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February 6, 2026 11:29 pm

कछुओं की तस्करी: पर्यावरण सुरक्षा चक्र पर एक प्राणघातक प्रहार

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कछुओं की तस्करी:
इस हृदयविदारक समाचार का एक अति-विस्तृत वैज्ञानिक और कानूनी विश्लेषण प्रस्तुत है। यह केवल 311 कछुओं की तस्करी नहीं है, बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ियों के पर्यावरण सुरक्षा चक्र पर एक प्राणघातक प्रहार है।

कछुओं की तस्करी:
पूर्ण नेटवर्क के भंडाफोड़ हेतु आरपीएफ की पैनी दृष्टि:

​मध्य प्रदेश के भोपाल स्थित संत हिरदाराम रेलवे स्टेशन पर उस समय स्तब्ध कर देने वाला दृश्य उपस्थित हुआ, जब पटना-इंदौर एक्सप्रेस (19314) के भीतर से प्रकृति के 311 मूक रक्षकों मीठे पानी काछुओ को बंधक अवस्था में मुक्त कराया गया। रेलवे सुरक्षा बल (RPF) ने अपने गुप्तचर तंत्र और सतर्कता का परिचय देते हुए न केवल इन जीवों को बचाया, बल्कि वन्यजीव तस्करी के उस घृणित तंत्र की जड़ों को भी बेनकाब किया है जो लखनऊ से लेकर इंदौर तक फैला हुआ है।
​अधिकारियों की सजग दृष्टि ने जब ट्रेन के वातानुकूलित कोच के परिचारक (अटेंडेंट) अजय राजपूत के व्यवहार में घबराहट देखी, तो संदेह की सुई गहरी हो गई। आरक्षित केबिन की गहन तलाशी में दो भारी बैग बरामद हुए, जिनमें निर्दयतापूर्वक, बिना वायु के संचार के, 311 जीवित कछुओं को ठूंस-ठूंस कर भरा गया था। पूछताछ के दौरान अपराधी ने स्वीकार किया कि लखनऊ स्थित रवींद्र कश्यप नामक व्यक्ति ने उसे मात्र 2500 रुपये के तुच्छ लालच में इस महापाप का भागीदार बनाया। ये कछुए देवास और इंदौर के बाजारों में ‘एक्वेरियम पेट्स’ के रूप में ऊंचे दामों पर बेचे जाने थे, जहाँ इनकी कीमत लाखों में आंकी गई है। यह घटना स्पष्ट करती है कि किस प्रकार वन्यजीवों का यह काला बाजार हमारी जैव-विविधता को निगल रहा है।

​वैज्ञानिक विश्लेषण एवं व्याख्या:

​एक हरपेटोलॉजिस्ट के रूप में, जब मैं संलग्न छायाचित्र का सूक्ष्म निरीक्षण करता हूँ, तो मेरी वैज्ञानिक दृष्टि उन शारीरिक लक्षणों को पहचानती है जो इन जीवों को अद्वितीय बनाते हैं। चित्र में प्रदर्शित प्रजातियों का विस्तृत विवरण
निम्नलिखित है:

चित्र में दिखाई देने वाले अधिकांश कछुए ‘इंडियन रूफ्ड टर्टल’ (Pangshura tecta) और ‘इंडियन टेंट टर्टल’ (Pangshura tentoria) की श्रेणी के हैं। इनके कवच (Carapace) की बनावट एक ढालनुमा छत की तरह होती है, जिस पर एक उभारदार ‘कील’ (Keel) मौजूद होती है। इन प्रजातियों के कछुओं को उनके सुंदर और चमकीले पेट (Plastron) के लिए जाना जाता है, जिस पर नारंगी, गुलाबी और काले धब्बे होते हैं। यही सुंदरता इनके लिए अभिशाप बन गई है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में इनकी मांग ‘शो-पीस’ के रूप में अत्यधिक है। इनका जीवन चक्र अत्यंत धीमा होता है; इन्हें वयस्क होने में कई वर्ष लगते हैं। जब तस्कर इतनी बड़ी संख्या में किशोर (Juveniles) कछुओं को नदी से उठा लेते हैं, तो वे उस प्रजाति के भविष्य की प्रजनन क्षमता को ही समाप्त कर देते हैं।

