आवाज़ इतनी बुलंद थी कि 1987 में लंदन की क्वीन एलिजाबेथ हॉल के माइक्रोफ़ोन हटाने पड़े थे।
आत्मीय स्मरण – पद्मश्री और राजस्थान रत्न से सम्मानित महान मांड गायिका अल्लाह जिलाई बाई की 34वीं पुण्यतिथि -3 नवंबर पर उनकी परपोती की कलम से……….
जयपुर। यू तो राजस्थान कला-संस्कृती, वीरों की भूमि व सोने री धरती के नाम से जाना जाता है लेकिन इस मरूधरा ने कुछ नायाब हीरे ऐसे घड़े है जिन्होंने देश- दुनियां के कोने-कोने में अपनी आव़ाज से न केवल मरूधरा बल्कि समुचे देश को गौरवान्वित किया है। ऐसी ही शख्सियत है वीरों की धरती राजस्थान के बीकानेर जिलें में जन्मी ‘अल्लाह जिला बाई’ जिनकी मांड गायिकी ने करोड़ों दिलों पर राज किया है। जिनके गाने ”केसरियां बालम आओं नी पधारों म्हारे देश”…… सुनने पर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते है। बीकानेर राजघराने में महाराजा गंगासिंह के दरबार से अपनी गायिकी की शुरूआत करने वाली अल्लाह जिलाई बाई की 34वीं पुण्यतिथि पर पढ़िए उनकी कहानी उनकी पड़पोती की ज़ुबानी………
कुछ आवाज़ें मनोरंजन करती हैं, कुछ दिल को छू जाती हैं और कुछ ऐसी होती हैं जो किसी पूरी सरज़मीं की पहचान बन जाती हैं। मेरी परदादी, पद्मश्री अल्लाह जिलाई बाई की आवाज़ ऐसी ही थी। मगर मेरे लिए वे सिर्फ़ राजस्थान की मशहूर मांड गायिका नहीं थीं, जिनके सुरों का जादू देश-विदेश के लोगों पर छाया रहता था। वे मेरी जाई माँ थीं। वह शख़्सियत, जिसने मुझे हिम्मत, आत्मनिर्भरता, इंसानियत, ईमान और बेख़ौफ़ होकर जीने का सलीका सिखाया।
मुझे आज भी थार के रेगिस्तान की एक सर्द शाम याद है। आसमान तारों से जगमगा रहा था, चाँद अपनी पूरी रौनक़ में था और रेत के विशाल धोरों के बीच उनकी आवाज़ कुछ इस तरह गूँज रही थी, मानो पूरा रेगिस्तान उनके सुरों के साथ साँस ले रहा हो। गीत ख़त्म होते ही तालियों की गड़गड़ाहट से माहौल गूँज उठा। सामने सफ़ेद सूती साड़ी, गहरे रंग की किनारी और करीने से बंधे सफ़ेद बालों में एक छोटी-सी क़द-काठी की महिला खड़ी थीं। वह थीं अल्लाह जिलाई बाई। स्थानीय लोग हों, विदेशी सैलानी हों या उनके साथ संगत करने वाले कलाकार, हर कोई उनकी शख़्सियत और आवाज़ का मुरीद था। यह तस्वीर आज भी मेरे ज़ेहन में वैसी ही महफ़ूज़ है।
वह आवाज़ जिसे माइक की ज़रूरत नहीं थी
अल्लाह जिलाई बाई का जन्म नबी बख़्श और अलीमीन के घर हुआ। वे उनकी चौथी संतान थीं, मगर जीवित बचने वाली इकलौती संतान। माता-पिता ने उनका नाम अल्लाह जिलाई रखा, यानी जिसे अल्लाह ने ज़िंदगी बख़्शी हो। उन्हें क्या मालूम था कि यह बच्ची एक दिन राजस्थान की सबसे अज़ीज़ और मशहूर आवाज़ों में शुमार होगी। उनकी गायकी में एक अलौकिक कशिश थी। मुझे हमेशा हैरानी होती थी कि दूसरे गायकों की तरह वे रोज़ाना रियाज़ नहीं करती थीं, फिर भी उनकी आवाज़ में ऐसी गहराई, ऐसी बुलंदी और ऐसा असर था कि सुनने वाला मंत्रमुग्ध हो जाता था।
