बिहार के छपरा जिले की रहने वाली सरिता देवी की कहानी आज ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रेरणा बन गई है। कभी बकरी चराकर और मजदूरी करके घर चलाने वाली सरिता आज अपनी खुद की दुकान चला रही हैं और सिलाई-कढ़ाई के काम से न केवल अपनी आमदनी बढ़ा रही हैं, बल्कि गांव की कई अन्य महिलाओं को भी रोजगार दे रही हैं। सरिता की इस सफलता के पीछे स्वयं सहायता समूह और जीविका से जुड़ने का बड़ा योगदान बताया जा रहा है।
सरिता बताती हैं कि कुछ साल पहले तक उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर थी। घर चलाने के लिए उन्हें खेतों में मजदूरी करनी पड़ती थी और खाली समय में बकरियां चराकर थोड़ा बहुत पैसा मिल जाता था। परिवार बड़ा था और आमदनी कम, इसलिए रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना भी मुश्किल हो जाता था।
इसी दौरान गांव में चल रहे जीविका समूह के बारे में उन्हें जानकारी मिली। शुरुआत में उन्हें विश्वास नहीं था कि इससे उनकी जिंदगी बदल सकती है, लेकिन गांव की अन्य महिलाओं के कहने पर उन्होंने स्वयं सहायता समूह से जुड़ने का फैसला किया। समूह से जुड़ने के बाद उन्हें बचत करने की आदत पड़ी और छोटी-छोटी रकम जमा होने लगी।
कुछ समय बाद समूह की मदद से सरिता को छोटा ऋण मिला, जिससे उन्होंने सिलाई मशीन खरीदी। उन्होंने घर पर ही सिलाई-कढ़ाई का काम शुरू किया। शुरू में गांव के लोगों के कपड़े सिलती थीं, लेकिन धीरे-धीरे उनके काम की तारीफ होने लगी और आसपास के गांवों से भी लोग आने लगे। काम बढ़ने पर उन्होंने दूसरी मशीन खरीदी और दो अन्य महिलाओं को भी अपने साथ काम पर लगा लिया।
आज सरिता के पास करीब एक लाख रुपये से ज्यादा का सामान और मशीनें हैं और उन्होंने बाजार में छोटी सी दुकान भी खोल ली है। इस दुकान में कपड़ों की सिलाई, कढ़ाई और तैयार कपड़ों का काम किया जाता है। सरिता का कहना है कि अब उनकी आमदनी पहले से कई गुना बढ़ गई है और घर की स्थिति भी काफी सुधर गई है।
सरिता बताती हैं कि जीविका समूह ने उन्हें केवल पैसा ही नहीं दिया, बल्कि आत्मविश्वास भी दिया। समूह की बैठकों में उन्हें बचत, ऋण, कारोबार और आत्मनिर्भर बनने की ट्रेनिंग मिली। यही वजह है कि आज वह खुद कमाने के साथ-साथ गांव की अन्य महिलाओं को भी काम सिखा रही हैं।
गांव के लोगों का कहना है कि सरिता की मेहनत और लगन ने पूरे इलाके की महिलाओं को प्रेरित किया है। पहले जो महिलाएं घर से बाहर काम करने से डरती थीं, अब वे भी समूह से जुड़कर अपना काम शुरू कर रही हैं।
सरकारी अधिकारियों का कहना है कि स्वयं सहायता समूह और जीविका योजना का उद्देश्य ही यही है कि गांव की महिलाएं आत्मनिर्भर बनें और अपने पैरों पर खड़ी हों। सरिता जैसी कहानियां इस बात का प्रमाण हैं कि सही मार्गदर्शन और मेहनत से कोई भी अपनी किस्मत बदल सकता है।
आज सरिता की कहानी पूरे इलाके में मिसाल बन चुकी है—बकरी चराने से लेकर अपनी दुकान चलाने तक का उनका सफर यह दिखाता है कि हिम्मत और मेहनत से हर मुश्किल को हराया जा सकता है।






