फिल्म: इक्कीस
इक्कीस मूवी रिव्यू: धर्मेंद्र की विदाई, वीरता की कहानी, जो सुकून महसूस कराती है*निर्देशक: श्रीराम राघवन
कलाकार: अगस्त्य नंदा, धर्मेंद्र, जयदीप अहलावत, सिमर भाटिया
अवधि: 143 मिनट
रेटिंग: 4.5
कुछ फिल्मों का असर तेज़ होता है, कुछ का गहरा। इक्कीस उन चुनिंदा फिल्मों में है जो शोर नहीं मचाती, बल्कि चुपचाप दिल में उतर जाती है। यह फिल्म इसलिए भी खास है क्योंकि इसमें धर्मेंद्र को बड़े पर्दे पर आख़िरी बार देखने का मौका मिलता है। लेकिन यह विदाई आंसुओं से भरी नहीं, बल्कि समझ, सुकून और इंसानी अपनापन से भरी हुई है।
इक्कीस सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की कहानी से प्रेरित है, लेकिन यह सिर्फ एक जवान की बहादुरी की दास्तान नहीं है। यह उस पिता की कहानी भी है, जो समय के साथ अपने दर्द को जीना सीख चुका है। फिल्म दो समयकाल में चलती है—1971 की जंग और 2001 का वर्तमान। जहां पहला हिस्सा जिम्मेदारी, साहस और फैसलों की बात करता है, वहीं दूसरा हिस्सा यादों, स्वीकार और शांति की ओर ले जाता है।
कहानी: जब यादें बोझ नहीं, सहारा बन जाती हैं
फिल्म का दिल उसका दूसरा हिस्सा है। 2001 में सेट यह हिस्सा दिखाता है कि जंग खत्म होने के बाद ज़िंदगी कैसे आगे बढ़ती है। धर्मेंद्र यहां ब्रिगेडियर एम. एल. खेत्रपाल के रूप में नजर आते हैं—एक ऐसे पिता, जिसने अपने बेटे को खोया है, लेकिन खुद को टूटने नहीं दिया।
यह कहानी दुख को दिखाने के लिए नहीं, बल्कि उसे समझने के लिए कही गई है। यहां कोई रोना-धोना नहीं, कोई शिकायत नहीं—बस एक शांत स्वीकार है। यही बात इक्कीस को empathy-driven फिल्म बनाती है।
धर्मेंद्र: अभिनय नहीं, अनुभव
धर्मेंद्र इस फिल्म में कुछ साबित नहीं करते। उन्हें इसकी जरूरत भी नहीं है। उनका अभिनय बहुत अंदर से आता हुआ लगता है—जैसे वह किरदार को निभा नहीं रहे, बल्कि उसे जी रहे हों। उनकी आंखों में एक पिता का गर्व है, एक सिपाही की समझ है और एक इंसान की शांति है।
वह कम बोलते हैं, लेकिन जब बोलते हैं तो शब्द नहीं, भाव निकलते हैं। उनकी चाल, बैठने का तरीका, किसी बात पर हल्की मुस्कान—ये सब मिलकर एक ऐसा किरदार बनाते हैं जो दर्शक के बहुत करीब आ जाता है। यह उनकी गरिमामय विदाई है, जो किसी बड़े मोनोलॉग से नहीं, बल्कि सादगी से याद रहती है।
जयदीप अहलावत: समझ और शालीनता
जयदीप अहलावत का किरदार फिल्म में एक अहम भावनात्मक संतुलन लेकर आता है। उनके और धर्मेंद्र के बीच कोई टकराव नहीं है, बल्कि एक साझा समझ है। दोनों पुराने सैनिक हैं, जिन्होंने जंग को अलग-अलग तरफ से देखा है, लेकिन इंसानियत को एक ही नजर से समझते हैं।
इन दोनों के सीन बेहद सॉफ्ट हैं—पुरानी गलियों में टहलना, रुककर बातें करना, चुपचाप एक-दूसरे को समझना। ये पल फिल्म को दर्द से निकालकर healing की तरफ ले जाते हैं।
अगस्त्य नंदा और बाकी किरदार
अगस्त्य नंदा युवा अरुण खेत्रपाल के रूप में ईमानदार और सहज लगते हैं। उनका अभिनय फिल्म की नींव है, लेकिन फिल्म का भावनात्मक शिखर धर्मेंद्र के हिस्से में आता है। सिमर भाटिया का छोटा सा रोल कहानी में warmth जोड़ता है—एक ऐसी ज़िंदगी की झलक, जो अधूरी रह गई।
निर्देशन: शांत और असरदार
श्रीराम राघवन का निर्देशन इस फिल्म में बेहद संयमित है। वह कहानी को भावुक बनाने की कोशिश नहीं करते, बल्कि उसे सच्चा रखते हैं। कैमरा रुकता है, सीन सांस लेते हैं और किरदारों को वक्त मिलता है। यही वजह है कि फिल्म भारी नहीं लगती, बल्कि सुकून देती है।
संगीत और तकनीकी पक्ष
फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर बहुत हल्का है। वह भावनाओं को उकसाता नहीं, बस साथ चलता है। जंग के सीन भी जरूरत भर के हैं—डराने के लिए नहीं, समझाने के लिए। टैंक के द्रश्य को बहोत ही अच्छे से फिल्माया गया है।
फैसला
इक्कीस धर्मेंद्र के लिए एक आदर्श विदाई फिल्म है। यह फिल्म उन्हें शोर, नारे या भारी संवादों के साथ नहीं, बल्कि सम्मान, शांति और इंसानियत के साथ अलविदा कहती है।
यह फिल्म दुख नहीं देती, बल्कि दिल को थोड़ा और नरम बना देती है। अगर आप ऐसी फिल्म देखना चाहते हैं जो आपको तोड़े नहीं, बल्कि भीतर से जोड़ दे—तो इक्कीस जरूर देखिए ताकि आप को विश्वास हो जाये की इंसानियत और ज़िम्मेदार निर्देशन अब भी ज़िंदा है।






