कांग्रेस महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने सभी कांग्रेस सांसदों को तुरंत दिल्ली पहुंचने का निर्देश जारी किया। पार्टी ने बुधवार को संसद के मकर द्वार पर बिल के खिलाफ प्रदर्शन भी किया। विपक्ष का आरोप है कि यह बिल NGOs, सामुदायिक संगठनों और खासकर अल्पसंख्यक संस्थाओं (चर्च, स्कूल, अनाथाश्रम आदि) को निशाना बनाकर उन्हें बर्बाद करने की साजिश है।
बिल में क्या प्रावधान हैं?
सरकार का कहना है कि FCRA 2010 में प्रस्तावित संशोधन विदेशी फंडिंग की पारदर्शिता बढ़ाने और उसके दुरुपयोग को रोकने के लिए है। मुख्य उद्देश्य जबरन धर्मांतरण, आतंकवाद फंडिंग और व्यक्तिगत लाभ के लिए विदेशी पैसों के गलत इस्तेमाल को रोकना बताया जा रहा है।
विपक्ष का दावा है कि बिल में ऐसे प्रावधान हैं जो:
- विदेशी फंडिंग से बनी संपत्ति पर सरकार का नियंत्रण बढ़ा सकते हैं।
- NGOs और सामाजिक संस्थाओं पर सख्त निगरानी और कार्रवाई का प्रावधान रखते हैं।
- अल्पसंख्यक समुदायों द्वारा चलाए जा रहे स्कूलों, अस्पतालों, अनाथाश्रमों और धार्मिक संस्थाओं को बुरी तरह प्रभावित करेंगे।
विपक्ष का तीखा हमला
कांग्रेस महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने कहा, “यह असंवैधानिक कानून है जो ईमानदार NGOs और अल्पसंख्यक संगठनों को बर्बाद कर देगा। हम बीजेपी को इस बिल के जरिए दबाव डालने की इजाजत नहीं देंगे।”
कांग्रेस सांसद हिबी ईडन ने इसे ‘ड्रैकोनियन लॉ’ बताया और कहा कि यह पूरे देश के NGOs के हितों को नुकसान पहुंचाएगा। उन्होंने बिल वापस लेने की मांग की।
आरएसपी सांसद एन.के. प्रेमचंद्रन ने आरोप लगाया कि यह अल्पसंख्यकों के अधिकारों को छीनने का भाजपा का नियोजित एजेंडा है।
कांग्रेस ने केरल में आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए भी इस बिल का विरोध तेज किया है, जहां चर्च और ईसाई संगठनों ने बिल का खुलकर विरोध किया है।
सरकार का रुख
सरकार ने विवाद बढ़ने पर बिल को टाल दिया है। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजीजू ने कहा कि फिलहाल इस बिल को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा। सरकार का तर्क है कि बिल का मकसद केवल पारदर्शिता सुनिश्चित करना है, न कि किसी समुदाय या संस्था को निशाना बनाना।
क्या होगा आगे?
विपक्ष ने साफ कर दिया है कि वे किसी भी हालत में इस बिल को पास नहीं होने देंगे। कांग्रेस ने गुरुवार को संसद के बाहर बड़ा प्रदर्शन करने की योजना बनाई है।
यह विवाद केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच नया टकराव बन गया है। विशेष रूप से केरल जैसे राज्यों में जहां विदेशी फंडिंग पर निर्भर ईसाई संस्थाएं सक्रिय हैं, वहां इसका असर चुनावी राजनीति पर भी पड़ सकता है।







