वाशिंगटन: ईरान के साथ चल रहे युद्ध के 24वें दिन में अमेरिका ने एक बार फिर अपनी वित्तीय ताकत का दमदार प्रदर्शन किया है। अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी (वित्त मंत्री) स्कॉट बेसेंट ने रविवार को NBC के कार्यक्रम ‘मीट द प्रेस’ में साफ कहा कि अमेरिका के पास इस जंग को लंबे समय तक चलाने के लिए “बहुत पैसा” (plenty of money) मौजूद है। उन्होंने टैक्स बढ़ोतरी की किसी भी संभावना को पूरी तरह खारिज कर दिया और कहा कि अमेरिकी नागरिकों पर युद्ध का कोई अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा।
युद्ध की लागत भारी, फिर भी ‘पैसे की कोई कमी नहीं’
अमेरिका-ईरान संघर्ष अब चौथे हफ्ते में प्रवेश कर चुका है। पेंटागन के शुरुआती अनुमानों के मुताबिक, युद्ध के पहले छह दिनों में ही करीब 11.3 अरब डॉलर (लगभग 1 लाख करोड़ रुपये) का खर्च हो चुका था। अब तक कुल लागत अरबों डॉलर में पहुंच चुकी है, जिसमें गोला-बारूद, मिसाइलें, विमानन अभियान, नौसेना की तैनाती और होर्मुज स्ट्रेट में ऑपरेशन शामिल हैं।
पेंटागन ने कांग्रेस से 200 अरब डॉलर (करीब 17 लाख करोड़ रुपये) की अतिरिक्त फंडिंग की मांग की है, जिसे ‘सप्लीमेंटल फंडिंग’ कहा जा रहा है। लेकिन स्कॉट बेसेंट ने जोर देकर कहा, “हमारे पास इस युद्ध के लिए बहुत पैसा है। यह सप्लीमेंटल फंडिंग है, जरूरी नहीं बल्कि भविष्य में मिलिट्री को मजबूत रखने के लिए।”
उन्होंने आगे कहा, “प्रश्न टैक्स बढ़ाने का बिल्कुल बेतुका है। हम ऐसा क्यों करेंगे? हमारे पास ट्रिलियन डॉलर का मिलिट्री बजट है।”
टैक्स हाइक से इनकार, लेकिन सवाल बरकरार
बेसेंट ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका वित्तीय रूप से मजबूत स्थिति में है। उन्होंने दावा किया कि युद्ध का खर्च अमेरिकी टैक्सपेयर्स पर नहीं डाला जाएगा। हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि अतिरिक्त फंडिंग आखिरकार कहां से आएगी—क्या बॉन्ड जारी करके, डिफेंस बजट में कटौती से या अन्य स्रोतों से।
कांग्रेस में इस 200 अरब डॉलर की मांग पर बहस तेज है। कुछ रिपब्लिकन और डेमोक्रेट सांसद इसे लेकर सवाल उठा रहे हैं कि इतनी बड़ी रकम कहां से आएगी, जबकि घरेलू कार्यक्रमों जैसे हेल्थकेयर, एजुकेशन और इंफ्रास्ट्रक्चर पर पहले से कटौती हो चुकी है। विपक्षी नेता इसे “युद्ध की कीमत आम अमेरिकी चुकाएंगे” बताकर हमला कर रहे हैं।
मिडिल ईस्ट में स्थिति तनावपूर्ण
ईरान के साथ जंग अब होर्मुज स्ट्रेट तक पहुंच चुकी है, जहां ईरान ने कुछ जहाजों पर भारी ट्रांजिट फीस लगाई है। तेल की कीमतों में उछाल से वैश्विक अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है। अमेरिका ने ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम को निशाना बनाया है, जबकि ईरान ने जवाबी हमलों की धमकी दी है।
ट्रंप प्रशासन का कहना है कि यह संघर्ष “50 दिन की ऊंची कीमतों” के बदले “50 साल तक ईरान के न्यूक्लियर खतरे” को खत्म करने का मौका है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अगर युद्ध लंबा खिंचा तो आर्थिक बोझ और बढ़ सकता है।
अमेरिकी वित्त मंत्री का यह बयान जंग के बीच नागरिकों को भरोसा दिलाने की कोशिश है, लेकिन सवाल यह है कि ‘बहुत पैसा’ कितने दिनों तक चलेगा और क्या यह वाकई बिना किसी कीमत के संभव है? युद्ध का अंत अभी दूर नजर आ रहा है, और वाशिंगटन से निकलने वाले ऐसे दावे वैश्विक ध्यान खींच रहे हैं।







