राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सरकारी आवास (सरकारी क्वार्टर) खाली कराने से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में सख्त फैसला सुनाया है। यह मामला जयपुर स्थित गांधी नगर इलाके के सरकारी आवासों के दुरुपयोग, अवैध कब्जे और न्यायिक आदेशों की अवहेलना से संबंधित है।
मामले की पूरी पृष्ठभूमि और विवरण:
कुछ सरकारी कर्मचारियों (सरकारी कर्मचारी) ने अपने सरकारी आवास से बेदखली के नोटिस (eviction notices) को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में रिट याचिका (writ petition) दायर की थी। यह याचिका व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा के लिए थी, न कि जनहित याचिका (PIL) के रूप में।
एकलपीठ (single bench) ने इस याचिका की सुनवाई के दौरान इसे जनहित याचिका जैसा क्षेत्राधिकार मान लिया और याचिका में मांगी गई राहत से कहीं आगे जाकर निर्देश जारी किए। विशेष रूप से:
- 24 अप्रैल और 29 अप्रैल को दिए गए आदेशों में अपीलकर्ता (सरकारी पक्ष या संबंधित अधिकारी) को जमानती वारंट (bailable warrant) से तलब करने का आदेश दिया।
- पुलिस को एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया।
- मामले को सार्वजनिक हित से जोड़कर व्यापक टिप्पणियां कीं, जैसे सरकारी आवासों के दुरुपयोग पर सामान्य निर्देश।
यह सब याचिका के मूल दायरे से बाहर था, क्योंकि याचिका केवल व्यक्तिगत बेदखली नोटिस के खिलाफ थी, न कि सार्वजनिक मुद्दे पर PIL के रूप में।
खंडपीठ का फैसला (23 फरवरी 2026):
जस्टिस इन्द्रजीत सिंह और जस्टिस रवि चिरानिया की खंडपीठ ने अपीलकर्ता उपेंद्र सिंह की अपील पर सुनवाई की। अधिवक्ता सुनील समदड़िया ने तर्क दिया कि एकलपीठ ने अपनी क्षेत्राधिकार सीमा (jurisdiction) लांघी है।
खंडपीठ ने सहमति जताते हुए:
- एकलपीठ के दोनों आदेशों (24 अप्रैल और 29 अप्रैल) को रद्द कर दिया।
- स्पष्ट कहा कि एक समाप्त हो चुकी रिट याचिका में PIL जैसा क्षेत्राधिकार ग्रहण करना गलत था।
- एकलपीठ ने याचिका के दायरे से बाहर जाकर निर्देश दिए, जो कानून के खिलाफ है।
- PIL के दुरुपयोग को रोकने और न्यायिक प्रक्रिया की सीमाओं को बनाए रखने पर जोर दिया।
महत्वपूर्ण टिप्पणियां:
- कोर्ट ने कहा कि याचिका में PIL जैसी कोई प्रार्थना नहीं थी, इसलिए एकलपीठ ऐसा क्षेत्राधिकार नहीं ले सकती।
- यह फैसला न्यायिक अनुशासन, PIL की सीमित उपयोगिता और व्यक्तिगत याचिकाओं में अनावश्यक विस्तार से बचने के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
- मामला सरकारी संपत्ति के संरक्षण और कर्मचारियों के अधिकारों के बीच संतुलन को दर्शाता है।
यह फैसला हाल ही में (फरवरी 2026) आया है और दैनिक भास्कर तथा Bar & Bench जैसी विश्वसनीय रिपोर्टों में प्रकाशित हुआ है। यदि आपको इस मामले की मूल आदेश कॉपी या आगे की अपडेट चाहिए, तो बताएं!






