जयपुर। क्लाइमेट थिंट टैंक काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) ने बुधवार को जयपुर में “स्ट्रेंथनिंग क्लाइमेट रेजिलिएंस थ्रू एआई-ड्रिवन क्लाइमेट डिसीजंस एंड एक्शंस” विषय पर एक नॉलेज-शेयरिंग राउंडटेबल का आयोजन किया। सीईईडब्ल्यू के शोधकर्ताओं ने बताया कि भारत में 2026 का मानसून दो विरोधाभासी वास्तविकताएं प्रदर्शित कर रहा है। जहां कुछ राज्य विनाशकारी बाढ़ का सामना कर रहे हैं, वहीं अन्य राज्य गंभीर रूप से बारिश के घाटे का सामना कर रहे हैं, जिससे देश के आधे से अधिक जिले बारिश की कमी से प्रभावित हैं। जुलाई के मध्य तक, देश के 166 प्रमुख जलाशयों में उनकी कुल जल भंडारण क्षमता का लगभग 34 प्रतिशत पानी ही था, जो पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में काफी कम है।
शोधकर्ताओं ने क्लाइमेट रेजिलिएंस एनालिटिक्स एंड विज़ुअलाइजेशन इंटेलिजेंस सिस्टम (CRAVIS.ai) का भी प्रदर्शन किया, जो सीईईडब्ल्यू द्वारा विकसित अपनी तरह का पहला एआई-संचालित क्लाइमेट इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म है। क्रेविस (CRAVIS) पिछले 40 से अधिक वर्षों के ऐतिहासिक जलवायु आंकड़ों को 2030–2050 और 2051–2070 तक के अनुमानों के साथ जोड़ता है। यह विभिन्न उत्सर्जन और ग्लोबल वार्मिंग परिदृश्यों के तहत 279 संकेतकों (इंडीकेटर) के आधार पर जिला-स्तरीय विश्लेषण करने की सुविधा देता है। यह अपने उपयोगकर्ताओं को एक समग्र जोखिम विश्लेषण के लिए जलवायु आंकड़ों को क्षेत्रीय आंकड़ों – जैसे पावर इंफ्रास्ट्रक्चर, कृषि, भूमि उपयोग और सार्वजनिक स्वास्थ्य की जानकारी – के साथ रखकर देखने (overlay) की भी सुविधा देता है। इस प्लेटफॉर्म को एक कलेक्टिव डेटा कॉमन्स के रूप में तैयार किया गया है, जो इसके इंटेलिजेंस बेस को लगातार बढ़ाने और मजबूत बनाने के लिए विभिन्न संगठनों और हितधारकों को आंकड़ों और विश्लेषण में योगदान करने के लिए भी आमंत्रित करता है।
क्रेविस (CRAVIS) के पूर्वाकलनों के अनुसार, अगले दो दशकों में भारी बारिश की घटनाओं में लगातार वृद्धि का अनुमान है। कई जिलों में प्रतिवर्ष भारी बारिश वाले 10 से 30 अतिरिक्त दिन देखे जा सकते हैं। महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे मध्य और दक्षिणी राज्यों में बारिश और गर्म दिनों, दोनों में अधिक वृद्धि होने का अनुमान है। राजस्थान, भारत के सबसे जलवायु-संवेदनशील राज्यों में से एक है, जिसकी शुष्क से अर्ध-शुष्क जलवायु इसे बढ़ती गर्मी और मानसून परिवर्तनशीलता के प्रति अत्यधिक सुभेद्य बनाती है। 2026 के सुपर अल नीनो के दौरान, ये संवेदनशीलताएं काफी तेजी से स्पष्ट होकर सामने आ रही हैं। पश्चिमी राजस्थान लंबे समय तक शुष्क स्थिति और धूल भरी आंधियों का, जबकि पूर्वी राजस्थान सामान्य से कम बारिश के साथ गर्म और उमस वाले मौसम का सामना कर रहा है। ये स्थितियां अल नीनो के कारण दक्षिण-पश्चिम मानसून के कमजोर पड़ते प्रभावों से मेल खाती हैं।
साथ ही, राजस्थान में मानसूनी बारिश लंबी अवधि में लगातार वृद्धि की जगह पर परिवर्तनशीलता (उतार-चढ़ाव) में वृद्धि होने की प्रवृत्ति दिखाती है। औसतन मौसमी बारिश 1981-2010 के दौरान 471 मिलीमीटर थी, जो 2011-2024 में बढ़कर 598 मिलीमीटर हो गई। लेकिन 2051-2070 तक यह घटकर 569 मिलीमीटर हो जाने का अनुमान है, जो साल-दर-साल बड़े बदलावों का संकेत देता है। क्रेविस (CRAVIS) एआई प्लेटफॉर्म पूरे राजस्थान में पूर्व-पश्चिम दिशा में लगातार हो रहा बदलाव भी रेखांकित करता है, जहां पश्चिमी और उत्तरी जिले सर्वाधिक गर्मी का जोखिम है, वहीं दक्षिण-पूर्वी जिलों को लगातार अधिक मानसूनी बारिश मिल रही है। मौजूदा अल नीनो इन मौजूदा जलवायु पैटर्न को विस्तार रहा है, जिससे जल संसाधनों, कृषि, पशुधन और ग्रामीण आजीविका पर दबाव बढ़ रहा है। ऐतिहासिक अवलोकनों को भविष्य के जलवायु अनुमानों के साथ जोड़कर, क्रेविस (CRAVIS) एआई प्लेटफॉर्म जलवायु से जुड़ी जिला-स्तरीय जानकारियां देता है, जो राजस्थान में अनुकूलन (adaptation), आपदा संबंधित जोखिम को घटाने और दीर्घकालिक जलवायु लचीलापन (climate resilience) विकसित करने के लिए साक्ष्य-आधारित योजना निर्माण में सहायक है।
