मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर वैश्विक चिंता लगातार गहराती जा रही है। दुनिया के सबसे अहम समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल होर्मुज स्ट्रेट पर जारी अनिश्चितता ने तेल बाजार से लेकर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति तक हलचल बढ़ा दी है। इसी बीच चीन ने ईरान को साफ संदेश देते हुए कहा है कि जलमार्ग को जल्द से जल्द सामान्य किया जाए, ताकि वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित न हो।
रिपोर्ट्स के मुताबिक चीन के विदेश मंत्री ने ईरान के वरिष्ठ नेता और विदेश मंत्री अब्बास अराघची के साथ बातचीत में होर्मुज जलडमरूमध्य को खुला रखने की अहमियत पर जोर दिया। चीन ने कहा कि यह केवल क्षेत्रीय मुद्दा नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था से जुड़ा मामला है। बीजिंग का मानना है कि अगर इस समुद्री रास्ते में लंबे समय तक बाधा बनी रहती है, तो इसका असर वैश्विक तेल सप्लाई, शिपिंग लागत और अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर गंभीर रूप से पड़ सकता है।
क्यों अहम है होर्मुज जलडमरूमध्य?
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त तेल परिवहन मार्गों में गिना जाता है। खाड़ी देशों—सऊदी अरब, इराक, कुवैत, यूएई और कतर—से निकलने वाला बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर एशिया और यूरोप तक पहुंचता है। अनुमान है कि दुनिया के कुल तेल व्यापार का बड़ा प्रतिशत हर दिन इसी मार्ग से गुजरता है। ऐसे में यहां किसी भी तरह का तनाव सीधे वैश्विक ऊर्जा संकट को जन्म दे सकता है।
चीन खुद दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में शामिल है और उसकी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आता है। यही वजह है कि बीजिंग इस मुद्दे पर खुलकर सक्रिय नजर आ रहा है। चीन नहीं चाहता कि पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव उसके आर्थिक हितों और वैश्विक सप्लाई चेन को प्रभावित करे।
ईरान पर बढ़ता अंतरराष्ट्रीय दबाव
हाल के दिनों में क्षेत्रीय संघर्ष और समुद्री सुरक्षा को लेकर अमेरिका, यूरोपीय देशों और खाड़ी राष्ट्रों की चिंता भी बढ़ी है। कई देशों ने समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग उठाई है। अब चीन का खुलकर बयान देना इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि बीजिंग को अब तक ईरान का करीबी साझेदार समझा जाता रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि चीन की यह टिप्पणी संकेत देती है कि वैश्विक व्यापारिक हितों के सामने अब उसके लिए स्थिरता सबसे बड़ी प्राथमिकता बनती जा रही है। अगर ईरान लंबे समय तक सख्त रुख बनाए रखता है, तो उसे अपने सहयोगी देशों की नाराजगी का भी सामना करना पड़ सकता है।
अब क्या करेगा तेहरान?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ईरान चीन की सलाह मानते हुए नरम रुख अपनाएगा या फिर क्षेत्रीय तनाव के बीच अपनी रणनीतिक स्थिति बनाए रखेगा। तेहरान पहले भी कई बार संकेत दे चुका है कि यदि उसके हितों को नुकसान पहुंचाया गया तो वह होर्मुज क्षेत्र में कड़े कदम उठा सकता है।
हालांकि जानकार मानते हैं कि चीन जैसे बड़े आर्थिक साझेदार के दबाव को ईरान पूरी तरह नजरअंदाज नहीं कर सकता। आने वाले दिनों में तेहरान की प्रतिक्रिया पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी, क्योंकि इसका असर केवल मध्य-पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था, तेल की कीमतों और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ेगा।







