उमिया कन्या महाविद्यालय, राऊ, इंदौर के बी.एससी. बायो-साइंस विद्यार्थियों के लिए पद्मश्री सम्मानित पर्यावरणविद् पद्मश्री डॉ. जनक पलटा मगिलिगन द्वारा स्थापित जिम्मी मगिलिगन सेंटर फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट का शैक्षणिक भ्रमण आयोजित किया जो सतत विकास एवं पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में अपने कार्यों के लिए प्रसिद्ध है ।
सेंटर की निदेशक डॉ जनक पलटा मगिलिगन के साथ भ्रमण के दौरान
“हमने नवीकरणीय ऊर्जा, सौर ऊर्जा से खाना पकाने, औषधीय पौधों, जैविक उत्पादों, अपशिष्ट प्रबंधन तथा पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली की विभिन्न विधियों के बारे में सतत प्रौद्योगिकियों तथा उनके व्यावहारिक उपयोगों के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त की।
इस भ्रमण से हमें यह समझने में सहायता मिली कि प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करके पर्यावरण की रक्षा कैसे की जा सकती है तथा प्रदूषण को किस प्रकार कम किया जा सकता है।
सौर ऊर्जा एवं सौर कुकर : हमने सौर ऊर्जा के बारे में जाना, जो सूर्य से प्राप्त होने वाला स्वच्छ एवं नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत है। हमें विभिन्न प्रकार के सौर कुकरों के बारे में बताया गया, जिनमें प्रमुख हैं: . बॉक्स प्रकार सौर कुकर , संचालित पैराबोलिक कुकर और डायरेक्ट सूर्य से संचालित बड़ी शेफलर डिश वाली सोलर किचन । सोलर ऊर्जा से भोजन पकाते हैं। इनमें लकड़ी, कोयला या एलपीजी जैसे पारंपरिक ईंधनों को सीधे जलाने की आवश्यकता कोई नहीं है

हमने सोलर ड्रायर के बारे में भी जानकारी प्राप्त की। इसका उपयोग सौर ऊष्मा की सहायता से फलों, सब्जियों, जड़ी-बूटियों तथा अन्य खाद्य पदार्थों को सुखाने के लिए किया जाता है। सौर सुखाने की विधि खाद्य पदार्थों को सुरक्षित रखने तथा भोजन की बर्बादी कम करने में सहायक हो सकती है।
भ्रमण के दौरान हमें हमने जाना जनक पलटा मगिलिगन और उनके स्वर्गीय पति जिम्मी मगिलिगन द्वारा स्थापित 2 किलोवाट (2 kW) का हाइब्रिड सोलर-विंड पावर स्टेशन पर्यावरण संरक्षण और आत्मनिर्भरता की एक अद्भुत मिसाल है। इस 2 किलोवाट क्षमता के सिस्टम से जनक जी न केवल अपने घर की ज़रूरतें पूरी करती हैं, बल्कि पिछले कई सालों से अपने पड़ोस के 50 गरीब व भूमिहीन आदिवासी परिवारों को मुफ्त बिजली दे रही हैं।
हमने विभिन्न औषधीय एवं उपयोगी पौधे पौधों का अवलोकन किया तथा उनके दैनिक जीवन में उपयोगों के बारे में जानकारी प्राप्त की , हड़जोड़ का पौधा इसे विशेष रूप से अस्थियों के स्वास्थ्य से संबंधित पारंपरिक उपयोगों के लिए जाना जाता है। (ख) शैम्पू के रूप में उपयोग होने वाले पौधे (ग) लेमनग्रास (नींबू घास) , कदंब का वृक्ष देखा , पारंपरिक अनाजों और मसालों, विशेष रूप से गेहूँ सोना मोती तथा पंच मसाला के बारे में भी जानकारी प्राप्त हुई।

जैविक उत्पाद एवं प्राकृतिक विकल्प : हमने प्राकृतिक तथा पौधों से प्राप्त पदार्थों की सहायता से उपयोगी उत्पाद तैयार करने के बारे में जानकारी प्राप्त की :
– जैविक फिनाइल या प्राकृतिक फर्श क्लीनर: कुछ सफाई उत्पादों में पौधों से प्राप्त पदार्थों का उपयोग किया जा सकता है। हर्बल चाय: लेमनग्रास तथा अन्य उपयुक्त जड़ी-बूटियों से
– प्राकृतिक हेयर क्लींजर: रीठा देखा
कम्पोस्ट: रसोई एवं बगीचे से निकलने वाले जैविक पोषक तत्त्वों से भरपूर खाद में बदला जाता है।
भ्रमण के दौरान हमने रद्दी कागज तथा कृषि अवशेषों, जैसे भूसे, से ईंधन ब्रिकेट बनाने की प्रक्रिया देखा हमने सीखा और समझा
सतत जीवनशैली के पर्यावरणीय लाभ :
1. प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण: जल, ऊर्जा तथा कच्चे माल की अनावश्यक खपत को कम करना।
2. प्रदूषण में कमी: उपयुक्त नवीकरणीय ऊर्जा तकनीकों के माध्यम से पारंपरिक ईंधनों पर निर्भरता कम करना।