भारत पहले से ही गर्मी के बढ़ते जोखिम का सामना कर रहा है, जहां 57 प्रतिशत से अधिक जिले और लगभग 75 प्रतिशत आबादी उच्च से अत्यधिक उच्च गर्मी के जोखिम का सामना कर रही है। क्रेविस (CRAVIS.ai) के अनुसार, आने वाले दशकों में भारत में अत्यधिक गर्मी में भारी वृद्धि होने का अनुमान है। 1981–2010 की आधारभूत (बेसलाइन) अवधि के दौरान, केवल 15 प्रतिशत जिलों में ही प्रति वर्ष 116 से अधिक दिन ऐसे होते थे जब अधिकतम तापमान 35°C से ऊपर जाता था। 2031–2050 के दौरान यह बढ़कर 46 प्रतिशत जिलों तक और 2051–2070 तक 57 प्रतिशत जिलों तक पहुंचने का अनुमान है। रात के समय की गर्मी और भी तेजी से बढ़ने की उम्मीद है। 1981–2010 की आधारभूत अवधि के दौरान, केवल 7 प्रतिशत जिलों में प्रति वर्ष 107 से अधिक दिन ऐसे थे, जब न्यूनतम तापमान 25°C से अधिक था। 2031–2050 तक, यह बढ़कर 47 प्रतिशत जिलों और 2051–2070 तक 59 प्रतिशत जिलों तक पहुंच जाने का अनुमान है।
क्रेविस (CRAVIS) के अनुसार, आने वाले दशकों में भारत में भीषण गर्मी में काफी वृद्धि होने का अनुमान है। 1981–2010 की बेसलाइन अवधि के दौरान, केवल 15 प्रतिशत जिलों में साल में 116 से अधिक दिनों तक अधिकतम तापमान 35°C से अधिक हो सकता है। 2031–2050 के दौरान यह आंकड़ा बढ़कर 46 प्रतिशत जिलों तक और 2051–2070 तक 57 प्रतिशत जिलों तक पहुंचने का अनुमान है। रात के समय की गर्मी और भी तेज़ी से बढ़ने की उम्मीद है। बेसलाइन अवधि के दौरान, केवल 7 प्रतिशत जिलों में साल में 107 से ज़्यादा दिन न्यूनतम तापमान 25°C से ज़्यादा दर्ज किया गया। 2031–2050 तक, यह आंकड़ा बढ़कर 47 प्रतिशत जिलों तक और 2051–2070 तक 59 प्रतिशत जिलों तक पहुंचने का अनुमान है। इससे सूरज ढलने के बाद भी शरीर को गर्मी से छुटकारा नहीं मिल पाता है, जो मानव स्वास्थ्य को प्रभावित करता है और श्रम उत्पादकता (labour productivity), बुनियादी ढांचे के प्रदर्शन और आर्थिक लचीलेपन पर भी असर डालता है।
क्रेविस (CRAVIS) एआई प्लेटफॉर्म से मिलने वाले राजस्थान के निष्कर्ष बताते हैं कि राज्य में दीर्घकालिक गर्मी का रुझान तेज होने की संभावना है। 35 डिग्री सेल्सियस से अधिक अधिकतम तापमान वाले दिनों की वार्षिक संख्या 1981-2010 से 2011-2024 के बीच 130 से 131 दिन प्रतिवर्ष के बीच स्थिर रही, जिसके 2031–2050 तक यह तेजी से बढ़कर 176 दिन प्रति वर्ष और 2051–2070 तक 185 दिन प्रतिवर्ष पहुंचने का अनुमान है। रात के समय की गर्मी और भी तेजी से बढ़ रही है। 1981–2010 के बीच 25°C से ऊपर के न्यूनतम तापमान वाले दिनों की संख्या 79 दिन प्रतिवर्ष थी, जिसे हालिया आकलनों में 91 दिन प्रतिवर्ष पाया गया है। यह 2031–2050 तक 132 दिन प्रतिवर्ष और 2051–2070 तक 139 दिन प्रतिवर्ष तक पहुंचने का अनुमान है।
*डॉ. विश्वास चितले, फेलो, सीईईडब्ल्यू,* ने कहा, “क्रेविस (CRAVIS) को जब स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल किया जाता है, तब यह वास्तविक प्रभावों को सामने ला सकता है। यह जटिल जलवायु जानकारी को नीति निर्माताओं, उद्यमियों, वित्तीय विशेषज्ञों, पत्रकारों और शहरी योजनाकारों के लिए सुलभ बनाता है। राज्य के विभाग हीट एक्शन प्लान और तैयारियों की रणनीतियों को अपडेट करने के लिए गर्मी व बारिश के शहर और जिलास्तरीय संकेतकों का इस्तेमाल कर सकते हैं; शहरी स्थानीय निकाय मास्टर प्लान और बुनियादी ढांचे से जुड़े निवेशों में जलवायु जानकारियों को शामिल कर सकते हैं; और नियामक व जन उपयोगिता सेवाएं (यूटिलिटीज) मांगों का पूर्वानुमान करने और लचीलेपन से संबंधित योजनाएं बनाने में इन अनुमानों को शामिल कर सकती हैं।”







