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October 25, 2026 7:40 pm

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निजी स्कूलों में बच्चों की यूनिफॉर्म के लिए मिलेगी नकद सहायता, दिल्ली हाईकोर्ट ने सरकार की नीति रखी बरकरार

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नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने निजी स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) और वंचित समूहों के तहत दाखिला लेने वाले बच्चों को स्कूल यूनिफॉर्म के लिए नकद सहायता देने की दिल्ली सरकार की नीति को बरकरार रखा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकार का यह फैसला मनमाना या पूरी तरह अनुचित नहीं है। इसके साथ ही न्यायालय ने इस नीति पर दोबारा विचार करने की मांग को लेकर दायर गैर-सरकारी संगठन ‘जस्टिस फॉर ऑल’ की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी। इस फैसले के बाद दिल्ली सरकार की वह व्यवस्था जारी रहेगी, जिसके तहत पात्र बच्चों को स्कूल की वर्दी उपलब्ध कराने के लिए सीधे आर्थिक सहायता दी जाती है।

न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद और न्यायमूर्ति रेनू भटनागर की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि पुनर्विचार याचिका में उठाए गए मुद्दे पहले से निपटाए जा चुके मामले की दोबारा पूरी सुनवाई कराने के प्रयास जैसे हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी सरकारी नीति में न्यायिक हस्तक्षेप तभी किया जा सकता है, जब वह स्पष्ट रूप से मनमानी, अनुचित या अस्वीकार्य हो। मौजूदा मामले में बच्चों को तैयार यूनिफॉर्म देने के बजाय उसके लिए नकद सहायता उपलब्ध कराने की सरकार की नीति इस कसौटी पर खरी नहीं उतरती, इसलिए इसमें हस्तक्षेप करने का कोई पर्याप्त आधार नहीं है।

नकद सहायता के बजाय तैयार यूनिफॉर्म देने की थी मांग

इस मामले में याचिकाकर्ता संगठन ‘जस्टिस फॉर ऑल’ ने अदालत से मांग की थी कि शिक्षा का अधिकार कानून के तहत आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और वंचित समूहों के बच्चों को निजी सहायता प्राप्त तथा गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों में यूनिफॉर्म उपलब्ध कराई जानी चाहिए। संगठन का तर्क था कि सरकार को वर्दी खरीदने के लिए सीधे नकद राशि देने के बजाय बच्चों को तैयार यूनिफॉर्म मुहैया करानी चाहिए, ताकि सहायता का उद्देश्य सुनिश्चित हो सके।

इसके जवाब में दिल्ली सरकार ने अपनी नीति का बचाव करते हुए कहा था कि प्रत्येक बच्चे का नाप लेना, अलग-अलग आकार और जरूरत के अनुसार कपड़ा खरीदना, सिलाई कराना और फिर सभी स्कूलों तक यूनिफॉर्म पहुंचाना व्यावहारिक रूप से कठिन प्रक्रिया है। इस व्यवस्था में समय और प्रशासनिक संसाधन दोनों अधिक खर्च होते हैं। इन्हीं चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए दिल्ली सरकार के मंत्रिमंडल ने जून 2025 में नीति में बदलाव करते हुए यूनिफॉर्म के लिए निर्धारित आर्थिक सहायता सीधे पात्र बच्चों को देने का फैसला किया था। सरकार का उद्देश्य इस प्रक्रिया को सरल बनाना और बच्चों तक समय पर सहायता पहुंचाना था।

समय पर यूनिफॉर्म उपलब्ध कराने को बताया था जरूरी

दिल्ली हाईकोर्ट इससे पहले 23 जनवरी को भी सरकार की इस नीति को सही ठहरा चुका है। उस समय अदालत ने कहा था कि प्रत्येक बच्चे का नाप लेकर उसके अनुसार यूनिफॉर्म तैयार कराना और नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत से पहले उसे वितरित करना सरकार के लिए बड़ी प्रशासनिक चुनौती होगी। इसके लिए अलग-अलग प्रकार के कपड़ों की खरीद, सिलाई और वितरण की पूरी प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा। सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) पोर्टल के माध्यम से आवश्यक सामग्री खरीदने के बाद भी वर्दी तैयार कराकर समय पर बच्चों तक पहुंचाना आसान नहीं होगा।

अदालत ने अपने पहले के फैसले में यह भी माना था कि प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) के माध्यम से यूनिफॉर्म के लिए नकद सहायता देना शिक्षा का अधिकार कानून और उससे जुड़े नियमों के विपरीत नहीं है। इस व्यवस्था से पात्र बच्चों के अभिभावकों को अपनी जरूरत के अनुसार वर्दी खरीदने का अवसर मिल सकता है और शैक्षणिक सत्र शुरू होने से पहले यूनिफॉर्म की उपलब्धता सुनिश्चित करने में मदद मिल सकती है।

पुनर्विचार याचिका में हस्तक्षेप का आधार नहीं मिला

पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि सरकार की 10 जून 2025 की नीति और मंत्रिमंडल के लिए तैयार किए गए संबंधित नोट सहित आवश्यक दस्तावेजों पर पहले ही विचार किया जा चुका है। अदालत के अनुसार, याचिका में ऐसा कोई नया या पर्याप्त आधार सामने नहीं आया, जिसके कारण पहले दिए गए फैसले पर दोबारा विचार करना जरूरी हो।

इस निर्णय के साथ दिल्ली सरकार की यूनिफॉर्म सहायता नीति को न्यायिक समर्थन मिला है। अब आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और वंचित समूहों के तहत निजी स्कूलों में दाखिला लेने वाले पात्र बच्चों को यूनिफॉर्म के लिए नकद सहायता देने की व्यवस्था जारी रहेगी। अदालत के फैसले का मुख्य आधार यह रहा कि सरकार की ओर से चुनी गई व्यवस्था प्रशासनिक व्यवहार्यता और समय पर सहायता उपलब्ध कराने की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाई गई है तथा इसे मनमाना ठहराने के लिए पर्याप्त कारण मौजूद नहीं हैं।

Rajesh Bhagtani
Author: Rajesh Bhagtani

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