इंदौर, 31 मार्च 2026: जब सस्टेनेबिलिटी की बात हर जगह हो रही है, लेकिन व्यावहारिक उदाहरण कम ही दिखते हैं, तब इंदौर के निकट सनावदिया गांव में स्थित जिम्मी मगिलिगन सेंटर फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट एक जीवंत उदाहरण बनकर उभरा है।
दिल्ली स्थित टेरी स्कूल ऑफ एडवांस्ड स्टडीज (TERI School of Advanced Studies) के एम.टेक (रिन्यूएबल एनर्जी इंजीनियरिंग एंड मैनेजमेंट) प्रोग्राम के छात्रों ने हाल ही में इस सेंटर का दौरा किया। पद्मश्री सम्मानित डॉ. जनक पलटा मगिलिगन के नेतृत्व वाला यह सेंटर सस्टेनेबल जीवनशैली को सरल, व्यावहारिक और प्रभावी बनाने का अनोखा मॉडल प्रस्तुत करता है।
डॉ. जनक पलटा मगिलिगन, जो एक समर्पित समाजसेविका और शिक्षिका हैं, ने पिछले चार दशकों से अधिक समय ग्रामीण और आदिवासी समुदायों—खासकर महिलाओं—को सशक्त बनाने में लगाया है। वे बरली डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट फॉर रूरल वीमेन की संस्थापिका भी रह चुकी हैं, जहां पूरे भारत से आई हजारों महिलाओं को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाया गया।
यह सेंटर डॉ. मगिलिगन का अपना घर “गिरिदर्शन” ही है, जिसे अब पूर्णतः सस्टेनेबल जीवनशैली का प्रदर्शन केंद्र बना दिया गया है। यहां हर चीज पर्यावरण अनुकूल है—सौर ऊर्जा से चलने वाली रसोई (पैराबोलिक सोलर कुकर और 2.7 मीटर व्यास वाली शेफ्लर डिश), 2 किलोवाट की हाइब्रिड रिन्यूएबल एनर्जी प्रणाली, जल प्रबंधन, जैविक खेती, जीरो वेस्ट प्रक्रियाएं और प्राकृतिक संसाधनों (रीठा, गिलोय आदि) का उपयोग। सेंटर में अब तक 1,86,350 से अधिक लोगों को प्रशिक्षित किया जा चुका है।
छात्रों को ‘हैंड्स-ऑन लर्निंग’ का अनुभव मिला। उन्होंने देखा कि सौर ऊर्जा से रोजाना खाना पकाना कितना आसान और प्रभावी है। क्लासरूम में पढ़े सिद्धांत यहां वास्तविकता बनकर सामने आए। छात्रों ने महसूस किया कि सस्टेनेबल डेवलपमेंट कोई महंगा या कठिन काम नहीं, बल्कि दैनिक जीवन के छोटे-छोटे सचेत चुनावों से संभव है।
सेंटर महिलाओं को विशेष रूप से सशक्त बनाने पर जोर देता है। सोलर कुकिंग अपनाने से महिलाओं की LPG पर निर्भरता कम होती है, घरेलू वायु प्रदूषण घटता है और वे स्वच्छ ऊर्जा आधारित छोटे उद्यमों से अतिरिक्त आय भी कमा सकती हैं।
डॉ. जनक पलटा मगिलिगन का प्रसिद्ध कथन इस सेंटर की पूरी भावना को दर्शाता है—
“हम कैसे मरेंगे, यह हमारे हाथ में नहीं है, लेकिन हम कैसे जीएंगे, यह हमारे हाथ में है।”
इस दौरे पर रिपोर्ट तैयार करने वाली छात्रा प्रेषिता दिग्हे (एम.टेक रिन्यूएबल एनर्जी, टेरी स्कूल ऑफ एडवांस्ड स्टडीज) ने कहा कि यह दौरा मात्र शैक्षणिक नहीं, बल्कि जीवन बदलने वाला अनुभव रहा। छात्रों ने समझा कि सच्ची स्थिरता (सस्टेनेबिलिटी) केवल किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीने का एक व्यावहारिक तरीका है।
यह सेंटर इस बात का भी प्रमाण है कि ग्रामीण क्षेत्र, भले ही मुख्य बिजली ग्रिड से दूर हों, विकेंद्रित स्वच्छ ऊर्जा समाधानों से आत्मनिर्भर बन सकते हैं—जो भारत के ‘नेट जीरो’ लक्ष्य को हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।







