वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को दोबारा सत्ता संभाले अभी एक साल ही पूरा हुआ है, लेकिन इस छोटे से समय में उन्होंने वैश्विक व्यापार की दुनिया में भूचाल ला दिया है। ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के तहत टैरिफ्स अब उनकी प्रमुख हथियार बन चुके हैं, और इनका ऐलान अक्सर उनके सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल से होता है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद ट्रंप ने ग्लोबल टैरिफ्स को 10% से बढ़ाकर 15% करने का ऐलान किया, जिससे पूरी दुनिया के व्यापारिक रिश्तों में उथल-पुथल मच गई है।
ट्रंप प्रशासन का दावा है कि ये टैरिफ्स अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूत करेंगे और विदेशी देशों द्वारा अमेरिका को ‘लूटने’ की प्रथा पर रोक लगाएंगे। लेकिन आलोचकों का कहना है कि ये टैरिफ्स असल में अमेरिकी नागरिकों पर ही एक छिपा हुआ टैक्स हैं, जो आयातित सामानों की कीमतें बढ़ाकर महंगाई को हवा देंगे। ट्रंप 2.0 में टैरिफ नीतियां अब पहले से ज्यादा आक्रामक हो गई हैं, और इनका आधार 1977 का पुराना कानून इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) रहा है, जिसकी व्याख्या को लेकर विवाद छिड़ा हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट का झटका और ट्रंप का पलटवार
20 फरवरी 2026 को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के कई टैरिफ्स को असंवैधानिक करार देते हुए उन्हें रद्द कर दिया। कोर्ट ने माना कि ट्रंप ने इमरजेंसी पावर्स का दुरुपयोग किया था। लेकिन ट्रंप ने हार नहीं मानी। उसी दिन उन्होंने ट्रेड एक्ट ऑफ 1974 की सेक्शन 122 का सहारा लेकर सभी देशों पर 10% का ग्लोबल टैरिफ लगा दिया, जो ‘बैलेंस ऑफ पेमेंट्स डेफिसिट’ को ठीक करने के नाम पर था। यह टैरिफ 150 दिनों के लिए अस्थायी है, लेकिन इसका असर वैश्विक सप्लाई चेन पर तुरंत पड़ेगा।
अगले ही दिन, 21 फरवरी को ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट में ऐलान किया कि वे इस टैरिफ को ‘पूर्ण रूप से अनुमत और कानूनी रूप से परीक्षित’ 15% तक बढ़ा रहे हैं। पोस्ट में उन्होंने लिखा, “कई देश दशकों से अमेरिका को लूट रहे हैं, बिना किसी जवाब के (जब तक मैं नहीं आया!)। अब हम अमेरिका को पहले से ज्यादा महान बनाएंगे!” यह ऐलान ‘तुरंत प्रभावी’ बताया गया, हालांकि व्हाइट हाउस ने स्पष्ट किया कि 10% से शुरू होकर इसे 15% तक ले जाने की प्रक्रिया अलग से होगी।
पहले से चल रही टैरिफ जंग
ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से ही टैरिफ्स का सिलसिला जारी है। फरवरी 2025 में उन्होंने कनाडा और मैक्सिको पर 25% तथा चीन पर 10% टैरिफ लगाए, जो IEEPA के तहत बॉर्डर सिक्योरिटी और फेंटेनिल रोकथाम के नाम पर थे। बाद में चीन पर यह 20% तक बढ़ा दिया गया। अब ग्लोबल टैरिफ के साथ, अमेरिका के ट्रेड पार्टनर्स जैसे यूरोपीय यूनियन, भारत और अन्य एशियाई देशों पर भी दबाव बढ़ गया है।
व्हाइट हाउस की फैक्ट शीट के मुताबिक, ये टैरिफ्स अमेरिकी वर्कर्स, किसानों और मैन्युफैक्चरर्स को फायदा पहुंचाएंगे, घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देंगे और कीमतें कम करेंगे। लेकिन टैक्स फाउंडेशन की रिपोर्ट बताती है कि 2026 के इन टैरिफ्स से हर अमेरिकी घर पर औसतन 700 डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा, और ट्रेड डेफिसिट में कोई खास बदलाव नहीं आया है।
IEEPA का विवादास्पद इस्तेमाल
ट्रंप की टैरिफ नीतियों में कार्यपालिका का अत्यधिक हस्तक्षेप 1977 के IEEPA कानून की वजह से संभव हुआ है। इस कानून की व्याख्या को लेकर कानूनी विशेषज्ञों में बहस है, क्योंकि यह मूल रूप से इमरजेंसी स्थितियों के लिए बना था, न कि रूटीन ट्रेड पॉलिसी के लिए। सुप्रीम कोर्ट ने इसी आधार पर ट्रंप के कई फैसलों को पलटा, लेकिन ट्रंप ने नए कानूनी रास्ते तलाश लिए। आलोचक कहते हैं कि इससे अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय छवि खराब हो रही है और वैश्विक व्यापार युद्ध छिड़ सकता है।
वैश्विक असर और भविष्य
यह टैरिफ्स वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ सकते हैं। चीन, कनाडा और यूरोपियन यूनियन ने पहले ही जवाबी कार्रवाई की धमकी दी है। अमेरिकी बिजनेस पर अनिश्चितता का बादल मंडरा रहा है, और स्टॉक मार्केट में उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। ट्रंप ने संकेत दिया है कि आने वाले महीनों में और नए टैरिफ्स लगाए जा सकते हैं।
ट्रंप की यह नीति क्या अमेरिका को ‘ग्रेटर दैन एवर’ बनाएगी या महंगाई और ट्रेड वॉर का कारण बनेगी, यह समय बताएगा। फिलहाल, दुनिया की नजरें ट्रुथ सोशल पर टिकी हैं, जहां से अगला बड़ा ऐलान कभी भी आ सकता है।






