भारतीय संगीत जगत की दिग्गज गायिका आशा भोसले के निधन के बाद उनके अंतिम दिनों में ICU में दिए गए इलाज को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। एक डॉक्टर द्वारा सोशल मीडिया पर की गई पोस्ट ने मेडिकल समुदाय और आम लोगों के बीच गंभीर चर्चा को जन्म दे दिया है।
डॉक्टर ने अपनी पोस्ट में सवाल उठाया है कि क्या हर मरीज को अंतिम अवस्था में ICU में आक्रामक इलाज, CPR और जीवन रक्षक मशीनों पर रखना हमेशा सही होता है? उन्होंने कहा कि कई बार मरीज की हालत और जीवन की गुणवत्ता को देखते हुए इलाज के तरीके पर पुनर्विचार करने की जरूरत होती है।
इस टिप्पणी के बाद पैसिव यूथेनेशिया (निष्क्रिय इच्छामृत्यु), लिविंग विल और एंड-ऑफ-लाइफ केयर जैसे संवेदनशील विषय फिर से चर्चा में आ गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में इन मुद्दों को लेकर अभी भी स्पष्ट जागरूकता और समझ की कमी है।
मेडिकल जगत में इस बात पर दो राय देखने को मिल रही हैं। एक वर्ग का मानना है कि डॉक्टर का मुख्य उद्देश्य हर संभव जीवन बचाना होता है, जबकि दूसरा वर्ग कहता है कि कभी-कभी मरीज को अनावश्यक पीड़ा से बचाना भी उतना ही जरूरी है।
इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि गंभीर और असाध्य बीमारी की स्थिति में इलाज की सीमाएं क्या होनी चाहिए और निर्णय लेने का अधिकार किसके पास होना चाहिए—परिवार, डॉक्टर या मरीज के लिखित निर्देश?
यह बहस अब केवल एक व्यक्ति के इलाज तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह भारत में एंड-ऑफ-लाइफ केयर नीति और चिकित्सा नैतिकता पर एक व्यापक चर्चा का रूप ले चुकी है।







