वेस्ट एशिया में चल रहे तनाव का असर अब भारत के औद्योगिक क्षेत्रों पर भी दिखाई देने लगा है। खासतौर पर हिमाचल प्रदेश का फार्मा उद्योग कच्चे माल की कमी के कारण दबाव में आ गया है। दवा बनाने में इस्तेमाल होने वाले कई जरूरी रसायन और कच्चा माल विदेशों से आता है, लेकिन मौजूदा हालात के कारण सप्लाई प्रभावित हो रही है, जिससे उत्पादन पर असर पड़ने लगा है।
हिमाचल प्रदेश देश के प्रमुख फार्मा हब में से एक माना जाता है। यहां बद्दी, नालागढ़ और परवाणू जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में बड़ी संख्या में दवा कंपनियां काम करती हैं। इन कंपनियों में बनने वाली दवाइयों की सप्लाई देश के साथ-साथ विदेशों में भी होती है। लेकिन वेस्ट एशिया क्षेत्र में बढ़ते तनाव के कारण आयात प्रभावित हुआ है, जिससे उद्योगों को कच्चा माल समय पर नहीं मिल पा रहा।
उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि कई जरूरी केमिकल और एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट (API) विदेशों से मंगाए जाते हैं। सप्लाई में देरी होने से उत्पादन लागत बढ़ रही है। कुछ कंपनियों को मजबूरी में उत्पादन कम करना पड़ा है, जबकि कुछ ने वैकल्पिक सप्लायर खोजने शुरू कर दिए हैं, जो पहले की तुलना में महंगे पड़ रहे हैं।
कच्चे माल की कीमत बढ़ने का असर दवाइयों के दाम पर भी पड़ सकता है। उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि अगर हालात जल्द सामान्य नहीं हुए तो आने वाले समय में कई दवाइयों की कीमत बढ़ सकती है। इससे आम लोगों पर भी आर्थिक बोझ बढ़ने की आशंका है।
फार्मा उद्योग से जुड़े प्रतिनिधियों ने सरकार से इस मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की है। उनका कहना है कि जरूरी कच्चे माल के आयात के लिए वैकल्पिक व्यवस्था की जाए, ताकि उत्पादन प्रभावित न हो और दवाइयों की सप्लाई बनी रहे।
मौसम, वैश्विक तनाव और आयात पर निर्भरता के कारण उद्योग पहले ही कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे में वेस्ट एशिया संकट ने चिंता और बढ़ा दी है। अगर स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो हिमाचल प्रदेश के फार्मा उद्योग पर इसका बड़ा असर पड़ सकता है।