July 1987 ,लंदन के Queen Elizabeth Hall, Purcell Room मे उनके कार्यक्रम के क़िस्से आज भी सुनने को मिलते हैं। बताया जाता है कि उनकी आवाज़ इतनी बुलंद और दमदार थी कि तकनीकी टीम को उनके सामने रखे माइक्रोफ़ोन हटाने पड़े। उनकी आवाज़ पूरे सभागार में बिना किसी मदद के गूँज रही थी। वहाँ मौजूद अलग-अलग देशों के लोग उनकी गायकी से इतने प्रभावित हुए कि कई की आँखें नम हो गईं।भाषा कभी उनके और उनके श्रोताओं के बीच दीवार नहीं बनी। लोग राजस्थानी समझें या न समझें, उनके सुर सीधे दिल तक पहुँचते थे। भारत सरकार ने उन्हें 1982 में पद्मश्री से सम्मानित किया। वर्ष 1988 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला और 2012 में राजस्थान सरकार ने अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान राजस्थान रत्न से नवाज़ा। ये सम्मान उस महान गायिका की उपलब्धियों का प्रमाण हैं, लेकिन उन्हें क़रीब से जानने वालों के लिए वे इससे कहीं बढ़कर थीं।
मेरी जाई माँ, मेरे बचपन की हमसफ़र
मेरे पिता डॉ. अज़ीज़ अहमद सुलेमानी उनके सबसे चहेते नवासे थे और मैं उनकी पहली परपोती। मेरा बचपन उनके प्यार और दुलार के साये में गुज़रा। मुझे याद है, जैसलमेर के मरु महोत्सव में जब वे गाती थीं, तो मैं उनकी गोद में सो जाया करती थी। बीकानेर में दूरदर्शन के उद्घाटन समारोह में भी मैं उनके साथ थी। वे मुझे स्कूल बस के स्टॉप तक छोड़ने जातीं और बस के कंडक्टर को ख़ास हिदायत देतीं कि बच्ची का ख़याल रखना।जब मैं दसवीं की बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रही थी, तब सर्दियों की सुबह पाँच बजे मुझे गणित की ट्यूशन के लिए जगाना भी उन्हीं का काम था। मेरे पुरुष शिक्षक पढ़ाते और वे पास बैठकर निगरानी करतीं। मेरी पढ़ाई, मेरे नतीजे और मेरी कामयाबी की फ़िक्र उन्हें हमेशा रहती थी। जयपुर आकाशवाणी में उनकी रिकॉर्डिंग होती तो हम अक्सर ट्रेन से सफ़र करते। उन यात्राओं की यादें आज भी मेरे दिल के बेहद क़रीब हैं। बिस्तर, पानी के लिए सुराही और सफ़र का सामान साथ लेकर चलना एक अलग ही अनुभव था। वे अपनी बिछावन ट्रेन की सीटों के बीच फ़र्श पर लगा लेतीं, ताकि मैं पूरी बर्थ पर आराम से सो सकूँ। वापसी में सुडसर स्टेशन पर पकौड़े और रबड़ी ख़रीदना जैसे हमारी यात्रा का एक ज़रूरी हिस्सा था।आज सोचती हूँ तो दिल में एक कसक उठती है कि काश, मैं कुछ साल पहले पैदा हुई होती और उनके साथ दुनिया के और भी शहरों का सफ़र कर पाती।
नारीवाद का पहला सबक़ मुझे अपनी जाई माँ से मिला
आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो महसूस होता है कि नारीवाद और महिला सशक्तीकरण के मेरे शुरुआती सबक़ मुझे किसी किताब या कक्षा से नहीं, बल्कि अपनी जाई माँ के जीवन से मिले थे।वे अक्सर बड़े फ़ख़्र से कहती थीं, “मैं अपनी कमाई खाती हूँ। किसी पर निर्भर नहीं हूँ। मेरी ज़िंदगी के फ़ैसले कोई दूसरा क्यों करे?”उनका मानना था कि औरत का आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना बेहद ज़रूरी है। वे समझती थीं कि निर्भरता सिर्फ़ पैसों की नहीं होती, बल्कि अपने छोटे-बड़े फ़ैसलों, ज़रूरतों और इच्छाओं के लिए दूसरों का मोहताज होना भी एक तरह की बेबसी है। मेरे जन्म का एक क़िस्सा आज भी हमारे परिवार में बड़े गर्व से सुनाया जाता है। सत्तर के दशक की शुरुआत में जब मेरा जन्म हुआ, तो परिवार में बेटे की उम्मीद की जा रही थी। लेकिन दाई ने जब बताया कि लड़की हुई है, तो जाई माँ ने नारियल, मिठाइयाँ और चाँदी का सिक्का बाँटकर ख़ुशी मनाई। उन्होंने मेरे जन्म को उसी तरह जश्न में बदला, जैसे उस दौर में बेटे के जन्म पर मनाया जाता था। मैंने उन्हें अपनी माँ के साथ भी मज़बूती से खड़े देखा। जब घर में कोई मेरी माँ पर नाराज़ होता, तो वे उनका भावनात्मक सहारा बनतीं और बीच-बचाव करतीं।
