों लगा और कीमतों को लेकर व्यापक चिंता के बावजूद कार्रवाई सीमित क्यों रही।

ट्रेड मार्जिन का संबंध उस अंतर से है, जो दवा की खरीद और बिक्री के स्तर पर व्यापारियों या वितरण व्यवस्था में जुड़ता है। इस पर सीमा लगाने का उद्देश्य कीमतों में अनावश्यक बढ़ोतरी को रोकना और मरीजों के खर्च को कम करने में मदद करना है।

हालांकि, ट्रेड मार्जिन की सीमा और दवा की अधिकतम खुदरा कीमत एक ही चीज नहीं हैं। किसी दवा की अंतिम कीमत पर निर्माता का मूल्य निर्धारण, लागू नियम, वितरण व्यवस्था और अस्पताल की बिलिंग नीति जैसे कारक भी असर डाल सकते हैं। इसलिए व्यापक स्तर पर कीमतों को नियंत्रित करने के लिए नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन और निगरानी को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

निजी अस्पतालों की दलील पर भी हुई चर्चा

सुनवाई के दौरान निजी अस्पतालों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने अस्पतालों के संचालन से जुड़े खर्चों और व्यवस्थाओं का पक्ष रखा। उनकी दलील थी कि अस्पतालों को चौबीसों घंटे सेवाएं, जरूरी सुविधाएं और दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करनी पड़ती है। अस्पतालों में उपलब्ध दवाओं की गुणवत्ता और उनकी प्रामाणिकता से जुड़े पहलू भी महत्वपूर्ण होते हैं।

इसके जवाब में अदालत ने संकेत दिया कि अस्पतालों के संचालन का खर्च मरीजों से दवाओं और मेडिकल सामान पर अत्यधिक कीमत वसूलने का स्वतः औचित्य नहीं बन सकता। अदालत की चिंता इस बात को लेकर थी कि व्यावसायिक हितों और मरीजों की आर्थिक स्थिति के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

यह मामला केवल अस्पतालों तक सीमित नहीं है। दवा निर्माता कंपनियां, वितरक, खुदरा विक्रेता और नियामक संस्थाएं भी दवाओं की कीमत तय होने की प्रक्रिया का हिस्सा हैं। इसलिए इस पूरे तंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

मरीजों को राहत मिलेगी या नहीं?

दवाओं और मेडिकल सामान की कीमतों पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई ऐसे समय में हुई है, जब इलाज का खर्च अनेक परिवारों के लिए बड़ी चिंता बना हुआ है। अस्पताल में भर्ती होने के दौरान दवाओं, इंजेक्शन, ड्रिप लाइन और अन्य चिकित्सा सामग्री का बिल कुल खर्च को काफी प्रभावित कर सकता है।

यदि मूल्य नियंत्रण और बिलिंग व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने के लिए कदम उठाए जाते हैं, तो इससे मरीजों को राहत मिलने की संभावना हो सकती है। हालांकि, वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार और संबंधित नियामक संस्थाएं क्या कदम उठाती हैं और अदालत का अंतिम आदेश क्या होता है।

रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई के बाद अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है। इसका अर्थ है कि इस मामले में अंतिम निर्णय सुनाया जाना बाकी है। फिलहाल, अदालत की टिप्पणियों ने दवाओं की कीमतों, अस्पतालों में मेडिकल सामान पर लगाए जाने वाले मार्जिन और मरीजों के हितों की सुरक्षा को लेकर बहस तेज कर दी है।

अब सभी की नजर इस बात पर है कि अदालत अपने अंतिम आदेश में क्या निर्देश देती है और केंद्र सरकार दवाओं तथा मेडिकल सामान की कीमतों को अधिक पारदर्शी और किफायती बनाने के लिए आगे क्या कदम उठाती है।

Rashmi Repoter
Author: Rashmi Repoter

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