नई दिल्ली/जयपुर। महिलाओं में एक आम लेकिन अक्सर अनदेखी समस्या यूटेरिन फाइब्रॉइड (गर्भाशय में रसौली या गांठ) है। यह गैर-कैंसरयुक्त (सौम्य) ट्यूमर गर्भाशय की मांसपेशियों में बनते हैं और 30 से 50 साल की उम्र की महिलाओं में सबसे ज्यादा देखे जाते हैं। कई महिलाओं को कोई लक्षण नहीं होते, लेकिन जब लक्षण दिखते हैं तो वे रोजमर्रा की जिंदगी को बुरी तरह प्रभावित कर सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, बार-बार हैवी पीरियड्स, पेट या पेल्विक दर्द और बार-बार पेशाब आने जैसी शिकायतें सबसे आम हैं, लेकिन इन्हें इग्नोर करने से एनीमिया, कमजोरी और गंभीर जटिलताएं हो सकती हैं।
डॉक्टरों का कहना है कि समय पर जांच और इलाज से फाइब्रॉइड को बिना सर्जरी के भी कंट्रोल किया जा सकता है। यहां हम यूटेरिन फाइब्रॉइड के 12 प्रमुख लक्षण बता रहे हैं, जिन्हें महिलाएं कभी हल्के में न लें:
- हैवी या भारी मासिक धर्म (Heavy Menstrual Bleeding): पीरियड्स में बहुत ज्यादा ब्लीडिंग, बड़े थक्के आना, पैड या टैम्पॉन हर 1-2 घंटे में बदलना पड़ना। यह सबसे आम लक्षण है और लंबे समय तक चलने से एनीमिया हो सकता है।
- पीरियड्स का लंबा चलना: सामान्य से ज्यादा दिन (7-10 दिन या उससे अधिक) तक पीरियड्स जारी रहना।
- पीरियड्स के बीच में ब्लीडिंग: मासिक धर्म के बीच स्पॉटिंग या अनियमित रक्तस्राव।
- पेल्विक दर्द या दबाव: निचले पेट में लगातार दर्द, भारीपन या दबाव महसूस होना, जैसे कोई भारी चीज रखी हो।
- बार-बार पेशाब आना (Frequent Urination): फाइब्रॉइड मूत्राशय पर दबाव डालते हैं, जिससे बार-बार पेशाब आने की इच्छा होती है, खासकर रात में।
- पेशाब पूरी तरह न निकलना: ब्लैडर पूरी तरह खाली न होने का एहसास या पेशाब में दिक्कत।
- पीठ के निचले हिस्से में दर्द (Lower Back Pain): फाइब्रॉइड के दबाव से कमर या पीठ दर्द होना।
- संभोग के दौरान दर्द (Pain During Intercourse): यौन संबंध बनाते समय पेल्विक क्षेत्र में दर्द या असुविधा।
- कब्ज या मल त्याग में दिक्कत: फाइब्रॉइड रेक्टम पर दबाव डालकर कब्ज का कारण बन सकते हैं।
- पेट का बढ़ना या फूलना: पेट का आकार बढ़ना या सूजन महसूस होना, जैसे प्रेग्नेंसी हो।
- थकान, कमजोरी या एनीमिया: भारी ब्लीडिंग से खून की कमी, जिससे चक्कर आना, थकान और सांस फूलना।
- पैरों में दर्द या सूजन: बड़े फाइब्रॉइड से नसों पर दबाव पड़ने से पैरों में दर्द या भारीपन।
डॉक्टर क्या कहते हैं?
गाइनोकोलॉजिस्ट डॉ. (काल्पनिक उदाहरण से प्रेरित) बताते हैं कि फाइब्रॉइड का आकार, संख्या और स्थान लक्षण तय करता है। छोटे फाइब्रॉइड अक्सर कोई समस्या नहीं देते, लेकिन बड़े होने पर अल्ट्रासाउंड या MRI से आसानी से पता चल जाता है। इलाज में दवाएं (हार्मोनल थेरेपी), न्यूनतम इनवेसिव प्रक्रियाएं (जैसे यूएई – यूटराइन आर्टरी एम्बोलाइजेशन) या जरूरत पड़ने पर सर्जरी शामिल होती है।
महिलाओं के लिए सलाह: अगर आपको ऊपर बताए गए 2-3 लक्षण भी महसूस हो रहे हैं, तो तुरंत गाइनोकोलॉजिस्ट से मिलें। अल्ट्रासाउंड एक साधारण जांच से समस्या का पता लग जाता है। समय पर इलाज से गर्भधारण में दिक्कत, एनीमिया और अन्य जटिलताओं से बचा जा सकता है।
यह समस्या लाखों भारतीय महिलाओं को प्रभावित करती है, लेकिन जागरूकता और सही इलाज से इसे आसानी से मैनेज किया जा सकता है। अपनी सेहत को प्राथमिकता दें और डॉक्टर की सलाह जरूर लें।






