दुनिया में युद्ध और तनाव की बारूद भरी आग के बीच चीन ने एक बार फिर भारत के साथ दोस्ती का राग अलापा है। चीनी राजदूत और विदेश मंत्रालय के बयानों में साफ संकेत मिल रहा है कि एशिया की दो बड़ी शक्तियां (सुपरपावर) साथ खड़ी हैं, और यह मैसेज सीधे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को दिया जा रहा है।
हाल ही में ट्रंप प्रशासन द्वारा भारत पर लगाए गए भारी टैरिफ (50% तक) और चीन पर लगातार बढ़ते व्यापारिक प्रतिबंधों के बीच बीजिंग ने भारत को “मजबूती से साथ खड़ा होने” का भरोसा दिया है। चीन के भारत में राजदूत शू फीहोंग ने कहा, “चीन भारत के साथ मजबूती से खड़ा है। हम अमेरिका की एकतरफा टैरिफ नीति का विरोध करते हैं। चुप रहना सिर्फ गुंडे को और हिम्मत देता है।” उन्होंने भारत और चीन को “एशिया के आर्थिक चमत्कार के दो इंजन” बताया और कहा कि दोनों देशों का सहयोग एशिया की स्थिरता के लिए जरूरी है।
यह बयान ऐसे समय आया है जब ट्रंप की “अमेरिका फर्स्ट” नीति से वैश्विक व्यापार हिल गया है। ट्रंप ने पहले भारत और रूस को “गहरे और अंधकारमय चीन” के हाथों खोने की बात कही थी, जिससे वाशिंगटन में खलबली मच गई। लेकिन चीन अब इसे उल्टा कर रहा है। बीजिंग का मैसेज साफ है—भारत और चीन, एशिया की दो सुपरपावर, साथ मिलकर अमेरिकी दबाव का मुकाबला कर सकती हैं।
पिछले कुछ महीनों में भारत-चीन रिश्तों में भी नरमी आई है। सीमा पर डिसइंगेजमेंट, सीधी उड़ानों की बहाली और व्यापार में बढ़ोतरी जैसे कदम उठे हैं। Xi Jinping ने हाल ही में भारत को “अच्छे पड़ोसी, दोस्त और पार्टनर” कहा है। यह सब ट्रंप के टैरिफ वॉर से उपजे भू-राजनीतिक बदलाव का नतीजा लगता है, जहां पुराने दुश्मन भी एक-दूसरे के करीब आ रहे हैं।
ट्रंप को यह “सीक्रेट मैसेज” जा रहा है कि एशिया में फूट डालने की कोशिशें अब कामयाब नहीं होंगी। भारत के लिए यह मौका है कि वह अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए दोनों महाशक्तियों (अमेरिका और चीन) के साथ संतुलन बनाए रखे। लेकिन सवाल यह है—क्या यह दोस्ती सिर्फ टैरिफ के दबाव में है, या वाकई लंबे समय तक टिकेगी? वक्त ही बताएगा।