वे बेहद बेख़ौफ़ थीं। किसी को ग़लत करते देखतीं तो टोकने से पीछे नहीं हटती थीं। बड़े-बड़े सरकारी अफ़सर भी उनकी साफ़गोई से अछूते नहीं थे। मैं कभी पूछती कि माँ, अगर कोई आप पर चिल्ला दे तो? वे पूरे आत्मविश्वास से कहतीं, “क्यों चिल्लाएगा? मेरी मजाल है कि कोई ऐसा कर सके! मैं अल्लाह जिलाई हूँ, कोई आम औरत नहीं।”उनका जीवन-दर्शन बहुत सीधा था—सच्चाई से जीओ, ग़लत काम मत करो और किसी से डरो मत। वे कहती थीं, “अल्लाह के सिवा किसी से डरने की ज़रूरत नहीं। डरना है तो सिर्फ़ ग़लत काम करने से डरो।”उनका दिया हुआ एक सबक़ आज भी मेरे साथ है—निर्भय रहो, मान रखो और सिर ऊँचा करके जियो।
अपनी मिट्टी से मोहब्बत और अपने रब पर यक़ीन
जाई माँ बेहद मज़हबी थीं। पाँचों वक़्त की नमाज़ अदा करतीं, रमज़ान के रोज़े रखतीं और अस्र से मग़रिब के बीच ख़ामोशी इख़्तियार करतीं। उनका अपने रब से गहरा रिश्ता था। वे मानती थीं कि सच्चे दिल से माँगी गई दुआ और नेक नीयत में बड़ी ताक़त होती है। लेकिन उनका अपनी मिट्टी से रिश्ता भी उतना ही गहरा था। बँटवारे के समय जब उनके कई रिश्तेदार सरहद पार चले गए, तब उन्होंने बीकानेर छोड़ने से इनकार कर दिया। वे उसी ज़मीन पर रहना चाहती थीं जहाँ उनके पुरखों की क़ब्रें थीं, जहाँ उनकी यादें और उनकी पहचान बसी थीं।
वे कहा करती थीं, “अपना घर छोड़कर कहाँ जाते बेटा? अपनी मिट्टी, अपना वजूद, सब यहीं है।”
महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी से वे बेहद प्रभावित थीं। मुझे याद है, जब इंदिरा गांधी की हत्या की ख़बर आई, तो वे टेलीविज़न के सामने फूट-फूटकर रोई थीं। कई दिनों तक सदमे से खाना तक नहीं खा पाईं। उनकी देशभक्ति किसी बड़े भाषण में नहीं, बल्कि अपने मुल्क और उसकी मिट्टी से गहरे जुड़ाव में दिखाई देती थी।वे एक जिज्ञासु और जागरूक महिला भी थीं। दोपहर में हिंदी अख़बार कोशब्द-दर-शब्द पढ़ना उनका रोज़ का मामूल था। रेडियो पर सिंधी समाचार, धीमी गति के समाचार और यहाँ तक कि अंग्रेज़ी में क्रिकेट की कमेंट्री सुनना भी उन्हें पसंद था। उम्र के साथ उनकी जानने-समझने की ललक कभी कम नहीं हुई।
एक ऐसी परदादी, जिन्होंने अगली पीढ़ी के सपनों को पंख दिए
उनके व्यक्तित्व का एक और पहलू मेरे पिता से जुड़ी एक घटना में दिखाई देता है।मेरे पिता का बचपन आर्थिक तंगी में गुज़रा। घर में कभी-कभी अनाज तक की कमी हो जाती थी। सीमित संसाधनों के बावजूद जाई माँ ने उनकी पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने दी। वे चाहती थीं कि उनका नवासा पढ़-लिखकर ऐसा डॉक्टर बने जो लोगों का इलाज कर सके। 1959 में जब मेरे पिता ने मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने के बाद मेडिकल कॉलेज में अध्यापन का काम करने का फ़ैसला किया, तो जाई माँ ख़ुश नहीं हुईं। उनका मानना था कि उन्होंने उन्हें डॉक्टर बनाने के लिए पढ़ाया है, ताकि वे मरीज़ों का इलाज कर सकें, न कि केवल कक्षा में पढ़ाएँ। उन्होंने तुरंत ताँगा बुलवाया, पिता को साथ बिठाया और मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल के.