भारत में बनेंगे राफेल फाइटर जेट! रक्षा मंत्रालय ने कसी कमर, CCS को भेजा जाएगा प्रस्ताव—कब शुरू होगा काम? ✈️🇮🇳
रक्षा क्षेत्र में बड़ा झटका! भारत अब राफेल लड़ाकू विमानों को देश में ही बनाएगा—यह पहली बार होगा जब फ्रांस के बाहर राफेल का बड़े पैमाने पर उत्पादन होगा। फ्रांस की दसॉल्ट एविएशन (Dassault Aviation) कंपनी के साथ मिलकर यह ‘मेक इन इंडिया’ का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट बनने वाला है।
क्या हुआ अपडेट?
- रक्षा मंत्रालय की डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (DAC) ने फरवरी 2026 की शुरुआत में ही 114 राफेल मल्टी-रोल फाइटर जेट्स की खरीद को मंजूरी दे दी थी। यह प्रस्ताव अब कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) के पास है, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में अंतिम हरी झंडी मिलेगी।
- फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के 17-19 फरवरी 2026 के भारत दौरे के दौरान इस डील पर और मजबूती आई। मैक्रों ने खुद कहा कि भारत और फ्रांस मिलकर राफेल का उत्पादन करेंगे, और यह दोनों देशों के रक्षा संबंधों में “नया युग” शुरू करेगा।
- कुल डील की अनुमानित लागत: ₹3.25 लाख करोड़ (करीब $36-40 बिलियन)।
भारत में निर्माण कैसे होगा?
- कुल 114 में से 18 जेट फ्रांस से फ्लाई-अवे कंडीशन (तैयार हालत में) आएंगे—तुरंत भारतीय वायुसेना में शामिल हो सकेंगे।
- बाकी 96 (या कुछ रिपोर्ट्स में 90+) जेट भारत में बनेंगे।
- शुरुआत में आयातित पार्ट्स से असेंबली होगी।
- धीरे-धीरे इंडिजिनस कंटेंट बढ़ाकर 50% तक (कुछ रिपोर्ट्स में 60% तक) पहुंचाया जाएगा।
- पार्टनरशिप: दसॉल्ट के साथ रिलायंस एयरोस्पेस (Dassault Reliance Aerospace Limited – DRAL) और टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स जैसी भारतीय कंपनियां शामिल।
- लोकेशन: नागपुर (DRAL फैसिलिटी) में फाइनल असेंबली लाइन स्थापित होगी। यह ग्लोबल एक्सपोर्ट हब भी बन सकता है।
- वेरिएंट: नए जेट राफेल F-4 (और भविष्य में F-5) स्टैंडर्ड के होंगे—एडवांस्ड रडार, AI क्षमताएं, भारतीय हथियार इंटीग्रेशन (जैसे Astra मिसाइल) के साथ।
कब शुरू होगा काम?
- CCS से मंजूरी मिलने के बाद ट्रांजेक्शनल नेगोशिएशंस शुरू होंगी—यह 4-6 महीने लग सकते हैं।
- पहली डिलीवरी (फ्रांस से) 2028 से शुरू हो सकती है।
- भारत में उत्पादन 2028-2029 से रफ्तार पकड़ेगा, पूरी डिलीवरी 2030 के अंत तक या 2035 तक पूरी होने की उम्मीद।
- रक्षा मंत्रालय ने कहा है कि प्रस्ताव CCS को जल्द भेजा जाएगा, ताकि मैक्रों दौरे के बाद डील फाइनल हो सके।
यह डील भारतीय वायुसेना की स्क्वाड्रन कमी (वर्तमान में 30+ स्क्वाड्रन की कमी) को दूर करेगी, चीन-पाकिस्तान के सामने एयर डोमिनेंस बढ़ाएगी। ‘मेक इन इंडिया’ को बड़ा बूस्ट मिलेगा—हजारों जॉब्स, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन!