लखनऊ और गोमती नदी का पारिस्थितिकीय महत्व:

इस तस्करी का मुख्य केंद्र लखनऊ बताया गया है। लखनऊ की जीवनरेखा, गोमती नदी और उससे जुड़े तराई के जल निकाय इन कछुओं के लिए स्वर्ग समान रहे हैं। वैज्ञानिक रूप से, कछुए नदी के ‘वैक्यूम क्लीनर’ होते हैं। ये मरे हुए जलीय जीवों, सड़ी-गली वनस्पतियों और हानिकारक बैक्टीरिया को खाकर जल को शुद्ध रखते हैं। लखनऊ जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों में जहाँ नदियों पर प्रदूषण का अत्यधिक दबाव है, ये कछुए प्राकृतिक ‘वाटर प्यूरीफायर’ का कार्य करते हैं। यदि इन कछुओं को गोमती या सरयू के जल निकायों से इसी प्रकार निकाला जाता रहा, तो इन नदियों की स्व-शुद्धिकरण (Self-purification) की क्षमता शून्य हो जाएगी। कछुओं की अनुपस्थिति में जल में अमोनिया और नाइट्रोजन का स्तर बढ़ जाता है, जिससे मछलियाँ मरने लगती हैं और अंततः वह जल मानव उपयोग के योग्य भी नहीं रहता।

प्रकृति पर महा-अपराध: पारिस्थितिकीय ‘इकोसाइड’ (Ecocide)
​बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी (BNHS) और वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) के शोध और मेरे शोध अनुसार , मीठे पानी के कछुए जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के ‘कीस्टोन’ (Keystone Species) हैं। इसका अर्थ यह है कि यदि इस जीव को हटा दिया जाए, तो पूरा तंत्र ढह जाएगा।

​311 कछुओं का अपहरण केवल एक संख्या नहीं है। प्रत्येक कछुआ प्रतिदिन सैकड़ों ग्राम जैविक अपशिष्ट का निपटान करता है। जब इन्हें लखनऊ से हटाकर इंदौर के कंक्रीट के जंगलों में कांच के डिब्बों (Aquariums) में कैद करने के लिए भेजा जाता है, तो हम एक जीवित पारिस्थितिकी तंत्र की हत्या कर रहे होते हैं। यह प्रकृति के विरुद्ध ‘संगठित युद्ध’ है। तस्करों द्वारा इन्हें बोरों में बांधकर ले जाना इनके श्वसन तंत्र और सेल (Shell) को अपूरणीय क्षति पहुँचाता है। कई कछुए परिवहन के दौरान ही दम तोड़ देते हैं, जो एक वैज्ञानिक के रूप में हमारे लिए असहनीय क्षति है।

कानूनी ढांचा, अधिनियम और कठोर दंड (Wildlife Protection Act, 1972)
​भारतीय कानून वन्यजीवों के संरक्षण हेतु विश्व के सबसे कठोर कानूनों में से एक है। इन कछुओं की तस्करी करने वालों पर निम्नलिखित कानूनी धाराओं के तहत कार्रवाई सुनिश्चित है:

​वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची: चित्र में दिख रहे ‘स्पॉटेड पोंड टर्टल’ या ‘इंडियन रूफ्ड टर्टल’ को इस अधिनियम की अनुसूची-1 (Schedule I) में रखा गया है। इसका अर्थ है कि इन्हें वही कानूनी संरक्षण प्राप्त है जो एक बाघ या हाथी को मिलता है।
​धारा 9 और धारा 39: वन्यजीवों के शिकार और उनके अवैध कब्जे को प्रतिबंधित करती है। चूंकि ये सरकारी संपत्ति (State Property) माने जाते हैं, अतः इनका परिवहन देश के विरुद्ध अपराध है, याने राष्ट्रे अपराध की श्रेणि में आते हैं।

