बिहार में गैस संकट के बीच एक चौंकाने वाला और सनसनीखेज खुलासा हुआ है। दैनिक भास्कर की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन ‘ऑपरेशन कोयला पार्ट-2’ में सामने आया है कि श्मशान घाटों से निकाले गए चिता के कोयले (जिसमें इंसानी हड्डियां जलकर कोयला बन जाती हैं) का इस्तेमाल अगरबत्ती बनाने में हो रहा है। यह काला कारोबार अकेले बिहार में 800 से 1500 करोड़ रुपये (कई रिपोर्ट्स में 1000 करोड़ बताया गया) का है, और तैयार अगरबत्तियां 5 राज्यों (बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और ओडिशा सहित) में सप्लाई हो रही हैं। एजेंट्स का दावा है कि मजबूत सेंट मिलाने से हड्डियों की बदबू बिल्कुल गायब हो जाती है, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसे गंभीर खतरा बता रहे हैं।
कैसे चल रहा है यह धंधा?
भास्कर की टीम ने अंडरकवर रिपोर्टिंग की। पटना, गया और अन्य जिलों के कई श्मशान घाटों (जैसे पटना के 5 प्रमुख घाटों) से रोजाना 400 किलो से ज्यादा कोयला निकाला जा रहा है। चिता की आग बुझाकर या पूरी तरह जलने से पहले कोयला निकाल लिया जाता है। यह कोयला 6-9 रुपये प्रति किलो के सस्ते दाम में एजेंट्स को बेचा जाता है। फिर यह कोयला पाउडर बनाकर अगरबत्ती फैक्ट्रियों में भेजा जाता है।
- फैक्ट्रियां: लक्ष्मीपुर (गया के पास) जैसी कई बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां इस कोयले का इस्तेमाल कर रही हैं। फैक्ट्री मालिक तेजामुल जैसे लोगों से बातचीत में खुलासा हुआ कि यह कोयला सस्ता होने से मुनाफा ज्यादा है।
- सप्लाई चेन: बिहार से ट्रकों में लोड होकर अगरबत्तियां पड़ोसी राज्यों में पहुंच रही हैं। देश में अगरबत्ती का कुल कारोबार 10-12 हजार करोड़ का है, जिसमें बिहार का हिस्सा 10-15% तक है।
- एजेंट्स का दावा: एक एजेंट ने कहा, “सेंट मिला दो, हड्डियों की बदबू नहीं आएगी। लोग पूजा में जलाते हैं, उन्हें पता भी नहीं चलता।” लेकिन यह आस्था और सेहत से खिलवाड़ है।
स्वास्थ्य और धार्मिक खतरा
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि चिता का कोयला (जिसमें हड्डियों की राख, कार्बन और अन्य अवशेष होते हैं) अगरबत्ती में इस्तेमाल होने से सांस की बीमारियां, कैंसर जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। जलने पर टॉक्सिक धुआं निकलता है, जो फेफड़ों को नुकसान पहुंचाता है। धार्मिक भावनाओं पर भी सवाल उठ रहे हैं – पूजा में इस्तेमाल होने वाली अगरबत्ती अगर मौत के अवशेषों से बनी हो, तो यह श्रद्धा का अपमान है।
गैस क्राइसिस का असर
यह धंधा गैस की किल्लत से जुड़ा है। बिहार में LPG की कमी के कारण होटल-रेस्टोरेंट्स में भी चिता का कोयला इस्तेमाल हो रहा है (तंदूर, लिट्टी, भुट्टा आदि के लिए)। भास्कर ने पहले ‘ऑपरेशन कोयला’ में यह खुलासा किया था। अब अगरबत्ती में इसका इस्तेमाल आस्था के बाजार में घुस चुका है।
प्रशासन की कार्रवाई?
बिहार सरकार और फूड सेफ्टी अथॉरिटी ने अभी तक कोई बड़ा एक्शन नहीं लिया है, लेकिन भास्कर की रिपोर्ट के बाद जांच की मांग तेज हो गई है। एक्सपर्ट्स कहते हैं कि पूरा नेटवर्क एक्सपोज होना चाहिए – श्मशान से फैक्ट्री तक की सप्लाई चेन को तोड़ना जरूरी है।







