पिछले छह महीनों में निवेश बाजारों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। इस अवधि में जहां एक ओर सोना करीब 20 प्रतिशत तक सस्ता हुआ है, वहीं चांदी में लगभग 43 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई है। सुरक्षित निवेश माने जाने वाले इन कीमती धातुओं में आई इस गिरावट ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है।
विशेषज्ञों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर डॉलर की मजबूती, अंतरराष्ट्रीय तनावों में उतार-चढ़ाव और कच्चे तेल की कीमतों में बदलाव का सीधा असर सोना-चांदी की कीमतों पर पड़ा है। खासतौर पर ईरान और पश्चिमी देशों के बीच तनाव और जियोपॉलिटिकल अनिश्चितताओं के बावजूद डॉलर इंडेक्स मजबूत रहने से कीमती धातुओं पर दबाव बना रहा।
चांदी में आई तेज गिरावट को औद्योगिक मांग में सुस्ती से भी जोड़ा जा रहा है। इलेक्ट्रॉनिक्स और सोलर सेक्टर में मांग प्रभावित होने से चांदी की कीमतों पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है। वहीं, सोने की कीमतों में गिरावट का कारण निवेशकों का जोखिम भरे एसेट्स की ओर रुझान और वैश्विक ब्याज दरों में स्थिरता को माना जा रहा है।
इसी अवधि में शेयर बाजार भी कमजोर रहा। सेंसेक्स में लगभग 11 प्रतिशत और निफ्टी में करीब 8.6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक अनिश्चितता, विदेशी निवेशकों की बिकवाली और कमजोर वैश्विक संकेतों के कारण भारतीय शेयर बाजार दबाव में रहा।
स्टॉक मार्केट विश्लेषकों के अनुसार, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की निकासी ने बाजार पर खासा असर डाला है। इसके अलावा, अमेरिका और अन्य विकसित अर्थव्यवस्थाओं में ब्याज दरों की दिशा को लेकर अनिश्चितता ने भी निवेशकों को सतर्क रखा है।
आर्थिक जानकारों का मानना है कि सोना-चांदी और शेयर बाजार में एक साथ गिरावट निवेशकों के लिए मिश्रित संकेत है। जहां सोने को आमतौर पर सुरक्षित निवेश माना जाता है, वहीं इसमें गिरावट यह दर्शाती है कि वैश्विक स्तर पर निवेश पैटर्न बदल रहा है।
हालांकि, कुछ विशेषज्ञ इसे अस्थायी करेक्शन मान रहे हैं और उनका कहना है कि लंबी अवधि में सोना और शेयर बाजार दोनों में रिकवरी की संभावना बनी हुई है। उनके अनुसार, मौजूदा गिरावट के बाद बाजार में एक नया संतुलन बन सकता है।
फिलहाल निवेशकों के बीच सतर्कता का माहौल है और सभी की नजरें वैश्विक आर्थिक संकेतकों, डॉलर की चाल और भू-राजनीतिक घटनाक्रमों पर टिकी हुई हैं, जो आने वाले समय में बाजार की दिशा तय करेंगे।