​दंड का प्रावधान (Section 51): अनुसूची-1 के जीवों के साथ छेड़छाड़ या तस्करी करने पर अपराधी को न्यूनतम 3 वर्ष से लेकर 7 वर्ष तक के कठोर कारावास का प्रावधान है। साथ ही, न्यूनतम 25,000 रुपये का जुर्माना आरोपित किया जाता है। यदि यह अपराध दूसरी बार किया जाता है, तो कारावास की अवधि और जुर्माने की राशि दोनों में भारी वृद्धि होती है।

​गैर-जमानती अपराध: यह एक संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध की श्रेणी में आता है, जिसमें अपराधी को तत्काल राहत मिलना असंभव होता है।

IUCN संरक्षण स्थिति और वैश्विक चिंता
​अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) की ‘रेड लिस्ट’ में इन प्रजातियों की स्थिति चिंताजनक है। ‘स्पॉटेड पोंड टर्टल’ (Geoclemys hamiltonii) को ‘Endangered’ (लुप्तप्राय) घोषित किया गया है। इसका अर्थ है कि यदि इनका संरक्षण नहीं किया गया, तो ये पृथ्वी से हमेशा के लिए विलुप्त हो जाएंगे।

साइट्स (CITES) के अपेंडिक्स-I में शामिल होने के कारण इनका अंतरराष्ट्रीय व्यापार भी पूर्णतः प्रतिबंधित है।

तस्करी की ये घटनाएँ भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को भी प्रभावित करती हैं, क्योंकि यह जैव-विविधता की चोरी है।

​अंतिम संदेश एवं मानवीय चेतना का आह्वान:
​एक हरपेटोलॉजिस्ट के रूप में, मेरा हृदय उन 311 मूक प्राणियों की पीड़ा को महसूस कर सकता है। जिस जीव को करोड़ों वर्षों के उद्विकास (Evolution) ने नदियों को स्वच्छ रखने के लिए बनाया, उसे आज चंद रुपयों के लिए प्लास्टिक के थैलों में घोंटा जा रहा है। कछुआ दीर्घायु का प्रतीक है, लेकिन मनुष्य की लालसा ने उसकी आयु पर संकट खड़ा कर दिया है।
​लखनऊ के जल निकायों से इन कछुओं का निष्कर्षण उस क्षेत्र के जल सुरक्षा (Water Security) के लिए एक बड़ा खतरा है। प्रशासन को केवल तस्कर को पकड़ने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि लखनऊ के उस मुख्य सरगना ‘रवींद्र कश्यप’ जैसे लोगों के पूरे नेटवर्क को ध्वस्त करना होगा जो ग्रामीण युवाओं को गुमराह कर प्रकृति का विनाश कर रहे हैं।
​हमें यह समझना होगा कि यदि नदियाँ मरेंगी, तो सभ्यताएं मरेंगी। और नदियों को जीवित रखने का कार्य ये कछुए निःशुल्क कर रहे हैं। इस ‘क्राइम ऑन नेचर’ को रोकने के लिए हमें जन-जागरूकता, कठोर कानून का कार्यान्वयन और वैज्ञानिक पुनर्वास (Scientific Rehabilitation) की आवश्यकता है। इन मुक्त कराए गए कछुओं को उनके प्राकृतिक आवास में वापस छोड़ना एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें इनके स्वास्थ्य की जांच और ‘क्वारंटीन’ अनिवार्य है, ताकि किसी भी बाहरी संक्रमण से प्राकृतिक जल निकाय सुरक्षित रहें।

डॉ. तेज प्रकाश पूर्णानन्द व्यास
भारतीय उपमहाद्वीप प्रकृति एवम वन्य जीव वैज्ञानिक: अंतरराष्ट्रीय प्रकृति निधि संरक्षण सँघः
इंदौर,

DIYA Reporter
Author: DIYA Reporter

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