जयपुर । सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ द्वारा राजस्थान राज्य निर्वाचन आयोग (एसईसी) को सामाजिक कार्यकर्ताओं के आवेदन पर पुनः विचार करने के निर्देश दिए जाने के कुछ ही दिनों बाद, आयोग ने पंचायती राज चुनावों के दौरान मतदाता जागरूकता अभियान चलाने की अनुमति याचिका को एक बार फिर खारिज कर दिया है। 4 नवंबर को जारी अपने नए आदेश में राज्य निर्वाचन आयोग ने व्यावहारिक और कानूनी कठिनाइयों का हवाला देते हुए कहा है कि अनुमति देना न तो न्यायसंगत है और न ही कानूनी। इसके साथ ही आयोग ने यह भी तर्क दिया कि वह स्वयं पहले से ही एक सुदृढ़ और व्यवस्थित मतदाता जागरूकता अभियान संचालित कर रहा है।
इससे पूर्व 2 नवंबर को प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाला बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने आयोग के पुराने इनकार के आदेश को रद्द करते हुए दो दिनों के भीतर याचिकाकर्ताओं के आवेदन पर पुनः विचार कर निर्णय लेने का निर्देश दिया था। इस आदेश के बाद ‘राजस्थान इलेक्शन वॉच’ और ‘मजदूर किसान शक्ति संगठन’ (एमकेएसएस) ने आयोग के समक्ष नया आवेदन प्रस्तुत किया था। आयोग ने अपने फैसले में कहा कि याचिकाकर्ताओं ने स्पष्ट कार्यक्रम, रूट मैप, समय और स्थानीय आयोजकों की जानकारी उपलब्ध नहीं कराई है, जिससे पुलिस और प्रशासन के लिए व्यवस्थाएं करना कठिन है। इसके अलावा, जारी पंचायत चुनाव और आगामी त्यौहारों के कारण पुलिस बल पहले से ही अत्यधिक व्यस्त है।
सामाजिक कार्यकर्ताओं और नागरिक संगठनों ने राज्य निर्वाचन आयोग के इस रुख पर कड़ा विरोध व्यक्त किया है। अरुणा रॉय, निखिल डे और शंकर सिंह सहित प्रमुख कार्यकर्ताओं ने एक बयान जारी कर कहा कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट रुख के बाद भी प्रशासनिक बहानों की आड़ में नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन किया जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकारी मशीनरी की पहल नागरिकों की स्वतंत्र भागीदारी का विकल्प नहीं हो सकती और लोकतंत्र में दोनों की भूमिकाएं एक-दूसरे की पूरक हैं। नागरिक संगठनों ने अब इस मामले को लेकर पुनः उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाने और पारदर्शी प्रक्रिया तय करने की मांग करने का निर्णय लिया है।








