गुवाहाटी: असम में भूमि और आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता प्रणब डोले की हिरासत को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। कांग्रेस ने उनकी तुरंत और बिना शर्त रिहाई की मांग उठाई है। असम कांग्रेस अध्यक्ष और जोरहाट से सांसद गौरव गोगोई ने डोले की हिरासत को लेकर राज्य सरकार पर सवाल उठाए और आरोप लगाया कि असहमति की आवाजों को दबाने के लिए कड़े कानूनों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
NSA के तहत हिरासत को लेकर कांग्रेस के सवाल
प्रणब डोले को काजीरंगा नेशनल पार्क के पास प्रस्तावित एक पांच सितारा होटल के विरोध से जुड़े मामले में पहले गिरफ्तार किया गया था। अदालत से उन्हें इस मामले में जमानत मिलने के बाद असम सरकार ने उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत का आदेश जारी किया। कांग्रेस ने इसी कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने भी पहले आरोप लगाया था कि अदालत से जमानत मिलने के तुरंत बाद NSA लगाना न्यायिक प्रक्रिया को दरकिनार करने जैसा है। हालांकि, ये कांग्रेस के राजनीतिक आरोप हैं और सरकार का पक्ष इस दावे से अलग हो सकता है।
गौरव गोगोई ने उठाई रिहाई की मांग
5 सितंबर को गोलाघाट जिले के बोकाखाट में आयोजित नागरिक सभा में गौरव गोगोई ने प्रणब डोले की बिना शर्त रिहाई की मांग की। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार लोकतांत्रिक असहमति को दबाने के लिए NSA जैसे कड़े कानूनों का इस्तेमाल कर रही है।
गोगोई ने काजीरंगा के पर्यावरणीय संरक्षण से जुड़े मुद्दे को भी इस पूरे विवाद से जोड़ा। उन्होंने प्रस्तावित परियोजनाओं और काजीरंगा के आसपास के इको-सेंसिटिव जोन (ESZ) को लेकर भी चिंता जताई।
काजीरंगा होटल प्रोजेक्ट का क्या है विवाद?
प्रणब डोले काजीरंगा क्षेत्र में प्रस्तावित लग्जरी होटल परियोजना के विरोध से जुड़े प्रमुख कार्यकर्ताओं में रहे हैं। उनके समर्थक और विभिन्न अधिकार संगठनों का कहना है कि परियोजना से स्थानीय समुदायों की जमीन, आजीविका और पर्यावरण पर असर पड़ सकता है।
वहीं, इस मुद्दे पर सरकार और प्रशासन का पक्ष अलग हो सकता है। इसलिए होटल परियोजना या जमीन से जुड़े आरोपों को अंतिम तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि संबंधित पक्षों के दावों के रूप में देखा जाना चाहिए।
पहले अदालत से मिली थी जमानत
रिपोर्टों के मुताबिक डोले को जुलाई में काजीरंगा के पास प्रस्तावित होटल के विरोध से जुड़े एक मामले में गिरफ्तार किया गया था। बाद में जिला अदालत ने उन्हें जमानत दी। इसके अगले ही दिन उनके खिलाफ NSA के तहत कार्रवाई की गई, जिसके कारण अदालत से जमानत मिलने के बावजूद उनकी हिरासत जारी रही।
यही घटनाक्रम कांग्रेस के विरोध का मुख्य आधार बना हुआ है। पार्टी का कहना है कि यदि अदालत से किसी मामले में जमानत मिल चुकी है तो उसके तुरंत बाद निवारक हिरासत कानून के जरिए हिरासत जारी रखना गंभीर सवाल खड़े करता है।
राजनीतिक विवाद क्यों बढ़ रहा है?
प्रणब डोले का मामला अब सिर्फ एक कानूनी कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा है। कांग्रेस के अलावा कई अधिकार और नागरिक संगठनों ने भी उनकी रिहाई की मांग की है। उनका कहना है कि जमीन, पर्यावरण और स्थानीय समुदायों से जुड़े मुद्दों पर शांतिपूर्ण विरोध करने वालों के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई लोकतांत्रिक अधिकारों को प्रभावित कर सकती है।
कांग्रेस ने इस मामले को असम में लोकतांत्रिक अधिकारों, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय लोगों के हितों से जोड़कर सरकार पर राजनीतिक दबाव बढ़ाया है।
सरकार का पक्ष भी महत्वपूर्ण
इस पूरे विवाद में यह ध्यान रखना जरूरी है कि कांग्रेस और अधिकार संगठनों द्वारा लगाए गए आरोप राजनीतिक एवं संगठनात्मक दावे हैं। दूसरी ओर, NSA के तहत कार्रवाई का प्रशासनिक आधार और उससे जुड़ी कानूनी प्रक्रिया अलग विषय है। मामले में अंतिम स्थिति न्यायिक और कानूनी प्रक्रिया से ही स्पष्ट होगी।
आगे क्या?
अब राजनीतिक नजर इस बात पर है कि प्रणब डोले की NSA हिरासत को लेकर आगे क्या कानूनी कदम उठाए जाते हैं। कांग्रेस लगातार उनकी रिहाई की मांग कर रही है, जबकि सरकार की कार्रवाई को लेकर कानूनी और राजनीतिक बहस जारी है।
कुल मिलाकर, प्रणब डोले की हिरासत ने असम में जमीन, पर्यावरण, स्थानीय अधिकार और लोकतांत्रिक विरोध के मुद्दों को एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। कांग्रेस की रिहाई की मांग के बाद यह मामला आने वाले दिनों में और तूल पकड़ सकता है।