3. अपशिष्ट में कमी: वस्तुओं के पुनः उपयोग एवं पुनर्चक्रण से फेंके जाने वाले कचरे की मात्रा कम करना।
4. जैव विविधता का संरक्षण: वृक्षारोपण एवं उपयोगी पौधों की प्रजातियों का संरक्षण करके पारिस्थितिकी तंत्र को सहारा देना।
5. सतत कृषि: कम्पोस्ट निर्माण एवं कृषि अवशेषों के जिम्मेदारीपूर्ण उपयोग से संसाधनों का बेहतर प्रबंधन करना।
6. ऊर्जा संरक्षण: सौर कुकर एवं सौर ड्रायर के माध्यम से पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों की आवश्यकता कम करना।
7. पर्यावरणीय जागरूकता: लोगों को अपने दैनिक जीवन में जिम्मेदारीपूर्ण आदतें अपनाने के लिए प्रेरित करना।
8. जैव प्रौद्योगिकी से संबंध
बी.एससी. बायो-साइंस के विद्यार्थियों के लिए यह भ्रमण जैव विज्ञान के व्यावहारिक अनुप्रयोगों को समझने की दृष्टि से विशेष रूप से उपयोगी रहा। इस भ्रमण ने हमें कक्षा में प्राप्त सैद्धांतिक ज्ञान को विज्ञान के वास्तविक अनुप्रयोगों एवं पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने का अवसर प्रदान किया।
यह शैक्षणिक भ्रमण हमारे लिए एक महत्त्वपूर्ण एवं ज्ञानवर्धक अनुभव रहा। इस भ्रमण से हमें यह भी सीख मिली कि पर्यावरण संरक्षण की शुरुआत छोटे-छोटे प्रयासों से होती है, जैसे कचरे को कम करना, वृक्षारोपण करना, वस्तुओं का पुनः उपयोग करना, ऊर्जा का संरक्षण करना तथा अनावश्यक उपभोग से बचना।
भ्रमण के पश्चात विद्यार्थियों ने भी अपने अनुभव साझा किए :
– तानिष्का चौहान ने बताया कि उन्होंने सौर कुकर के बारे में जानकारी प्राप्त की तथा यह समझने में रुचि विकसित हुई कि यह किस प्रकार कार्य करता है।
– पूजा शर्मा ने जैविक उत्पादों तथा उनके लाभों के बारे में अधिक जानने की इच्छा व्यक्त की।
– ऋषि ने बताया कि इस भ्रमण से उन्हें यह समझने में सहायता मिली कि प्राकृतिक एवं नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का उपयोग करके बिजली पर निर्भरता कम की जा सकती है।
– खुशी ने साझा किया कि उन्होंने प्रकृति एवं पर्यावरण से संबंधित अनेक नई बातें सीखीं।
समग्र रूप से, इस भ्रमण ने सतत जीवनशैली के प्रति हमारी जागरूकता बढ़ाई तथा यह समझाया कि विज्ञान और पारंपरिक ज्ञान मिलकर स्वच्छ एवं स्वस्थ पर्यावरण के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
सहायक प्राध्यापक के रूप में मेरे विचार : पद्मश्री डॉ. जनक पलटा मगिलिगन के पर्यावरण-अनुकूल सेंटर का भ्रमण मेरे लिए एक प्रेरणादायक एवं ज्ञानवर्धक अनुभव रहा। उनकी जीवनशैली और सतत विकास के प्रति प्रतिबद्धता यह दर्शाती है कि दैनिक जीवन में सरल, व्यावहारिक एवं पर्यावरण-अनुकूल आदतें अपनाकर प्रकृति की रक्षा की जा सकती है। सतत विकास केवल कक्षा में पढ़ाया जाने वाला सैद्धांतिक विषय नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक जिम्मेदार पद्धति है। शिक्षकों एवं प्राध्यापकों की यह महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी है कि वे विद्यार्थियों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता विकसित करें और उन्हें जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए प्रेरित करें।
यह भ्रमण इस बात का भी स्मरण था कि पर्यावरण संरक्षण की शुरुआत हमारे अपने घर से होती है। बिजली एवं पानी की बचत करना, कचरे का उचित पृथक्करण करना, वृक्षारोपण करना, प्लास्टिक का कम उपयोग करना तथा प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करना ऐसे छोटे कदम हैं, जिनका सामूहिक प्रभाव बहुत बड़ा हो सकता है। पर्यावरण-अनुकूल घर केवल एक इमारत नहीं, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्य का जीवंत उदाहरण है। आज सतत जीवनशैली अपनाकर हम आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ, हरित एवं स्वस्थ पृथ्वी के निर्माण में योगदान दे सकते हैं।








