राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) अपने 100 वर्ष पूरे होने के ऐतिहासिक मौके पर अब तक का सबसे बड़ा संगठनात्मक बदलाव करने जा रहा है। दशकों पुरानी प्रांत प्रचारक व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाएगा। इसकी जगह अब राज्य प्रचारक और संभाग प्रचारक की नई संरचना लागू होगी, जिससे संघ का फोकस और अधिक जमीनी स्तर पर, छोटे-छोटे क्षेत्रों में गहराई से मजबूत होगा। यह बदलाव मार्च 2026 में हरियाणा के समालखा में हो रही अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा (13-15 मार्च) में अंतिम मुहर लगने की संभावना है। सूत्रों के मुताबिक, यह नया ढांचा 2026-27 से लागू हो सकता है और इसका पहला बड़ा टेस्ट 2027 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में होगा, जहां संघ माइक्रो-मैनेजमेंट और बूथ-टू-बूथ रणनीति को और सटीक बनाने की तैयारी में है।
पुरानी व्यवस्था क्या थी और क्यों बदलाव?
RSS की वर्तमान संरचना में देश को 11 क्षेत्रों और 45 प्रांतों में बांटा गया है। प्रत्येक प्रांत के लिए एक प्रांत प्रचारक जिम्मेदारी संभालता है, जो बड़े क्षेत्रों (कई जिलों या कई कमिश्नरियों) को कवर करता है। लेकिन अब संघ का मानना है कि बड़े प्रांतों में कामकाज प्रभावी नहीं रह गया है—निर्णय लेने में देरी, जमीनी संपर्क कमजोर और संगठन की गहराई प्रभावित हो रही है।
नई व्यवस्था में:
- प्रांत प्रचारक पद समाप्त हो जाएगा।
- हर राज्य में एक राज्य प्रचारक होगा, जो पूरे राज्य का समन्वय और रिपोर्टिंग संभालेगा।
- संभाग प्रचारक (Divisional Pracharak) की नई व्यवस्था आएगी—ये कमिश्नरी या 2-3 जिलों के स्तर पर काम करेंगे, जिससे कार्यक्षेत्र छोटा लेकिन अधिक केंद्रित और प्रभावी होगा।
- पूरे देश में 75 से ज्यादा संभाग प्रचारक बनाए जाएंगे, जो जमीनी स्तर पर स्वयंसेवकों, शाखाओं और आनुषंगिक संगठनों को सीधे मजबूत करेंगे।
- क्षेत्रों की संख्या भी 11 से घटाकर 9 करने का प्रस्ताव है (उत्तराखंड-यूपी को एकीकृत, राजस्थान को उत्तरी क्षेत्र में शामिल आदि)।
यूपी में क्या बदलाव आएगा? (2027 चुनाव का टेस्ट)
उत्तर प्रदेश में फिलहाल 6 प्रांत प्रचारक हैं, लेकिन नई व्यवस्था में:
- एक राज्य प्रचारक पूरे यूपी का मुखिया होगा।
- 9 से 18 संभाग प्रचारक (कमिश्नरी स्तर पर) होंगे—कुछ सूत्रों के अनुसार 9, तो कुछ में 18 तक का अनुमान है (प्रशासनिक मंडलों के आधार पर)।
- इसके नीचे विभाग प्रचारक और जिला स्तर तक संगठन और मजबूत होगा। यह बदलाव यूपी में माइक्रो-मैनेजमेंट की शुरुआत माना जा रहा है। 2027 विधानसभा चुनाव में संघ बूथ स्तर पर, गांव-मोहल्ला स्तर पर अधिक गहन संपर्क, स्वयंसेवक मोबिलाइजेशन और स्थानीय मुद्दों पर फोकस करेगा। बड़े प्रांतों की बजाय छोटे संभागों से काम होने से निर्णय तेज होंगे, फीडबैक बेहतर आएगा और BJP की चुनावी रणनीति को और मजबूती मिलेगी।
क्यों हो रहा यह बदलाव अब?
- शताब्दी वर्ष (2025 में 100 साल पूरे) के मौके पर संघ खुद को और अधिक आधुनिक, विकेंद्रीकृत और जमीनी स्तर पर सशक्त बनाना चाहता है।
- बड़े राज्यों (जैसे यूपी, एमपी, बिहार) में प्रांत व्यवस्था पुरानी पड़ गई थी—अब छोटे संभागों से बेहतर कंट्रोल और विस्तार संभव।
- मौजूदा प्रांत प्रचारकों को नए पदों (राज्य/संभाग प्रचारक) में समायोजित किया जाएगा—कई को प्रमोशन जैसा मिलेगा।
- संघ के वरिष्ठ प्रचारकों का कहना है कि यह बदलाव ग्रासरूट आउटरीच बढ़ाएगा, गांव-मोहल्ला स्तर पर हिंदू समाज को और संगठित करेगा।
प्रतिक्रियाएं और प्रभाव
RSS के प्रवक्ता और प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने हाल ही में प्रेस ब्रीफिंग में बैठक की तैयारियों की जानकारी दी, लेकिन बदलाव पर विस्तार से टिप्पणी नहीं की। हालांकि, सूत्रों ने पुष्टि की है कि प्रतिनिधि सभा में 2-3 प्रमुख प्रस्ताव पास होंगे, जिसमें यह ढांचागत बदलाव शामिल है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बदलाव BJP के लिए भी फायदेमंद साबित होगा, खासकर यूपी जैसे महत्वपूर्ण राज्य में जहां 2027 चुनाव निर्णायक होंगे।
यह बदलाव RSS को 100 साल बाद नई ऊर्जा देगा—पुरानी व्यवस्था को अलविदा कहकर छोटे, तेज और प्रभावी ढांचे की ओर। 13-15 मार्च की बैठक में फैसला आने के बाद संगठन में नया दौर शुरू हो जाएगा।






