अमेरिकी राजनीति में तेजी से बदलते समीकरणों के बीच अमेरिकी नेता Marco Rubio के हालिया बयानों ने दक्षिण एशिया की राजनीति को लेकर नई बहस छेड़ दी है। दिल्ली यात्रा से पहले चीन, पाकिस्तान और हिंद-प्रशांत क्षेत्र को लेकर दिए गए संकेतों को भारत बेहद गंभीरता से देख रहा है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या अमेरिका की नई रणनीति भारत के लिए अवसर लेकर आ रही है या फिर नई कूटनीतिक उलझनों का संकेत दे रही है।
दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका की प्राथमिकता चीन को वैश्विक स्तर पर संतुलित करने की रही है। इसी रणनीति के तहत भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक मजबूत साझेदार के रूप में देखा गया। QUAD जैसे मंचों में भारत की सक्रिय भागीदारी ने अमेरिका-भारत संबंधों को नई ऊंचाई दी। लेकिन अब वॉशिंगटन के कुछ नए संकेत यह बताते हैं कि अमेरिका पाकिस्तान के साथ भी अपने संबंधों को पूरी तरह खत्म नहीं करना चाहता।
अमेरिका की यह रणनीति भारत के लिए इसलिए संवेदनशील मानी जा रही है क्योंकि पाकिस्तान लंबे समय से चीन का सबसे करीबी रणनीतिक साझेदार रहा है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) पहले ही भारत की सुरक्षा चिंताओं का बड़ा कारण है। ऐसे में यदि अमेरिका, चीन को संतुलित करने के लिए पाकिस्तान के साथ सीमित सामरिक सहयोग बढ़ाता है, तो भारत के सामने एक जटिल स्थिति पैदा हो सकती है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिका की प्राथमिक चिंता अब आतंकवाद से ज्यादा चीन की बढ़ती सैन्य और आर्थिक ताकत है। इसी कारण वॉशिंगटन दक्षिण एशिया में अपने पुराने समीकरणों को नए तरीके से गढ़ने की कोशिश कर रहा है। पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति, अफगानिस्तान से उसकी निकटता और चीन पर उसका प्रभाव अमेरिका के लिए अब भी रणनीतिक महत्व रखते हैं।
हालांकि, भारत के लिए राहत की बात यह है कि अमेरिका अभी भी नई दिल्ली को अपने सबसे विश्वसनीय साझेदारों में गिनता है। रक्षा, टेक्नोलॉजी, सेमीकंडक्टर, ऊर्जा और समुद्री सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के रिश्ते लगातार मजबूत हो रहे हैं। लेकिन भारत की विदेश नीति हमेशा “रणनीतिक स्वायत्तता” पर आधारित रही है। रूस के साथ रक्षा संबंध, ईरान के साथ ऊर्जा सहयोग और BRICS जैसे मंचों में भागीदारी अमेरिका को कभी-कभी असहज करती रही है।
यही कारण है कि अमेरिकी नेताओं के बयानों को भारत केवल दोस्ती के नजरिए से नहीं देखता, बल्कि उनके पीछे छिपे रणनीतिक संदेशों को भी समझने की कोशिश करता है। China और Pakistan को लेकर अमेरिका का कोई भी नया रुख भारत की सुरक्षा और कूटनीतिक नीति पर सीधा असर डाल सकता है।
विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में भारत को बेहद संतुलित नीति अपनानी होगी। एक तरफ उसे अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी को मजबूत रखना होगा, वहीं दूसरी ओर रूस और ग्लोबल साउथ देशों के साथ अपने पारंपरिक संबंधों को भी बनाए रखना पड़ेगा। यही संतुलन भारत की सबसे बड़ी ताकत भी है और सबसे बड़ी चुनौती भी।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होते, केवल हित स्थायी होते हैं। अमेरिका की नई रणनीति भी इसी सिद्धांत पर आधारित दिखाई देती है। लेकिन भारत के लिए असली सवाल यही है कि क्या वह बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच अपने हितों को सुरक्षित रखते हुए संतुलन बनाए रख पाएगा, या फिर उसे नई भू-राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।








