दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं की गिरफ्तारी और रिहाई का मामला चर्चा में है। पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके को 17 अक्टूबर 2026 को शांति बनाए रखने से जुड़ी शर्तों के साथ रिहा कर दिया गया, जबकि पार्टी के दो अन्य प्रमुख नेता आशुतोष रांका और सौरव दास पांच दिन की न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेजे गए थे। सबसे बड़ा सवाल यही है कि एक ही पार्टी के नेताओं के मामले में कार्रवाई अलग-अलग क्यों हुई? इसकी मुख्य वजह उनकी हिरासत की परिस्थितियों और कथित गतिविधियों में अंतर बताया गया है।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन बना गिरफ्तारी की वजह
यह पूरा मामला दिल्ली में चुनावी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर हो रहे विरोध प्रदर्शनों से जुड़ा है। CJP और अन्य संगठनों के प्रदर्शनकारियों ने मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं पर सवाल उठाए हैं। चुनाव आयोग ने पक्षपात के आरोपों से इनकार किया है और कहा है कि जिन मतदाताओं के नाम गलती से हटे हैं, वे दोबारा नाम दर्ज कराने की प्रक्रिया अपना सकते हैं।
विवाद उस समय बढ़ा जब दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटा दिया। पुलिस के अनुसार, 13 अक्टूबर को आशुतोष रांका और सौरव दास सहित CJP के कुछ सदस्य कथित तौर पर प्रतिबंधित प्रदर्शन स्थल में प्रवेश कर गए। पुलिस का आरोप है कि उन्होंने वहां नारेबाजी की और अधिकारियों के काम में बाधा पहुंचाई।
आशुतोष रांका और सौरव दास को जेल क्यों भेजा गया?
दिल्ली पुलिस ने आशुतोष रांका और सौरव दास के खिलाफ पहले से शांति बनाए रखने के लिए दिए गए बांड की शर्तों के कथित उल्लंघन और जंतर-मंतर में अनधिकृत प्रवेश से संबंधित कार्रवाई की। 14 अक्टूबर को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने दोनों को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश दिया।
मजिस्ट्रेट के आदेश के अनुसार, दोनों नेताओं के पिछले आचरण और सोशल मीडिया पर प्रदर्शन के आह्वान को देखते हुए आशंका जताई गई कि रिहा होने पर वे फिर से कानून-व्यवस्था की स्थिति प्रभावित कर सकते हैं। आदेश में यह भी कहा गया कि उस समय पर्याप्त जमानती पेश नहीं किए गए थे। इसके बाद दोनों को तिहाड़ जेल भेज दिया गया। ये पुलिस के आरोप और मजिस्ट्रेट के आदेश में दर्ज निष्कर्ष हैं; इन्हें अंतिम आपराधिक दोषसिद्धि नहीं माना जाना चाहिए।
अभिजीत दीपके को कैसे मिली रिहाई?
अभिजीत दीपके को 16 अक्टूबर को दिल्ली में प्रस्तावित ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च से पहले हिरासत में लिया गया था। पुलिस ने उनके खिलाफ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धाराओं 126 और 170 के तहत एहतियाती कार्रवाई की। 17 अक्टूबर को उन्हें विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, जहां 50 हजार रुपये का बांड भरने और शांति बनाए रखने का आश्वासन देने के बाद रिहा कर दिया गया।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, दीपके को रिहा किए जाने का एक प्रमुख कारण यह था कि वह शुक्रवार के मार्च में शामिल होने के लिए प्रदर्शन स्थल तक नहीं पहुंचे थे। इसके विपरीत, पुलिस का आरोप है कि रांका और दास जंतर-मंतर पहुंचे थे और उन्होंने वहां लागू प्रतिबंधों का उल्लंघन किया था। इसी अंतर के कारण तीनों के मामलों में अलग-अलग कार्रवाई हुई।
क्या दोनों नेताओं की रिहाई के लिए कोशिश जारी है?
18 अक्टूबर की रिपोर्टों के अनुसार, CJP की कानूनी टीम ने आशुतोष रांका और सौरव दास की रिहाई के लिए आवेदन किया था। पार्टी की ओर से कहा गया कि दोनों की रिहाई के लिए जरूरी जमानती दस्तावेज अदालत में प्रस्तुत किए गए हैं। वहीं, पुलिस की ओर से जमानतियों का सत्यापन किए जाने की जानकारी भी सामने आई थी।
CJP ने संकेत दिया है कि यदि दोनों नेताओं को रिहा नहीं किया जाता है, तो पार्टी कानूनी रास्ता अपनाएगी। हालांकि, रिहाई या आगे की हिरासत को लेकर अंतिम स्थिति संबंधित अदालत के आदेश से ही स्पष्ट होगी।
पूरे मामले में सबसे अहम बात
अभिजीत दीपके की रिहाई और आशुतोष रांका व सौरव दास की हिरासत के पीछे मुख्य अंतर पुलिस के अनुसार उनकी गतिविधियों, जंतर-मंतर पर कथित प्रवेश और पहले दिए गए शांति बांड की शर्तों से जुड़ा है। दीपके को भी बिना शर्त नहीं छोड़ा गया, बल्कि उनसे शांति बनाए रखने का बांड भरवाया गया। दूसरी ओर, रांका और दास को मजिस्ट्रेट के आदेश के तहत पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया था।
इस मामले में पुलिस के आरोप, मजिस्ट्रेट के आदेश और CJP की दलीलों को अलग-अलग समझना जरूरी है। आगे की कानूनी कार्यवाही से ही स्पष्ट होगा कि दोनों नेताओं की रिहाई पर क्या निर्णय होता है और मामले में लगाए गए आरोपों पर अदालत का अंतिम रुख क्या रहता है।








