हे चेतना के पुत्र !
मेरी दृष्टि में सर्वाधिक प्रिय वस्तु है न्याय ! तुझे यदि मेरी अभिलाषा है तो उससे विमुख न हो और उसकी अवहेलना न कर, ताकि तू मेरा विश्वासपात्र बन सके। इसकी सहायता से तू दूसरों की आँखों से नहीं बल्कि स्वयं अपनी आँखों से देखने लगेगा, अपने पड़ोसी के ज्ञान से नहीं बल्कि स्वयं अपने ज्ञान से जानने लगेगा। अपने अन्तःकरण में इस पर मनन कर कि तुझे कैसा होना योग्य है। वस्तुतः न्याय तेरे लिये मुझ महान का एक उपहार और मेरी सप्रेम दयालुता का प्रतीक है। अतः इसे अपने नेत्रों के सम्मुख धारण कर।
-बहाउल्लाह
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