अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति और वर्तमान में युद्धकालीन सलाहकार की भूमिका निभा रहे डोनाल्ड ट्रंप ने एक सनसनीखेज दावा किया है कि अमेरिकी सेना ने ईरान के खार्ग द्वीप (Kharg Island) पर मौजूद सभी सैन्य ठिकानों को पूरी तरह तबाह कर दिया है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर पोस्ट करते हुए कहा, “हमने खार्ग द्वीप के हर मिलिट्री टारगेट को ऑब्लिटरेट कर दिया है। ईरान अब हिल चुका है, लेकिन हमने उनकी ‘लाइफलाइन’ को अभी छुआ नहीं है।” यह बयान ऐसे समय में आया है जब ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध अपने चरम पर पहुंच चुका है, और खार्ग द्वीप को ईरान की अर्थव्यवस्था की ‘लाइफलाइन’ या ‘क्राउन ज्वेल’ कहा जाता है। लेकिन आखिर क्यों है यह छोटा सा द्वीप ईरान के लिए इतना महत्वपूर्ण? आइए, इसकी गहराई में उतरते हैं और पूरे घटनाक्रम को विस्तार से समझते हैं।
ट्रंप का दावा और अमेरिकी हमले की पृष्ठभूमि
ट्रंप का यह दावा ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत के ठीक बाद आया है, जब अमेरिका और इजरायल की संयुक्त सेनाओं ने ईरान पर लगातार हमले तेज कर दिए थे। ट्रंप ने पोस्ट में लिखा, “हमारी बहादुर सेना ने खार्ग द्वीप पर सारे सैन्य अड्डों को नष्ट कर दिया। मिसाइल लॉन्च पैड, रडार सिस्टम, एयर डिफेंस और IRGC के कमांड सेंटर—सब कुछ खत्म। लेकिन हमने तेल टर्मिनल को जानबूझकर बख्शा, क्योंकि हम नहीं चाहते कि दुनिया का तेल बाजार बर्बाद हो। ईरान अब समझ ले कि हमारी मर्सी पर है।”
अमेरिकी रक्षा विभाग के प्रवक्ता ने इस दावे की पुष्टि तो नहीं की, लेकिन कहा कि “हमारे ऑपरेशन ईरान की आक्रामक क्षमताओं को कमजोर करने पर केंद्रित हैं।” सैटेलाइट इमेजरी और इंडिपेंडेंट एनालिस्ट्स के मुताबिक, खार्ग द्वीप पर 13 मार्च की रात को भारी बमबारी हुई थी, जिसमें द्वीप के उत्तरी हिस्से में स्थित सैन्य सुविधाएं ध्वस्त हो गईं। ईरान की सरकारी मीडिया ने इसे “अमेरिकी आतंकवाद” करार दिया और कहा कि उनके मिसाइल सिस्टम अब भी सक्रिय हैं।
यह हमला ‘मोजेक डिफेंस डॉक्ट्रिन’ के तहत ईरान की रणनीति को चुनौती देता है, जिसके बारे में हम पहले भी चर्चा कर चुके हैं। लेकिन ट्रंप ने स्पष्ट किया कि तेल इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना नहीं बनाया गया, जो वैश्विक तेल बाजार को अस्थिर कर सकता था। ब्रेंट क्रूड की कीमतें पहले ही 150 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच चुकी हैं, और अगर खार्ग पर तेल टर्मिनल प्रभावित होता, तो यह आंकड़ा 200 डॉलर तक जा सकता था।
खार्ग द्वीप: ईरान की ‘इकोनॉमिक लाइफलाइन’ क्यों?
