नीट (NEET) से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शन और कानून-व्यवस्था को लेकर सख्त रुख अपनाया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन यदि कोई व्यक्ति प्रदर्शन की आड़ में हिंसा, तोड़फोड़ या अन्य आपराधिक गतिविधियों में शामिल होता है, तो उसे कानून के तहत राहत नहीं दी जा सकती।
सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत ने कहा कि विरोध दर्ज कराना और अपनी बात रखना लोकतंत्र की मूल भावना का हिस्सा है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि कोई व्यक्ति कानून अपने हाथ में ले। अदालत ने संकेत दिया कि यदि किसी के खिलाफ हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने या अन्य आपराधिक कृत्यों के प्रथम दृष्टया साक्ष्य हैं, तो ऐसे मामलों में न्यायालय से राहत की अपेक्षा नहीं की जा सकती।
मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से प्रदर्शन के दौरान दर्ज किए गए मामलों में राहत की मांग की गई थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रत्येक मामले का निर्णय उसके तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा। केवल प्रदर्शन में शामिल होने के आधार पर किसी को अपराधी नहीं माना जा सकता, लेकिन यदि किसी व्यक्ति की भूमिका किसी आपराधिक घटना में सामने आती है, तो कानून अपना काम करेगा।
अदालत ने यह भी दोहराया कि संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार देता है, लेकिन यह अधिकार असीमित नहीं है। सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना और कानून का पालन करना प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। विरोध के नाम पर हिंसा या अराजकता किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं की जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद नीट से जुड़े विवाद और प्रदर्शन एक बार फिर चर्चा में आ गए हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत ने अपने अवलोकन के जरिए यह स्पष्ट संदेश दिया है कि लोकतांत्रिक अधिकारों का सम्मान किया जाएगा, लेकिन कानून तोड़ने वालों के प्रति नरमी नहीं बरती जाएगी।
फिलहाल मामले की सुनवाई जारी है और अंतिम फैसला आना बाकी है। अदालत ने संबंधित पक्षों की दलीलें सुनने के बाद आगे की सुनवाई के लिए अगली तारीख तय की है। इस बीच सभी पक्षों की नजर सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय पर बनी हुई है।








