दुनिया भर के बाजारों में कॉपर यानी तांबे की कीमतों ने नया रिकॉर्ड बना दिया है। लंदन मेटल एक्सचेंज (LME) पर तीन महीने के कॉपर का भाव 14,533 डॉलर प्रति मीट्रिक टन तक पहुंच गया, जिसने जनवरी के करीब 14,527.50 डॉलर के पिछले रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया। इसके बाद कीमत में मामूली नरमी आई, लेकिन कॉपर अब भी रिकॉर्ड स्तर के आसपास बना हुआ है।
आखिर कॉपर की कीमत में इतनी तेजी क्यों?
कॉपर की इस तेजी के पीछे सबसे बड़ी वजह सप्लाई को लेकर बढ़ती चिंता और अमेरिका की संभावित टैरिफ नीति बताई जा रही है। अमेरिका में संभावित आयात शुल्क की आशंका के कारण बड़ी मात्रा में कॉपर वहां भेजा जा रहा है। इससे अमेरिकी वेयरहाउस में स्टॉक बढ़ रहा है, जबकि अमेरिका के बाहर उपलब्ध कॉपर की मात्रा कम होती जा रही है।
यानी मामला सिर्फ कॉपर की कुल उपलब्धता का नहीं, बल्कि यह भी है कि दुनिया के किस हिस्से में कितना कॉपर मौजूद है।
अमेरिका में बढ़ा स्टॉक, बाकी दुनिया में घटा भंडार
अमेरिकी COMEX वेयरहाउस में कॉपर का स्टॉक रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। वहीं चीन के Shanghai Futures Exchange यानी SHFE में स्टॉक काफी नीचे आया है। रिपोर्ट के मुताबिक SHFE का कॉपर स्टॉक करीब 63,000 टन रह गया, जो जनवरी 2024 के बाद सबसे निचले स्तरों में है।
इससे बाजार में एक दिलचस्प स्थिति पैदा हुई है—अमेरिका में कॉपर का बड़ा भंडार जमा हो रहा है, लेकिन चीन और अन्य बाजारों में उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ रही है।
अमेरिका की टैरिफ पॉलिसी बनी बड़ा फैक्टर
कॉपर की कीमत में तेजी का एक बड़ा कारण अमेरिका की संभावित टैरिफ नीति है। बाजार में आशंका है कि अमेरिका रिफाइंड कॉपर के आयात पर अतिरिक्त शुल्क लगा सकता है। इसी संभावना के कारण कारोबारी पहले से ही कॉपर की खेप अमेरिका भेजने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं।
इससे अमेरिका में स्टॉक बढ़ा और दूसरे क्षेत्रों में उपलब्ध सप्लाई पर दबाव आया। विशेषज्ञों के मुताबिक जब तक टैरिफ को लेकर अनिश्चितता बनी रहती है, तब तक कॉपर की कीमतों में मजबूती रह सकती है।
खदानों से भी आ रही सप्लाई की चिंता
कॉपर की तेजी सिर्फ ट्रेडिंग और टैरिफ से जुड़ी नहीं है। दुनिया के कुछ बड़े कॉपर उत्पादक देशों में उत्पादन से जुड़ी परेशानियों ने भी बाजार की चिंता बढ़ाई है।
2026 की पहली छमाही में वैश्विक कॉपर-माइन उत्पादन में करीब 1.1 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। वहीं कॉपर कॉन्संट्रेट का उत्पादन करीब 2.6 फीसदी घटा। चिली, इंडोनेशिया और डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो जैसे प्रमुख उत्पादक देशों में उत्पादन संबंधी चुनौतियों ने सप्लाई की तस्वीर को प्रभावित किया है।
AI और डेटा सेंटर भी बढ़ा रहे हैं मांग
कॉपर को आधुनिक अर्थव्यवस्था की एक अहम औद्योगिक धातु माना जाता है। बिजली के ग्रिड, इलेक्ट्रिक वाहन, रिन्यूएबल एनर्जी, सेमीकंडक्टर और डेटा सेंटर जैसे क्षेत्रों में इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है।
खास तौर पर AI डेटा सेंटर और पावर इंफ्रास्ट्रक्चर में बढ़ते निवेश से लंबी अवधि में कॉपर की मांग बढ़ने की उम्मीद है। यही वजह है कि बाजार में कॉपर को भविष्य की ऊर्जा और डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण कमोडिटी माना जा रहा है।
डॉलर कमजोर होने से भी मिला सपोर्ट
कॉपर की कीमतों को कमजोर अमेरिकी डॉलर से भी समर्थन मिला है। जब डॉलर कमजोर होता है तो डॉलर में कीमत वाली कमोडिटीज दूसरे देशों के खरीदारों के लिए अपेक्षाकृत सस्ती हो सकती हैं। इससे मेटल्स की मांग और निवेश भावना को सहारा मिल सकता है।
आगे क्या हो सकता है?
कॉपर की कीमतों का अगला रुख कई बातों पर निर्भर करेगा। सबसे अहम नजर अमेरिका की टैरिफ नीति, चीन की मांग, वैश्विक खदान उत्पादन और अलग-अलग क्षेत्रों में उपलब्ध स्टॉक पर रहेगी।
अगर अमेरिका में कॉपर का स्टॉक बढ़ता रहा और बाकी बाजारों में उपलब्धता कम बनी रही, तो कीमतों पर दबाव ऊपर की तरफ रह सकता है। दूसरी ओर, अगर टैरिफ को लेकर स्थिति साफ होती है या सप्लाई में सुधार आता है, तो रिकॉर्ड स्तर से कुछ मुनाफावसूली भी देखने को मिल सकती है।
फिलहाल कॉपर की रिकॉर्ड तेजी यह संकेत दे रही है कि सप्लाई का भौगोलिक असंतुलन, संभावित अमेरिकी टैरिफ और लंबी अवधि की बढ़ती औद्योगिक मांग मिलकर बाजार को मजबूत बनाए हुए हैं। हालांकि कमोडिटी की कीमतें तेजी से बदल सकती हैं, इसलिए रिकॉर्ड भाव को भविष्य की निश्चित दिशा का संकेत नहीं माना जाना चाहिए।








