नई दिल्ली, 30 दिसंबर 2025: उन्नाव दुष्कर्म कांड में दोषी ठहराए गए पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने सोमवार (29 दिसंबर) को दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी, जिसमें सेंगर की आजीवन कारावास की सजा निलंबित कर उन्हें सशर्त जमानत दी गई थी। अब सेंगर जेल से बाहर नहीं आ सकेंगे और फिलहाल हिरासत में ही रहेंगे।
सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ— प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह— ने सीबीआई की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। पीठ ने स्पष्ट किया कि मामले में कानून के महत्वपूर्ण सवाल उठे हैं, जिन पर विचार करने की जरूरत है। कोर्ट ने सेंगर को नोटिस जारी कर चार हफ्तों में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 20 जनवरी 2026 को होगी।
हाईकोर्ट ने 23 दिसंबर को दी थी जमानत
दिल्ली हाईकोर्ट ने 23 दिसंबर को सेंगर की अपील लंबित रहने तक उनकी सजा निलंबित कर दी थी और सशर्त जमानत दे दी थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि सेंगर ने पहले से ही सात साल पांच महीने जेल में काट लिए हैं और वह लोकसेवक की परिभाषा में नहीं आते, इसलिए पोक्सो एक्ट की कड़ी धाराएं लागू नहीं होतीं। जमानत की शर्तों में सेंगर को दिल्ली में रहना, पीड़िता के घर के 5 किमी दायरे में नहीं जाना और पासपोर्ट जमा करना शामिल था।
हालांकि, सेंगर अभी भी जेल में ही थे क्योंकि वह पीड़िता के पिता की हिरासत में मौत के अलग मामले में 10 साल की सजा काट रहे हैं।
सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती
सीबीआई ने हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए कहा कि यह एक गंभीर मामला है, जहां नाबालिग पीड़िता (घटना के समय 15 साल 10 महीने की उम्र) के साथ दुष्कर्म हुआ। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट में दलील दी कि विधायक होने के नाते सेंगर प्रभुत्व की स्थिति में थे और पोक्सो एक्ट में लोकसेवक की परिभाषा व्यापक होनी चाहिए। कोर्ट ने इस पर सहमति जताते हुए कहा कि अगर सिपाही या पटवारी लोकसेवक माने जाते हैं तो विधायक को छूट नहीं मिलनी चाहिए।
पीठ ने कहा कि आमतौर पर जमानत आदेश पर रोक नहीं लगाई जाती, लेकिन इस मामले की विशेष परिस्थितियां (अलग मामले में सजा) को देखते हुए रोक जरूरी है।
पीड़िता को मिली कानूनी सहायता की सुविधा
सुनवाई के दौरान पीड़िता की ओर से वकील पेश हुए। कोर्ट ने कहा कि पीड़िता को अलग से याचिका दाखिल करने का अधिकार है और जरूरत पड़े तो सुप्रीम कोर्ट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी से मुफ्त कानूनी मदद मिल सकती है।
पृष्ठभूमि
2017 में उन्नाव में नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में 2019 में दिल्ली की निचली अदालत ने सेंगर को आईपीसी की धारा 376 और पोक्सो एक्ट के तहत दोषी ठहराया था। उन्हें आजीवन कारावास और 25 लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई थी। सेंगर ने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की थी।
हाईकोर्ट के जमानत आदेश के बाद देशभर में प्रदर्शन हुए थे और पीड़िता ने सुरक्षा की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से पीड़िता पक्ष को बड़ी राहत मिली है।