डी. गुप्ता के कमरे में जा पहुँचीं। हाथ जोड़कर, मगर पूरे आत्मविश्वास के साथ उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने नवासे को मेडिकल कॉलेज में इसलिए दाख़िल करवाया था कि वह लोगों का इलाज करने वाला डॉक्टर बने। वे नहीं चाहती थीं कि वह केवल पढ़ाने तक सीमित रह जाए। उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति और मेरे पिता की मेहनत रंग लाई। पिता ने एमडी की डिग्री हासिल की, गोल्ड मेडल प्राप्त किया और आगे चलकर प्रोफ़ेसर ऑफ़ मेडिसिन के पद से सेवानिवृत्त हुए। वे एक जाने-माने चिकित्सक भी बने। जाई माँ ने शायद ख़ुद औपचारिक शिक्षा के अधिक अवसर नहीं पाए, लेकिन वे शिक्षा की ताक़त को बख़ूबी समझती थीं। वे जानती थीं कि अगली पीढ़ी के सपनों को पूरा करने के लिए हौसला और मौक़ा देना कितना ज़रूरी है।
कुछ छोटी-छोटी बातें, जो उन्हें और अपना बनाती थीं
जाई माँ को घर का खाना खाते-खाते कभी-कभी ऊब हो जाती थी। फिर वे किसी न किसी बहाने मेरी दादी माँ से नोकझोंक कर लेतीं और घर का खाना खाने से इनकार कर देतीं। इसके बाद बीकानेर रेलवे स्टेशन के पास मशहूर छोटू-मोटू जोशी की दुकान से पूरी-आलू और मेथी की सब्ज़ी मँगवाई जाती। उन्हें कोका-कोला भी बेहद पसंद थी।उनकी संगत करने वाले कलाकार भी उनकी संगीत यात्रा का अहम हिस्सा थे। उस्ताद हनीफ़ ख़ान, दयाम अली क़ादरी, सितार पर मुंशी जी, हारमोनियम पर नज़र मोहम्मद और सारंगी पर उस्ताद फ़ख़रुद्दीन जैसे कलाकारों की यादें आज भी परिवार में बड़े सम्मान से साझा की जाती हैं।
आवाज़ ख़ामोश हुई, मगर सबक़ आज भी ज़िंदा हैं
3 नवम्बर 1992 को दुनिया ने उनकी उस जादुई आवाज़ को आख़िरी बार सुना। आज उनकी 34वीं पुण्यतिथि पर मैं उस महान गायिका को याद कर रही हूँ, जिसकी मांड गायकी राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा बन गई।मैं सिर्फ़ उस गायिका को याद नहीं कर रही, जिसने दुनिया भर में अपनी आवाज़ से लोगों का दिल जीता। मैं उस औरत को याद कर रही हूँ, जिसने अपने परिवार की पीढ़ियों को हिम्मत, आत्मसम्मान और इंसानियत की विरासत सौंपी। मैं आज एक विकास क्षेत्र की पेशेवर हूँ और लड़कियों की शिक्षा, महिलाओं के नेतृत्व और लैंगिक समानता के मुद्दों पर काम करती हूँ। जब अपने काम और जीवन को पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो महसूस होता है कि जिन मूल्यों की बात मैं आज पेशेवर तौर पर करती हूँ, उनकी पहली झलक मुझे अपनी जाई माँ के जीवन में ही मिली थी।
उन्होंने नारीवाद, लैंगिक समानता या सशक्तीकरण जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया। उन्होंने इन मूल्यों को जिया।पद्मश्री और राजस्थान रत्न के सम्मान एक महान कलाकार की उपलब्धियों को दर्शाते हैं, लेकिन मेरे लिए उनकी सबसे बड़ी पहचान वह महिला है, जिसने बेटी के जन्म पर जश्न मनाया, अपनी कमाई पर फ़ख़्र किया, ग़लत के सामने आवाज़ उठाई और मुझे सिर उठाकर जीना सिखाया। उनकी आवाज़ भले ही ख़ामोश हो गई हो, मगर उनके दिए हुए सबक़ आज भी मेरे भीतर गूँजते हैं।

शबनम अज़ीज़
(विकास क्षेत्र की एक अनुभवी पेशेवर हैं, वे वर्तमान में सेंटर फॉर कैटेलाइजिंग चेंज (C3) में शिक्षा पहल की प्रमुख हैं)








