वियतनाम युद्ध की उस प्रसिद्ध तस्वीर “नेपाम गर्ल” (फान थी किम फुक) की चीख, जो 1972 में दुनिया को झकझोर गई थी, आज भी गूंज रही है। लेकिन आज के युद्धों में – चाहे ग़ज़ा हो या ईरान – मासूम बच्चों की चीखें दबाई जा रही हैं, और दुनिया चुप्पी साधे बैठी है। वरिष्ठ पाकिस्तानी पत्रकार और उपन्यासकार मोहम्मद हनीफ़ ने बीबीसी हिंदी पर प्रकाशित अपने ताजा ब्लॉग में इस दर्द को बयां किया है। ब्लॉग का शीर्षक है: “वियतनाम की वो ‘नेपाम गर्ल’, ग़ज़ा के बच्चे और ईरान की स्कूली छात्राएं…”। हनीफ़ लिखते हैं कि “चाहे वियतनाम हो, ग़ज़ा हो या ईरान हो – मासूम बच्चों के बारे में सोच में कोई अंतर नहीं दिखाई देता।” वे दुनिया की दोहरी नजर और शर्मनाक चुप्पी पर सवाल उठाते हैं।
नेपाम गर्ल की याद और आज की त्रासदी
1972 में वियतनाम के ट्रांग बांग गांव पर अमेरिकी नेपाम बमबारी के दौरान 9 साल की किम फुक की जलती तस्वीर ने पूरी दुनिया को हिला दिया था। वह तस्वीर युद्ध विरोधी आंदोलन की प्रतीक बनी और नेपाम के इस्तेमाल पर वैश्विक बहस छिड़ गई। हनीफ़ अपने ब्लॉग में इसी तस्वीर से शुरुआत करते हैं और पूछते हैं – क्या आज ग़ज़ा में मारे जा रहे बच्चे और ईरान में स्कूल पर हमले में मारी गई स्कूली छात्राएं कम महत्वपूर्ण हैं?
ईरान-अमेरिका-इजरायल जंग के बीच हाल ही में दक्षिणी ईरान के होर्मोज़गन प्रांत (मिनाब काउंटी) में लड़कियों के एक प्राइमरी स्कूल पर हमला हुआ। ईरानी अधिकारियों के मुताबिक, इस हमले में 160 से ज्यादा लोग मारे गए, जिनमें दर्जनों स्कूली बच्चियां और स्टाफ शामिल थे। हमला आईआरजीसी (इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स) के एक अड्डे के करीब हुआ, और ईरान ने इसे अमेरिका-इजरायल का हमला बताया। पूर्व सीआईए डायरेक्टर ने भी कहा कि अमेरिका जिम्मेदार हो सकता है, जबकि अमेरिका ने जांच की बात कही।
ग़ज़ा के बच्चों का दर्द
हनीफ़ ग़ज़ा का जिक्र करते हुए कहते हैं कि वहां भी हजारों बच्चे युद्ध की भेंट चढ़ चुके हैं। ग़ज़ा में इजरायली हमलों में मासूमों की मौत की तस्वीरें रोजाना सामने आती हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया कमजोर रहती है। हनीफ़ लिखते हैं कि नेपाम गर्ल की तस्वीर ने वियतनाम युद्ध को प्रभावित किया था, लेकिन आज ग़ज़ा और ईरान के बच्चों की तस्वीरें देखकर दुनिया क्यों चुप है? यह दोहरा मापदंड क्यों?
दुनिया की चुप्पी पर सवाल
ब्लॉग में हनीफ़ गहरा दर्द व्यक्त करते हैं। वे कहते हैं कि युद्ध में बच्चे हमेशा सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं – चाहे वह नेपाम हो, मिसाइल हो या ड्रोन हमला। लेकिन जब बात ग़ज़ा या ईरान की आती है, तो पश्चिमी मीडिया और सरकारें चुप रहती हैं या बहाने बनाती हैं। हनीफ़ लिखते हैं, “नेपाम गर्ल की चीख ने दुनिया को जगाया था, लेकिन आज की चीखें क्यों अनसुनी हैं?” वे दुनिया से अपील करते हैं कि मासूमों की मौत पर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए।
ब्लॉग का असर और प्रतिक्रियाएं
यह ब्लॉग 12 मार्च 2026 को प्रकाशित होने के कुछ घंटों में ही सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। बीबीसी हिंदी के ट्विटर और फेसबुक पर हजारों शेयर और कमेंट्स आए। कई लोगों ने इसे “दिल छू लेने वाला” बताया, जबकि कुछ ने हनीफ़ की बहादुरी की तारीफ की। पाकिस्तानी और भारतीय पाठकों ने कहा कि यह ब्लॉग युद्ध की क्रूरता को बेनकाब करता है।
मोहम्मद हनीफ़, जो “ए केस ऑफ एक्सप्लोडिंग मैंगोज” जैसे उपन्यासों के लिए प्रसिद्ध हैं, अक्सर राजनीति, युद्ध और मानवाधिकार पर लिखते हैं। उनका यह ब्लॉग वर्तमान मिडिल ईस्ट संकट में बच्चों की स्थिति पर एक शक्तिशाली टिप्पणी है।
नेपाम गर्ल की चीख आज भी गूंजती है – क्या दुनिया अब ग़ज़ा और ईरान के बच्चों की चीख सुनेगी? या फिर चुप्पी ही जारी रहेगी? हनीफ़ का ब्लॉग हमें सोचने पर मजबूर करता है।