खार्ग द्वीप फारस की खाड़ी में स्थित एक छोटा सा द्वीप है—मात्र 20 किलोमीटर लंबा और 8 किलोमीटर चौड़ा। लेकिन आकार में छोटा होने के बावजूद, यह ईरान की अर्थव्यवस्था का दिल है। यहां से ईरान का लगभग 90% क्रूड ऑयल एक्सपोर्ट होता है। इसे ‘लाइफलाइन’ कहने के पीछे कई कारण हैं:
- तेल एक्सपोर्ट का मुख्य केंद्र: खार्ग टर्मिनल दुनिया के सबसे बड़े क्रूड ऑयल एक्सपोर्ट टर्मिनलों में से एक है। यहां रोजाना 2-5 मिलियन बैरल तेल लोड होता है, जो ईरान की कुल तेल उत्पादन क्षमता का बड़ा हिस्सा है। ईरान का सालाना राजस्व का 60-70% तेल निर्यात से आता है, और खार्ग इसके लिए जिम्मेदार है। अगर यह द्वीप प्रभावित होता, तो ईरान की GDP में 20-30% की गिरावट आ सकती थी।
- रणनीतिक लोकेशन: फारस की खाड़ी में स्थित होने से यह होर्मुज जलडमरूमध्य के करीब है, जहां से दुनिया का 20% तेल गुजरता है। ईरान ने यहां पर सैन्य ठिकाने इसलिए बनाए थे ताकि युद्ध की स्थिति में वे जलडमरूमध्य को ब्लॉक कर सकें। लेकिन ट्रंप के दावे के मुताबिक, अब वे ठिकाने खत्म हो चुके हैं।
- ऐतिहासिक महत्व: 1970 के दशक में शाह मोहम्मद रेजा पहलवी के समय से खार्ग को विकसित किया गया। ईरान-इराक युद्ध (1980-88) में इराक ने कई बार इस पर हमले किए, लेकिन ईरान ने इसे बचाया। तब से इसे ‘क्राउन ज्वेल’ कहा जाता है। अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद, खार्ग से तेल निर्यात जारी रहा, मुख्यतः चीन, भारत और यूरोप को।
- सैन्य और आर्थिक मिश्रण: द्वीप पर तेल टर्मिनल के अलावा IRGC (इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स) के सैन्य बेस हैं, जहां मिसाइलें, ड्रोन और एंटी-शिप वेपन्स स्टोर किए जाते हैं। ट्रंप ने इन्हीं को निशाना बनाया, लेकिन तेल सुविधाओं को छोड़ दिया—शायद वैश्विक अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि खार्ग ईरान की ‘लाइफलाइन’ इसलिए है क्योंकि बिना इसके ईरान की सरकार को वित्तीय संकट का सामना करना पड़ सकता है। हार्वर्ड के इकोनॉमिस्ट प्रोफेसर जेम्स रिचर्डसन कहते हैं, “खार्ग ईरान का ऑयल हब है। इसे नष्ट करना मतलब ईरान की अर्थव्यवस्था को घुटनों पर लाना। लेकिन अमेरिका ने स्मार्ट तरीके से सिर्फ मिलिट्री पार्ट को हिट किया, ताकि युद्ध लंबा चले बिना ईरान दबाव में आए।”
युद्ध पर असर और वैश्विक प्रतिक्रियाएं
ट्रंप के दावे के बाद ईरान ने जवाबी हमले तेज कर दिए। तेहरान से जारी बयान में कहा गया, “अमेरिका की यह आक्रामकता हमें और मजबूत बनाएगी। खार्ग अब भी हमारा है, और हम होर्मुज को बंद करने को तैयार हैं।” लेकिन सैटेलाइट इमेज से साफ है कि द्वीप पर धुआं उठ रहा है, और कई सैन्य सुविधाएं जल चुकी हैं।
वैश्विक स्तर पर प्रतिक्रियाएं मिश्रित हैं:
- चीन: ईरान का सबसे बड़ा तेल आयातक। विदेश मंत्रालय ने कहा, “खार्ग पर हमला वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए खतरा है। हम अमेरिका की एकतरफा कार्रवाई की निंदा करते हैं।”
- भारत: भारत ईरान से तेल आयात करता है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा, “हम युद्ध को बढ़ावा नहीं देना चाहते। खार्ग की सुरक्षा वैश्विक तेल बाजार के लिए जरूरी है।”
- यूरोपीय यूनियन: EU ने अमेरिका से संयम बरतने की अपील की, क्योंकि तेल कीमतों में उछाल से यूरोप की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है।
- रूस: पुतिन ने ट्रंप के दावे को “प्रोपगैंडा” बताया और ईरान को समर्थन देने का वादा किया।
क्या होगा आगे?
ट्रंप ने चेतावनी दी कि अगर ईरान नहीं रुका, तो “लाइफलाइन” पर भी हमला हो सकता है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा करना अमेरिका के लिए भी जोखिम भरा होगा, क्योंकि इससे तेल कीमतें आसमान छू सकती हैं और वैश्विक मंदी आ सकती है। ईरान की ‘मोजेक डॉक्ट्रिन’ के तहत क्षेत्रीय कमांडर अब भी सक्रिय हैं, और वे प्रॉक्सी ग्रुप्स (हिजबुल्लाह, हूती) के जरिए हमले जारी रख सकते हैं।
यह घटना 1980 के दशक के ‘टैंकर वॉर’ की याद दिलाती है, जब इराक-ईरान युद्ध में खार्ग पर हमले हुए थे। लेकिन आज की दुनिया में, जहां ऊर्जा संकट पहले से मौजूद है, खार्ग का महत्व और बढ़ गया है। ट्रंप का दावा ईरान को झटका जरूर है, लेकिन क्या यह युद्ध का निर्णायक मोड़ साबित होगा? समय बताएगा।






