अमेरिका-ईरान युद्ध के 17वें दिन होर्मुज़ स्ट्रेट पूरी तरह से एक रणनीतिक जाल में तब्दील हो चुका है, जहां ईरान का नियंत्रण ट्रंप प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। दुनिया के लगभग 20% तेल व्यापार से जुड़ा यह संकरा जलडमरूमध्य अब लगभग बंद है, जिससे वैश्विक तेल कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी हैं और ऊर्जा संकट गहराता जा रहा है।
ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने स्पष्ट किया कि होर्मुज़ स्ट्रेट “खुला है, लेकिन केवल अमेरिका और इज़राइल के जहाजों तथा उनके सहयोगियों के टैंकरों के लिए बंद” है। ईरान ने इसे “दुश्मन देशों” के खिलाफ जवाबी कार्रवाई बताया है। इस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि ईरान की सैन्य क्षमता “पूरी तरह तबाह” हो चुकी है और “खार्ग द्वीप सहित उनके तेल निर्यात केंद्रों पर हमले” जारी रहेंगे, लेकिन स्ट्रेट पर उनका कब्जा अभी भी नहीं टूट पाया है।
ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा, “कई देश, खासकर वे जो ईरान के होर्मुज़ बंद करने से प्रभावित हैं, अमेरिका के साथ मिलकर युद्धपोत भेजेंगे।” उन्होंने चीन, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया, ब्रिटेन और अन्य सहयोगी देशों से अपील की है कि वे अपने नौसैनिक बल तैनात करें। ट्रंप ने यहां तक कहा कि NATO का भविष्य भी दांव पर है अगर सहयोगी मदद नहीं करते। हालांकि, अधिकांश देशों ने अभी तक कोई स्पष्ट प्रतिबद्धता नहीं दिखाई है।
विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन ने युद्ध शुरू करने से पहले ईरान की इस रणनीति को कम आंका था। अमेरिकी नौसेना टैंकरों को एस्कॉर्ट करने की तैयारी में है, लेकिन ईरान द्वारा माइन बिछाने और ड्रोन-मिसाइल हमलों की धमकी के कारण यह आसान नहीं होगा। रिपोर्ट्स के अनुसार, पिछले दो हफ्तों में स्ट्रेट के आसपास 16 से ज्यादा जहाजों पर हमले हो चुके हैं, जिसमें कई मौतें हुई हैं।
भारत के लिए राहत की खबर यह है कि ईरान ने भारतीय जहाजों को “फ्री पैसेज” की अनुमति दी है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर के अनुसार, ईरान के साथ सीधी बातचीत से दो भारतीय गैस टैंकर सफलतापूर्वक होर्मुज़ से गुजर पाए।
ट्रंप ने चेतावनी दी है कि अगर ईरान स्ट्रेट नहीं खोलता तो “हमले 20 गुना तेज” होंगे और “ईरान में मौत, आग और अराजकता” फैलेगी। दूसरी ओर, ईरान के नए सर्वोच्च नेता ने कहा है कि स्ट्रेट तब तक बंद रहेगा जब तक “दुश्मन” हमले बंद नहीं करते।
यह युद्ध अब सिर्फ सैन्य नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका है। तेल कीमतों में उछाल से भारत, यूरोप और एशिया में महंगाई बढ़ने की आशंका है। विशेषज्ञों का कहना है कि होर्मुज़ का संकट हल होने तक वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बनी रहेगी।






